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Sunday, April 26, 2015

भूकम्प के वो 30 सेकिंड मेरा पूरा वजूद हिला गए

नेपाल से भोपाल तक भूकंप और मैं भी हुआ प्रभावित
प्रतिदिन की तरह मैं सुबह 10.30 बजे तक ऑफिस (दैनिक भास्कर) पहुंचा और अपने काम में जुट गया। तब तक हमारे ऑफिस का टीवी बंद था और मैं दुनिया में हो रही हलचल से बेखबर अपनी न्यूज स्टोरी को पूरी करने में जुटा हुआ था। उस समय तक एक-दो लोग ही ऑफिस में बैठे थे, लेकिन 11.30 बजे तक सभी आ गए। मैं अपने काम में जुटा था और मेरी बगल में Sr फोटो जर्नलिस्ट सतीश टेवरे, उनके बगल में साथी पत्रकार राधेश्याम दांगी और आखिर में सब एडिटर शमी कुरैशी बैठे हुए थे। अचानक ऐसा लगा कि मेरी टेबिल हिल रही है और बहुत जोर-जोर से। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब ज्यादा हिलने लगी तो साथी टेवरे जी को घूरकर देखा तो पता चला कि वे मुझे घूर रहे हैं। मैं सवाल करता इसके पहले ही कुरैशी जी ने राधेश्याम से पूछ लिया कि टेबिल क्यों हिला रहे हो। राधे बोले कि मैं नहीं हिला रहा हूं तो सब एक-दूसरे का मूंह देखने लगे कि आखिर टेबिल हिला कौन रहा है। इतने में एक शोर उठा और Sr Artist श्री गौतम चक्रवर्ती व उनके साथी भागते हुए आए और बोले की भागो भूकंप आया है। कुछ पल तक समझ में ही नहीं आया कि हो क्या रहा है और मैं अपनी जगह ही बैठा रहा। तब तक कंपनी जारी था और पूरा कम्प्युटर व टेबिल हिल रही थी। जब समझ में आया तो मैं भी बाकी लोगों के साथ उठकर भागा और हम सब दैनिक भास्कर के परिसर में एकत्रित हो गए। नीचे खड़े लोग हमें हैरानी से देख रहे थे कि ये भागकर क्यों आ रहे हैं। दरअसल हम दैनिक भास्कर के चौथे माले पर बैठते हैं और वहां कंपनी हो रहा था। लेकिन नीचे और पहले माले पर बैठे लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि क्या हो रहा है? इतनी देर में सामने वाली बिल्डिंग से भी लोग निकलकर आने लगे। हम संभल भी नहीं पाए थे कि एक और शोर सुनाई दिया और ये वे लोग थे जो अपनी जान बचाकर बिल्डिंग से उतर रहे थे। सभी बदहवास और बेखकर एक-दूसरे को अपने अनुभव सुना रहे थे। पूरा दैनिक भास्कर स्टॉफ परिसर में आकर खड़ा हो गया था। इतने याद आया कि भूकंप तो पूरे शहर में और मेरा घर भी इसी शहर में है। तत्काल घर कॉल करके श्रीमती जी से बात की तो उन्होंने बताया कि वहां भी हलचल हुई थी। मां और बहन का हालचाल जाना। इतने में पूरे शहर से कॉल आना शुरू हो गए कि यहां भी भूकंप आया है। करीब 10 से 15 मिनट तक हम नीचे ही तेज धूप में खड़े रहे और फिर ऊपर अपने ऑफिस में आए। तब तक हमारे एक साथी ने टीवी चालू कर दी थी और हम टीवी पर देख रहे थे कि किस तरह नेपाल भूकंप का शिकार हो गया है। टीवी पर लाशों और ध्वस्त हो चुके मकानों के ही दृश्य थे। एक पत्रकार होने के बाद भी यह सब देख नहीं पाया और टीवी छोड़ वापिस अपने काम में लग गया। लेकिन एक बात फिर स्पष्ट हो गई कि हम सबसे ताकतवर प्राणी होने का दम भरने वाले इंसान प्रकृति के सामने किसी तिनके से ज्यादा औकात नहीं रखते हैं। इसलिए दोस्तों जो जीवन मिला है उसे जिंदादिली से जिएं और दूसरों के लिए जिएं। समाज और देश के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करें, क्योंकि यही यादें आपकी रह जाएंगी।
-भीमसिंह मीणा 

Friday, February 11, 2011

देह व्यापार के धंधे में धंसा देश

भगवान श्री राम की तपोभूमि और शेरशाह शूरी की कर्मभूमि ब्याघ्रसर यानी बक्सर (बिहार) के पास गंगा मैया की गोद में बसे गांव मझरिया की गलियों से निकलकर रोजगार की तलाश में जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आया था तब मैंने सोचा भी नहीं था कि पत्रकारिता मेरी रणभूमि बनेगी। वर्ष 2002 में भोपाल में अपने दोनों छोटे भाईयों विनय और स्व.ब्रजेश (पूर्व रणजी खिलाड़ी) के भविष्य की खातिर यहां रूकना पड़ा। समय काटने की गरज से अपने एक व्यवसायी जानकार की सिफारिश पर मैंने दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। उसके बाद अन्य कई बड़े अखबारों में काम करने के आफर आए लेकिन स्वाभिमानी प्रवृति का होने के कारण मैं कहीं नहीं जा सका। वर्ष 2005 में जब सांध्य अग्रिबाण भोपाल से शुरू हुआ तो मैं उससे जुड़ गया तब से आज भी वहीं जमा हुआ हूं। 

Vinod Upadhyay

पिछले एक सप्ताह में हमें दो खबरे पढऩे को मिली। एक तो यह की जेएनयू में किस तरह सेक्स रैकेट का जाल फैल रहा है और दूसरी यह की उत्तर मध्य मुंबई की सांसद प्रिया दत्त ने मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर यह कहकर एक नई बहस छेड़ दी है कि देह व्यापार को कानूनी मान्यता दे देना चाहिए। मुंबई के रेड लाइट एरिया की महिलाओं पर रिसर्च कर चुकीं प्रिया ने संवाददाताओं से चर्चा में कहा,'उन पर काम के दौरान मैंने महसूस किया कि हर महिला की अलग ही कहानी है। यह बहुत पुराना पेशा है,जिसे चाहकर भी नकारा नहीं जा सकता।' उन्होंने कहा कि 'बंद कमरों की अपनी दुनिया में हम इन महिलाओं को नजरअंदाज करते हैं। साथ ही उन्हें कई तरह के शोषण का शिकार होना पड़ता है। उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए कानूनी मान्यता देना जरूरी है।'
अब सवाल यह उठता है कि किसको कानूनी मान्यता दी जाए। क्योंकि देश भर के रेड लाइट एरिया में जो देहव्यापार हो रहा है उसका कारण मजबूरी है और बिना कानूनी मान्यता के वर्षो से चल रहा है तथा चलता रहेगा। तो क्या फिर जो देहव्यापार जेएनयू या आलीशान होटलों और बंगलों में चल रहा उसको कानूनी मान्यता देनी चाहिए। भारत के कुछ राज्यों के कुछ क्षेत्रों में आज भी देहव्यापार भले ही एक छोटी आबादी के लिए रोजी रोटी का जरिया बना हुआ है लेकिन पिछले कुछ महिनों में जिस देहव्यापार के हाईप्रोफाइल मामले सामने आए हैं उससे यह बात तो साफ हो गई है कि देहव्यापार अब केवल मजबूरी न होकर धनवान बनने का एक हाईप्रोफाइल धंधा बन गया है। नेता,अभिनेता और धर्माचार्य भी इस धंधे को चला रहे हैं।
देहव्यापार दुनिया के पुराने धंधों में से एक है। बेबीलोन के मंदिरों से लेकर भारत के मंदिरों में देवदासी प्रथा वेश्यावृत्ति का आदिम रूप है। गुलाम व्यवस्था में उनके मालिक वेश्याएं पालते थे। अनेक गुलाम मालिकों ने वेश्यालय भी खोले। तब वेश्याएं संपदा और शक्ति की प्रतीक मानी जाती थीं। मुगलों के हरम में सैकड़ों औरतें रहती थीं। मुगलकाल के बाद, जब अंग्रेजों ने भारत पर अधिकार किया तो इस धंधे का स्वरूप बदलने लगा। इस समय राजाओं ने अंग्रेजों को खुश करने के लिए तवायफों को तोहफे के रूप में पेश किया जाता था। आधुनिक पूंजीवादी समाज में वेश्यावृत्ति के फलने-फूलने की मुख्य वजह सामाजिक तौर पर स्त्री का वस्तुकरण है। यह तो पूराने दौर की कहानी है, जहां आपको मजबूरी दिखती होगी।
पुराने वक्त के कोठों से निकल कर देह व्यापार का धंधा अब वेबसाइटों तक पहुंच गया है। इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा मेहनत वाला सबब बन गया है। सिर्फ सर्च इंजन पर अपनी जरूरत लिखकर सर्च करने से ऐसी दर्जनों साइट्स के लिंक मिल जाएंगे। कुछ वेबसाइटों पर लड़कियों की तस्वीरें भी दिखाई गई हैं। यहां कालेज छात्राएं, मॉडल्स और टीवी व फिल्मों की नायिकाएं तक उपलब्ध कराने के दावे किए गए हैं।
इस कारोबार में विदेशी लड़कियों के साथ मॉडल्स, कॉलेज गल्र्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। अब दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है। इनकी वेशभूषा, पहनावा व भाषा हाई प्रोफाइल है और उनका काम करने का ढंग पूरी तरह सुरक्षित है। यह न केवल विदेशों से कॉलगर्ल्स मंगाते हैं बल्कि बड़ी कंपनियों के मेहमानों के साथ कॉलगर्ल्स को विदेश की सैर भी कराते हैं। सेक्स एक बड़े कारोबार के रूप में परिवर्तित हो चुका है। इस कारोबार को चलाने के लिए बाकयादा ऑफिस खोले जा रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है। ईमेल या मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है। कॉलगर्ल्स को ठेके पर या फिर वेतन पर रखा जाता हैं।
भीमानंद, इच्छाधारी बाबा का चोला पहन कर देह व्यापार का धंधा करवाता था। उसके संपर्क में 600 लड़कियां थीं। इनमें से 50 लड़कियां केवल बाबा के लिए ही काम करती थी। लड़कियों के रेट का 40 फीसदी कमीशन बाबा अपने पास रखता था। बाबा ने अलग-अलग लड़कियों के अलग-अलग रेट रख रखे थे। मॉडल के लिए 50 हजार, स्टूडेंट के लिए 20 हजार और हाउसवाइफ के लिए 10 हजार। इन लड़कियों को देश भर में फैले बाबा के एजेंट लाते थे।
हाल ही में कई सेक्स रैकेट का खुलास हुआ है। इसमें दक्षिण भारत के बेंगलूरू और हैदराबाद में बड़े-बड़े रैकेट पकड़े गए हैं। बेंगलूरू के सेक्स रैकेट ने तो पूरे देश को हिला रखा है। एक पांच सितारा मशहूर होटल से दक्षिण भारतीय फिल्मों की अभिनेत्री यमुना के साथ दलाल सुमन और एक आईटी कंपनी के सीईओ वेणुगोपाल को गिरफ्तार किया गया था। जो शहर के तमाम बड़े होटलों में बड़ी-बड़ी पार्टियों के बहाने सेक्स रैकेट चलता था। जांच से पता चला है कि यमुना, सोची-समझी नीति के तहत करती थी, ताकि पकड़े जाने पर वह आपसी सहमति से सेक्स की दलील देकर खुद को रैकेट में शामिल होने के आरोप से बचा सके। यह रैकेट किसी कोठे पर नहीं थ्री स्टार और फाइव स्टार होटलों में ही चलता था। रैकेट में मजबूर नहीं ग्लैमरस महिलाएं शामिल हैं। बड़ी और नामी हिरोइन भी बड़े-बड़े अधिकारियों की 'सेवा' के लिए तैयार रहती हैं।
हैदराबाद में तेलुगू फिल्म अभिनेत्रियों सायरा बानू और च्योति के साथ सात अन्य लोगों को रंगे हाथ पकड़कर वेश्यावृत्ति से जुड़े एक गिरोह का भंडाफोड़ किया गया। कुंदन बाग के एक नजदीकी इलाके के एक अपार्टमेंट से कथित तौर पर सायरा और च्योति को उज्बेकिस्तान की एक महिला व उनके ग्राहकों के साथ गिरफ्तार किया गया। गिरोह में कुछ रईसों और जाने माने लोगों शामिल हैं।
हाल ही में गोवा में एक सेक्स रैकेट पकड़ा गया है। यहां के पाउला क्षेत्र से दो दलालों सहित चार नेपाली लड़कियों को पकड़ा गया। इन लड़कियों से जबरन देह व्यापार कराया जा रहा था। इनमें से एक लड़की नाबालिग थी। पुलिस के मुताबिक इस तरह के रैकेट आई टी के मशहूर बैंगलोर में भी काफी संख्या में हैं। फिलहाल पुलिस के पास पुख्ता सबूत नहीं है इसलिए वो कुछ भी कहने से बच रही है। 21 जनवरी को अहमदाबाद के इनकम टेक्स चार रस्ता के नजदीक कॉमर्शियल सेंटर में आने वाले होटल देव पैलेस से सेक्स रैकेट में शामिल एक भोजपूरी हिरोइन को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के दौरान केवल जवान और अय्याश ही नहीं बच्चे भी शामिल थे।
देश का ख्यातिनाम विश्वविद्यालय जेएनयू  या फिर देश का कोई अन्य कॉलेज वहां पढऩे वाली कई छात्राएं अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाने के लिए देह व्यापार करती हैं। पिछले दस वर्षों में विद्यार्थियों में देह व्यापार तीन फ़ीसदी से बढ़कर 25 फ़ीसदी तक पहुंच गया है। कॉलेज में ट्यूशन फीस ज़्यादा होने के वजह से विद्यार्थियों को 'इंटरनेट पर अश्लील फिल्म', 'अश्लील बातें' और 'लैप डांस' जैसा काम करना पड़ता है। देश में कऱीब 5 फ़ीसदी विद्यार्थी एस्कोर्ट का काम करने के विकल्प को मान लेते हैं या विचार करते हैं। हाई प्रोफाइल सेक्सकर्मी को एस्कोर्ट कहा जाता है। वहीं, कई अमीर लड़कियां अपने महंगे शौक को पूरा करने के लिए भी धंधा करती हैं।
भारत में देहव्यापार के व्यवसाय में गोरी चमड़ी वाली विदेशी बालाओं का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। इनमें खासकर सोवियत संघ से अलग हुए राष्ट्रों खूबसूरत और मस्त अदाओं वाली लड़कियां, जो पूरी तरह से देखने में आकर्षित लगती हैं, इस धंधे में भाग ले रही है। एक अनुमान के मुताबिक पाटनगर दिल्ली में मौजूदा समय में 3000 विदेशी लड़कियां मौजूद हैं। यहां पर लड़कियां अपने खूबसूरत चेहरे के दम पर अच्छा-खासा पैसा कमा रही हैं। इन लड़कियों का मकसद एकदम साफ है। भारत में अपना शरीर बेचने के बाद लड़कियां अपने वतन वापस जाकर घर बनाती है, कुछ परिवार को पैसा भेजती रहती है। जांच में पता चला कि इन लड़कियों को भारत लाने के लिए व्यवस्थित नेटवर्क बना हुआ है। उपरोक्त राष्ट्रों की अनेक आंटियां काफी समय से दिल्ली में स्थायी रुप से निवास कर चुकी हैं। इन आंटियों का भारत में वेश्या दलालों के साथ गठबंधन है। विदेश से आती गोरी युवतियों का संपूर्ण संचालन ये आंटियां ही करती हैं साथ ही देशी दलाल और ग्राहक ढूढ़कर कमीशन भी बनाती है। देह व्यापार का यह धंधा सिर्फ दिल्ली और मुंबई में ही नहीं चलता बल्कि पूरे भारत में यह धंधा जोर पकड़ चुका है। देहव्यापार करके कई तरह के शौख पूरा करना इन गोरी लड़कियों का पेशा बन गया है। लड़कियां प्लेजर ट्रीप्स, बिजनेस मीट्स, कॉर्पोरेट इवेंट्स, फंक्शन और डिन डेट्स के लिए भी उपलब्ध होती हैं। कई लड़कियां तो नाइट क्लबों में वेटर्स या बेले डांसर का रुप धारण कर धंधे के लिए तैयार हो जाती हैं।
हिंदुस्तानी पुरुषों को अब सांवली या फिर खूबसूरत वेश्या या कॉलगर्ल में रस नहीं रह गया है। अब भारतीय पुरुष गोरी बालाओं के दीवाने हो गए हैं। इसके लिए वे अच्छा-खासा पैसा खर्च करने के लिए तैयार भी हो जाते हैं। रशियन लड़कियों का मिनिमम चार्ज दो हजार से 8 हजार रुपया है। अधिकतम चार्ज की कोई सीमा नहीं है। लड़कियों के पीछे काफी पैसा खर्च करके ग्राहकों से मोटी रकम वसूल की जाती है। अमीर और अधिकारी वर्ग के लोगों में गोरी त्वचा वाली विदेशी लड़कियों का क्रेज चल रहा है। यहां पर पहले तो नेपाली लड़कियों की ज्यादा डिमांड थी। भारतीय युवतियों की अपेक्षा नेपाली लड़कियों की कीमत 40 फीसदी ज्यादा थी लेकिन अब जमाना रशियन लड़कियों का है। देहव्यापार के धंधे में शामिल एक भारतीय लड़की का कहना है कि रशियन लड़की अपने शरीर को पूरी तरह से ग्राहक के हवाले कर देती हैं लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाते।
भारत में देहव्यापार का धंधा लगातार बढ़ रहा है। 1956 में पीटा कानून के तहत वेश्यावृत्ति को कानूनी वैद्यता दी गई, पर 1986 में इसमें संशोधन करके कई शर्तें जोड़ी गई। इसके तहत सार्वजनिक सेक्स को अपराध माना गया। इसमें सजा का भी प्रावधान है। वूमेन एंड चाइल्ड डेवलेपमेंट मिनिस्ट्री ने 2007  में एक रिपोर्ट दिया, इसके मुताबिक, 30  लाख औरतें देहव्यापार का धंधा करती हैं। इममें 36 फीसदी तो नाबालिग हैं। अकेले मुंबई में 2 लाख सेक्स वर्कर का परिवार रहता है, जो पूरे मध्य एशिया में सबसे बड़ा है।

विस्फोट डॉट कॉम पर एक आर्टिकल पड़ा। इस आर्टिकल को पढऩे के बाद काफी सारी जानकारियां थी जो महत्वपूर्ण थीं। चूंकि विषय इतना प्रिय था कि कोई भी पढऩा चाहे। इसलिए मैंने इस आर्टिकल को विस्फोट से लेकर अपने ब्लॉग पर डाल लिया।
धन्यवाद विस्फोट डॉट कॉम

Saturday, August 21, 2010

मेरी रुचि देखकर काम दिया है मुख्यमंत्री ने..

लक्ष्मीकांत शर्मा
माता : श्रीमती रमा देवी शर्मा
पिता : दिवंगत चंद्रमोहन शर्मा
जन्म : 24 जनवरी 1961
जन्म स्थान: सिरोंज, जिला विदिशा
शिक्षा : एम.ए., एल.एल.बी.
स्कूल : सिरोंज शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल
कॉलेज : सिरोंज शासकीय कॉलेज, गंजबासोदा शासकीय कॉलेज
व्यवसाय : पांडित्य कर्म
विवाह : वर्ष 1992 में
श्रीमती तारामणि शर्मा के साथ
बच्चे : अपर्णा और अमिता-15 वर्ष, अक्षिता-14 वर्ष
अभिरुचि : सांस्कृतिक आयोजन एवं समाज सेवा
करियर ग्राफ :
विधायक: वर्ष 1993, वर्ष 1998, वर्ष 2003 और वर्ष 2008 में सिरोंज क्षेत्र से विधायक चुने गए।
...और मंत्री
28 जून 2004 में प्रथम बार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने और विभाग मिले जनसम्पर्क, खनिज साधन और जनशिकायत निवारण विभाग।
27 अगस्त 2004 में दूसरी बार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने और विभाग मिले खनिज साधन, जनशिकायत निवारण, संस्कृति, धार्मिक न्यास, धर्मस्व, पुनर्वास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग।
4 दिसंबर 2005 में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पद की शपथ ली।
25 अगस्त 2007 में पहली बार केबीनेट मंत्री के रूप शपथ ली।
20 दिसंबर 2008 को दूसरी बार केबीनेट मंत्री के रूप में शपथ ली।
...और अब
केबीनेट मंत्री-तकनीकी शिक्षा, प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व।
...पुरस्कार
वर्ष 1996 में मप्र विधानसभा के उत्कृष्ट विधायक पुरस्कार से सम्मान
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डाटा बैंक बनाया जाएगा?
''अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर रंग साधना में सक्रिय रंगकर्मियों का डाटा बैंक बनाया जाएगा,,
जवाब- विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं। पहले सभी के नामों की सूची तैयार की जाएगी और फिर एक फायनल डाटा बैंक तैयार किया जाएगा।

अनुमति का सरलीकरण होगा?''ऐसे शासकीय कर्मचारी जो किसी संस्था के सौजन्य से देश-दुनिया में रंगमंच आयोजन में प्रस्तुति देते हैं, उन्हें सरकारी विभागों से विभागीय अनुमति देने में टाल-मटोल कीजाती है। इसका सरलीकरण किया जाएगा। ÓÓ
जवाब- ये बात तो हमारे सामने पहली बार आई है। इस संबंध में मैं स्वयं सामान्य प्रशासन विभाग से चर्चा करूंगा। कोशिश की जाएगी कि कर्मचारियों की ये दिक्कत जल्द खत्म हो।


नाम रोशन करने वालों के लिए क्या योजना है?
सैयद शाह हुसैन/ प्रोफेशनल, कोहेफिजा
च्च् ऐसे शासकीय सेवक जिन्होंने रंगमंच साधना में देश-दुनिया में मप्र का नाम रोशन किया है, उन्हें पुरस्कृत करने की क्या योजना है?ज्ज्
जवाब- पुरस्कार देने के लिए कोई बाध्यता तय नहीं की है। कलाकार चाहे शासकीय सेवा में हो या फिर निजी सेवा में, हमारा विभाग केवल उसकी कला का सम्मान करता है।

निजी कॉलेजों पर अंकुश क्यों नहीं?
 च्च् निजी कॉलेजों में शिक्षा कम और व्यापार ज्यादा हो रहा है, क्यों आप इस पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं?ज्ज्
जवाब- अब तक जो कुछ भी होता रहा है वह अब नहीं होगा। हम कॉलेजों पर अंकुश लगाने के लिए लगातार कार्रवाई करते हैं और आगे भी जारी रहेगी। कॉलेजों की मनमानी को रोकने के लिए एक स्पेशल टीम को गठन किया जाएगा।

एक ही तरह के विभाग क्यों?
च्च् आप लगातार चार बार विधायक और पांच बार मंत्री बन चुके हैं, लेकिन विभाग हमेशा आपको एक ही तरह के मिले, कोई खास वजह या स्वयं की रुचि के कारण ऐसा हुआ?ज्ज्
जवाब- ऐसा कौन कहता है कि मुझे एक ही तरह के विभाग मिले हैं। विभाग देने का फैसला मुख्यमंत्री करते हैं। हो सकता है उन्हें मेरी सक्रियता देखकर लगा हो कि ये विभाग देना चाहिए। मेरी रुचि संस्कृति के क्षेत्र में ज्यादा है इसलिए मेरा आंकलन कर मुझे संस्कृति विभाग दिया जाता रहा हो।

क्या परिवार की वजह से तरक्की मिली?
च्च् आपने राजनीति में बहुत तरक्की की और इसके आप हकदार भी हैं लेकिन माना जाता है कि आपको अपने पारिवारिक बैकग्राउंड की वजह से इतनी सफलता मिली?ज्ज्
जवाब- मुझे ये बात मानने से कतई इंकार नहीं है। मेरा परिवार पांडित्य कर्म से जुड़ा रहा है और मेरे पिता एक शिक्षक थे। जिसके वजह से हमारे परिवार का समाज में एक अलग स्थान था। मैं स्वयं भी समाज के बीच में रहकर काम करता था, इसलिए राजनीति में आने के बाद लोगों ने खुले मन से मेरा सहयोग किया।


कैसे बदल गए सपने?

च्च् हर आदमी का लक्ष्य शुरू में कुछ और होता है, लेकिन बाद में बदलने लगता है। स्कूल में थे तो क्या बनना चाहते थे और जब कॉलेज गए तो सपनों में क्या बदलाव आया?ज्ज्
जवाब- कभी नहीं सोचा था कि विधायक बनूंगा। खासतौर से जब स्कूल में था तो राजनीति में आने का मन में कभी विचार नहीं आया। स्कूल के बाद कॉलेज में बहुत ज्यादा राजनीति के बारे में नहीं सोचा। हां राष्ट्रीय स्वयं संघ में जरूर में निरंतर कार्य करता रहा। विधायक बनने के पहले सरस्वती स्कूल में आचार्य था।

फिल्मों को संस्कृति का हिस्सा मानते हैं?

आप संस्कृति विभाग के मंत्री और फिल्में भी संस्कृति का हिस्सा होती हैं तो आप मानते हैं कि फिल्मों से किसी भी देश या प्रदेश की संस्कृति में बदलाव लाया जा सकता है?
जवाब- फिल्मों से समाज की संस्कृति पर आज से ६-७ साल पहले फर्क पड़ता था। उस कुछ भी अच्छा या बुरा होता था तो फिल्मों को जिम्मेदार माना जाता था। अब टीवी परिवार और समाज पर हावी हो गई है इसलिए जिम्मेदार फिल्में नहीं टीवी सीरियल माने जाएंगे।

क्या फिल्में राजनीति से प्रेरित होती हैं?च्च् देश में होने वाली राजनीति फिल्मों से प्रेरित होती है कि फिल्मों में दिखाई जाने वाल राजनीति फिल्मों से प्रेरित होती है?ज्ज्
जवाब- कोई फिल्म ऐसी नहीं है जिसे देखकर देश या किसी प्रदेश की राजनीति में बदलवा आया हो। हां फिल्मवाले जरूर राजनीतिक घटनाक्रमों को देखतर तत्काल फिल्म बना डालते हैं।


क्या आज भी पंडिताई करते हैं?

च्च् आपका परिवार पंडिताई का काम करता था और उसी से पूरे परिवार की जीविकोपार्जन होता था, लेकिन अब आप मंत्री हैं तो क्या आज भी पंडिताई करने का मन करता है?ज्ज्
जवाब- मौका मिलता है पंडिताई करने से न तो चूकता हूं और न ही चूकुंगा। अगर कोई पूरी श्रद्धा से बुलाएगा तो मैं आज भी विवाह और कथा करने को तैयार हूं। करुं भी क्यों न यही तो मेरा कर्म है।

लोगों से अमल करवाना चाहते हैं?च्च् हर आदमी के मन में कोई बात होती है जिसे वह सभी से फॉलो करवाना चाहता है तो ऐसी कोई बात आपके दिमाग में भी है?ज्ज्
जवाब- मैं इतना महान आदमी तो नहीं हंू कि कोई मुझे फॉला करे। फिर भी मन में कई विचार आते हैं जिनसे देश और समाज का भला हो सके को लेकर जरूर सोचता हूं कि लोग भी इन्हें फॉलो करें।

परिवार के लिए समय निकाल पाते हैं?

च्च् आपके पास प्रदेश के पांच महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व है तो क्या कभी खुद के लिए या परिवार के समय मिल पाता है और मिलता है तो आप उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं?ज्ज्
जवाब- मेरा गृह क्षेत्र यहां से ११० किमी दूर है। मैं जब भी अपने क्षेत्र में जाता हूं तो परिवार के साथ ही वक्त बिताता हूं। मेरी तीनों बच्चियों से मैं खूब सारी बातें करता हूं।

Wednesday, August 18, 2010

हाय राम आमदानी बडत जात है

भोपाल. दैनिक भास्कर कई बार बेहतरीन मुद्दों पर खबरें प्रकाशित कर चूका है और इस बार तो वाकई देश कि नब्ज पकड़ ली. मामला पुराना है मगर रोचक है. हो भी क्यों नहीं क्योंकि बात महंगाई कि जो हो रही है. मैं खुद कुछ कहूँ इससे बेहतर है कि आप दैनिक भास्कर डोट कॉम कि खबर पड़े.
नई दिल्ली. लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, विपक्षी पार्टी बीजेपी और उत्तर प्रदेश में शासन कर रही बीएसपी की एक साल की कमाई के आगे भारत पर वर्षों राज करने वाली ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियां कहीं भी नहीं टिकती हैं। भले ही ब्रिटेन का जीडीपी (सकल घरेलू उत्‍पाद) भारत से दोगुना  है, वहां का हर नागरिक औसतन एक भारतीय से 30 गुना ज़्यादा कमाता है, लेकिन भारत की तीन प्रमुख सियासी पार्टियों की आमदनी ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियों की तुलना में 150 गुना से भी ज़्यादा है।
वित्त वर्ष 2008-09 में कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी की साझा आमदनी करीब 786.62 करोड़ रुपये (करीब 8 अरब रुपये) रही, जबकि ब्रिटेन की तीन प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी - ने वित्त वर्ष 2009-10 में महज करीब साढ़े पांच करोड़ रुपये (पाउंड स्टर्लिंग की आज की दर के आधार पर) जुटाए। भारत के राजनीतिक दलों की माली हैसियत सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत डाली गई एक अर्जी के जरिए सामने आई है, जबकि ब्रिटिश राजनीतिक पार्टियों की कमाई का ठोस अनुमान वहां के चुनाव आयोग ने लगाया है।
भारत में 702 राजनीतिक पार्टियां रजिस्टर्ड हैं। इनमें छह पार्टियां राष्ट्रीय हैं। वहीं, ब्रिटेन में 341 राजनीतिक पार्टियां रजिस्टर्ड हैं। ब्रिटेन में चुनाव कराने वाली संस्था 'द इलेक्टोरल कमिशन' की साइट पर मौजूद सूचना के मुताबिक लेबर पार्टी, कंजर्वेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने पिछले साल आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है। लेकिन कमिशन के अंदाज के मुताबिक ये तीनों पार्टियां करीब पौने दो करोड़ रुपये सालाना की आमदनी से ज़्यादा का रिटर्न दाखिल करेंगी। अगर वास्‍तविक आंकड़ा थोड़ा ज़्यादा भी हो, तो भी उनकी आमदनी भारत की तीन सबसे अमीर पार्टियों की सालाना आमदनी के आगे कहीं भी नहीं टिकने वाली होगी है।
गौरतलब है कि ब्रिटेन दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत को दुनिया की 11 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माना जाता है। दोनों देशों में प्रति व्यक्ति आय और जीडीपी के आंकड़े में बड़ा अंतर है। भारत में लोग बेहद गरीब हैं, लेकिन यहां की राजनीतिक पार्टियों के पास अगाध पैसा है।
तीन मानदंडों पर भारत और ब्रिटेन की तुलना
जनसंख्या
भारत: 1 अरब 16 करोड़, ब्रिटेन: 6.20 करोड़
जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद)
भारत: 55 हजार अरब रुपये, ब्रिटेन: 1 लाख अरब रुपये से ज़्यादा
प्रति व्यक्ति आय
भारत: 44 हजार रुपये, ब्रिटेन: 12 लाख रुपये

Monday, August 2, 2010

राम तो घर नहीं दिल में रहते हैं वहा से केसे निकालोगे

भोपाल. मीडिया क्लब पर एक बड़ी उम्दा टिप्पड़ी आई की राम को नकारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है पड़ी और इसको पड़ने के बाद साफ़ हो गाय की राम के अस्तित्व को नकारने वाले बहुत थोड़े हैं लिकिन उनका जवाब देना पड़ता है. वो टिप्पड़ी यहाँ हु-बहु प्रकाशित कर रहे हैं.

 'राम को नकारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी'

Pawan Kumar Arvind 

दिल्ली के दरियागंज स्थित प्रकाशन संस्थान द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक पुस्तक में भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकारने की प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिवाद किया गया है और दलील दी गई है कि इसका सीधा अर्थ तो यह हुआ कि बाकायदा आज भी मौजूद अयोध्या तथा सरयू समेत श्रीराम से जुडे़ अनेक स्थान एवं प्रतीक भी काल्पनिक हैं।
प्रसिद्ध लेखक डॉ. भगवती शरण मिश्र ने अपनी पुस्तक "मैं राम बोल रहा हूँ" में लिखा है- "राम को नकारने वालों को सरयू, अयोध्या, चित्रकूट, कनक, लक्ष्मण किला, हनुमान गढ़ी, रामेश्वरम, जनकपुर आदि को भी नकारना होगा।
इस पुस्तक में लेखक वर्तमान परिस्थितियों पर भगवान श्रीराम के ही मुंह से बेबाक टिप्पणियां करता है और कहता है कि राम को नकारना तो बहुत आसान है पर उनके प्रतीकों को मिटाना दुष्कर ही नहीं असम्भव भी है।
डॉ. मिश्र ने भगवान राम के माध्यम से जो दलीलें दी हैं वे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं- 'राम को नकारोगे तो अयोध्या को भी नकारना पडे़गा। इस पूरे नगर और इसमें गली-गली में स्थित मंदिरों, मठों के अस्तित्व को भी झुठलाना होगा। इसकी विभिन्न छोटी- बडी इमारतों को भी, क्योंकि तब ये सभी एक कल्पना प्रसूत नगर के अंश हो जाएंगे। अयोध्या को नकारो तो कनक भवन के सदृश करोड़ो रुपयों से निर्मित विशाल मंदिर को भी नकारना होगा क्योंकि उसमें राम-सीता अवस्थित हैं और सरयूतीर स्थित वह भव्य लक्ष्मण किला इसे तो लक्ष्मण द्वारा ही निर्मित किया गया था। उसके अस्तित्व को भी नकारना होगा। एक मिथ्या को मिटाना होगा।'
उन्होंने लिखा है- "इस सरयू का क्या करोग, इसे सुखा दोगे, यह तुम्हारे वश की बात नहीं। फिर इसके उद्गम पर ही रोक लगा दो। कुछ कोसों तक भूमि ही जलमग्न होगी न कुछ लोग ही तो विस्थापित होंगे। तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं। नर्मदा-परियोजना में तुमने यह सब देखा-झेला है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है, अब भी नहीं बिगड़ेगा। एक अर्थहीन नदी से तो मुक्ति मिलेगी। पर ध्यान देना, तुम्हारे देश की नदियां ही तुम्हारी जीवन रेखा हैं। इसके किनारे ही नगर-गांव आबाद हुये हैं। सभ्यता-संस्कृति पनपी है। तुम्हारा देश कृषि प्रधान है। कृषि के लिये जल चाहिए। सरयू को मिटाओगे तो इसके तीर बसे नगर-गांव उजड़ जायेंगे। सहस्त्रों की संख्या में इन उजड़े लोगों का क्या करोगे, भारी समस्या है। कुछ बोलने. कुछ करने से पहले सोचना आवश्यक है।

Sunday, July 25, 2010

बिन सावन भारत सून

भोपाल. भारत में त्योहारों और व्रत का बड़ा महत्व है. अगर व्रत, त्यौहार को ख़त्म कर दिया जाए तो भारत की पहचान पर खतरा हो जाएगा. इस कड़ी में सावन का महिना अति विशिष्ट महिना है और इसका अपना महत्व है. सावन माह में शिवभक्तों द्वारा की जाने वाली भगवान शिव की आराधना, पूजा, जयकारे और धार्मिक आयोजन ऐसा शिवमय वातावरण बना देते हैं कि उसके प्रभाव से ईश भक्ति से दूर रहने वाले लोगों के मन भी शिवभक्ति और श्रद्धा की लहर पैदा हो जाती है। इससे यही प्रश्र हर धर्मजन के मन में पैदा होता है कि आखिर श्रावण मास और शिव भक्ति का क्या संबंध है और इस मास में शिव उपासना का इतना अधिक महत्व क्यों है। इस बात का उत्तर हिन्दू धर्म ग्रंथ ऋग्वेद में बताया गया है। वेदों में प्रकृति और मानव का गहरा संबंध बताया गया है। वेदों में लिखें कुछ मंत्रों का संदेश कुछ इस प्रकार है -
बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ और धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और इस दौरान वह ऐसे मंत्रों को पढ़ते हैं, जो सुख और शांति देने वाले होते हैं। बारिश के मौसम में अनेक तरह के जीव-जंतु बाहर निकल आते है और तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती है। ऐसा लगता है कि जैसे लंबे समय तक व्रत रखकर सभी ने अपनी चुप्पी तोड़ी हो। इस बात के द्वारा संदेश दिया गया है कि जिस तरह जीव-जंतु बारिश के मौसम में बोलने लगते हैं, उसी तरह से हर व्यक्ति को श्रावण से शुरु होने वाले चार मासों में धर्म और ईश्वर की भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ करना या सुनना चाहिए। इसी प्रकार बारिश या सावन मास में अनेक प्रकार के पौधे पैदा होते हैं, जो औषधीय गुणों के होते हैं। यह हमारी आयु और शरीर सुखों को बढ़ाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से पूरी प्रकृति ही शिव का रुप है। इसलिए प्रकृति की पूजा के रुप में सावन मास में शिव की पूजा की जाती है। खास तौर पर वर्षा के मौसम जल तत्व की अधिकता होती है। इसलिए शिव का जल से अभिषेक सुख, समृद्धि, संतान, धन, ज्ञान और लंबी उम्र देने वाला होता है।

 
अनिल सिरवैया द्वारा भेजा गया भजन
इक  जरा छींक ही दो तुम
चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
ओरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो
-अनिल सिरवैया
 रिपोर्टर, पीपुल्स समाचार

पाकिस्तान के बारे में सही कहा था मनीष कोइराला ने


भोपाल. जो एक बार गलती करे वो इन्सान, जो दो बार गलती करे वो हिंदुस्तान और जो गलती पर गलती करे वो पाकिस्तान. ये लाइन किसी फिल्म में मनीषा कोईराल ने बोली थी. फिल्म तो पिट गई लेकिन डाईलाग हिट हो गया, और होता भी क्यों नहीं आखिर मनीषा ने सच जो कहा था. ये बात आज पाकिस्तान ने एक बार फिर साबित कर दी है. कश्मीर मुद्दे को लेकर हमेशा से ही अड़ियल रवैया इख्तियार करने वाले पाकिस्तान ने अब एक बार फिर भारत से साफ़- साफ़ कहा है कि जब तक भारत-पाक वार्ता के एजेंडे में कश्मीर मुद्दा शामिल नहीं होता वह भारत से कोई बात नहीं करेगा। 
पाक विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत कश्मीर मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देगा,तो हम बातचीत जारी नहीं रख पाएंगे। अमेरिका के सामने भी अलापा था राग कश्मीर भारत- पाक वार्ता के तत्काल बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने कश्मीर मुद्दा उठाया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से बातचीत के दौरान कहा की पाकिस्तान,भारत के साथ वार्ता जारी रखना चाहता है लेकिन इसके लिए भारत संग कश्मीर मसले पर बात होना बेहद ज़रूरी है।
ये सब हो रहा है और हमारे कर्णधार जिन्हें हमने अपना जीवन चलने का अधिकार सौंपा है कह रहा है की नहीं अभी हालत बिगड़े नहीं है. खैर बात भारत की थी तो दिल का दर्द सामने ले आया. वर्ना तो हम भी खुश है इस हिंदुस्तान में. 
ऐसा भी है पाकिस्तान, मुलायजा फरमाइए-

Friday, July 16, 2010

फर्जी वाडा करो,फिर कमाओ और पकडे जाओ तो घर बैठकर खाओ

भोपाल से...
हमारे देश में दलालों और बेईमानो के लिए बहुत जगह है. अब पुरे देश का हिसाब तो अभी नहीं बताया जा सकता है, लेकिन भोपाल में हुए आज एक फैसले से कुच्छ तो दावा किया ही जा सकता है.  गुरूवार को मध्य प्रदेश शासन मैं कम करने वाले 17 अफसरों के जाती प्रमाण पात्र फर्जी पाए गए. अब सवाल ये उठता है की इनमे से कई के खिलाफ तो पहले भी जांच हो चुकी हैं और इन्ही अफसरों को बा-इज्ज़त बरी भी कर दिया गया था तो क्या वे जांच रिपोर्ट फर्जी थी और नहीं तो क्या गलत जांच करने के लिए उन अफसरों को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री उन्हें दण्डित करेंगे.

धोखेबाज हैं ये 17 अफसर
भोपाल. संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों की जांच करने सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनी छानबीन समिति ने 15 अधिकारी-कर्मचारियों के अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए हैं। इनमें भारतीय वन सेवा के अफसर से लेकर राज्य पुलिस सेवा और मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं।
समिति ने पाया है कि न केवल नौकरी और पदोन्नति में बल्कि मेडिकल कॉलेज में दाखिले तक में गलत जाति प्रमाण पत्र से लाभ उठाया गया। अन्य पिछड़ा वर्ग और ब्राम्हण जाति के लोग भी इस फर्जीवाड़े में शरीक हैं। सरकार ने संबंधित जिलों के कलेक्टर और एसपी को इन अफसरों के जाति सर्टिफिकेट निरस्त करने का आदेश दिया है।
इनके खिलाफ अगली कार्यवाही करने को कहा गया है, इसमें सेवा से बर्खास्तगी शामिल है। राज्य स्तरीय छानबीन समिति के सामने 19 मामले थे। इनमें से महज एक प्रमाण पत्र सही पाया गया जबकि एक मामला हाईकोर्ट में लंबित होने की वजह से उस पर निर्णय नहीं लिया गया। आदिम जाति कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव समिति के अध्यक्ष, केंद्रीय अजजा आयोग के निदेशक एवं राज्य अजजा आयोग के सचिव, आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के संयुक्त संचालक समिति के सदस्य हैं।
एके भूगांवकर भारतीय वन सेवा (राज्य वन सेवा से पदोन्नत) भोपाल
वीके भूगांवकर चीफ इंजीनियर पीडब्ल्युडी भोपाल
पीरन सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बहादुर सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बादाम सिंह मीना जिला रोजगार अधिकारी
नागेश्वर सोनकेसरी सहायक आबकारी आयुक्त मंदसौर
खुशेंद्र सोनकेसरी एमपीपीएससी से डीएसपी चयनित
पूनम खंतवाल पुलिस सब इंस्पेक्टर भोपाल
राकेश कश्यप सेक्शन ऑफिसर मंत्रालय
जयेंद्र सिंह तंवर व्याख्याता आदिम जाति कल्याण विभाग अलीराजपुर
शशिकला धकाते लिपिक वन विभाग छिंदवाड़ा
रेखा सहकाटे स्टेनोग्राफर मंत्रालय
अरुणा चौधरी स्टॉफ नर्स जबलपुर
कपिल कुमार जोशी स्टेट बैंक इंदौर में मैनेजर थे
भागीरथ रायक जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी
प्रेमशंकर धानका अध्यापक पद के लिए आवेदन किया था

फर्जी प्रमाण पत्र की जगह नया सर्टिफिकेट कर लिया मंजूर : अनुसूचित जाति के संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच की राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने एक प्रमाण पत्र को फर्जी पाया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की। विकास आयुक्त कार्यालय के लिपिक गौतम कठाने ने 1980 में जो जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर नौकरी हासिल की, जांच में कलेक्टर छिंदवाड़ा ने फर्जी पाया।
कलेक्टर ने समिति को भेजी रिपोर्ट में कहा कि यह प्रमाण पत्र जारी ही नहीं हुआ। कठाने ने 2005 में तैयार कठाने ने महार जाति का प्रमाण पत्र पेश किया, समिति ने उसे मान लिया क्योंकि जांच में पाया गया कि वे महार जाति के ही हैं। लेकिन फर्जी प्रमाण पत्र से 25 वर्ष सेवा करने और लाभ लेने के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इनका मामला कोर्ट में
समिति ने कर्मचारी महेंद्र सिंह के संदिग्ध जाति प्रमाण पत्र मामले में कोई निर्णय नहीं लिया, क्योंकि प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित है। समिति ने सुनवाई का पूरा मौका देकर जांच के बाद 16 अधिकारी, कर्मचारियों के सर्टिफिकेट निरस्त करने की सिफारिश की है। संबंधित जिलों के कलेक्टरों को कार्यवाही करने के आदेश दिया गया है। 

अरुण कोचर,आदिवासी विकास आयुक्त मप्र

भोपाल में पदस्थ लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता वीके भूगांवकर उनके भाई एके भूगांवकर के प्रमाण पत्र में उन्हें आदिवासी जाति हल्बा का बताया गया है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं जो ओबीसी में आती है। उनके पिता मंत्रालय की सेवा में रहे थे और वे ओबीसी में ही थे। वीके भूगांवकर ने अजा वर्ग के आरक्षण का सेवा में लाभ लिया लेकिन स्कूल शिक्षा प्रमाण पत्रों में उन्हें ब्राम्हण दर्शाया गया है। इनका जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बना।
राज्य वन सेवा से भारतीय वन सेवा में पदोन्नत हो चुके प्रेमशंकर धनका गड़रिया जाति के पाए गए जो अनुसूचित नहीं बल्कि ओबीसी में है। धनका ने नरसिंहपुर से प्रमाण पत्र बनवाया। जिला रोजगार अधिकारी पदस्थ बादाम सिंह मीना लटेरी में निवास के आधार पर अजजा का लाभ रहे थे, वे जांच में गुना जिले के निवासी पाए गए जहां मीना जाति आदिवासी वर्ग में नहीं आती। इन्होंने विदिशा से जाति प्रमाण पत्र बनवाया।
मंदसौर में पदस्थ आबकारी विभाग में सहायक आयुक्तनागेश्वर सोनकेशरी और उनके भाई डीएसपी खसेंद्र सोनकेसरी का जाति प्रमाण पत्र भी हल्बा जाति का है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं। नागेश्वर का प्रमाणपत्र भोपाल के कमलानगर क्षेत्र में निवास का बना है।
कमलानगर के जिस मकान में रहना दर्शाया गया उसके मालिक ने इंकार कर दिया कि नागेश्वर नाम का किरायेदार उनके यहां रहा। इनका जाति प्रमाण पत्र मंडला से जारी हुआ।
सर्टिफिकेट कैसे-कैसे
राकेश कश्यप ने कीर जाति के प्रमाण पत्र से नौकरी हासिल की वे ढीमर जाति के पाए गए जो अजजा में नहीं है। जयेंद्र सिंह तंवर ने झाबुआ से कंवर जनजाति का सर्टिफिकेट पर नौकरी प्राप्त की। प्रमाण पत्र गलत पाया गया।
शशिकला धकाते आदिम जाति अनुसंधान संस्थान में पदस्थ हैं, उनका हल्बा अजा जाति प्रमाण पत्र गलत मिला। वे भी कोष्टा जाति की हैं। भिलाला जाति के प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी कर रहे भागीरथ रायक काछी जाति के पाए गए। इन्हें छिंदवाड़ा से जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया।
ये भी दूध के धुले नहीं
रेखा सहकाटे की जाति महाराष्ट्र में अजजा में है मप्र में नहीं। इनका प्रमाण पत्र भोपाल से जारी किया गया। पूनम खंतवाल पौढ़ी गढ़वाल की मूल निवासी हैं लेकिन मप्र में अजजा नागवंशी का जाति प्रमाण पत्र लेकर नौकरी पाई।
जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बनवाया। कपिल कुमार जोशी ने भी फर्जी अजजा प्रमाण पत्र से नौकरी पाई और जांच में वे ब्राम्हण पाए गए। इन्होंने भोपाल से प्रमाण पत्र बनवाया। पीरन सिंह और बहादुर सिंह गिल का गोंड जाति प्रमाण पत्र फर्जी मिला, वे अनुसूचित जाति के हैं।
पीरन सिंह होमगार्ड में कंपनी कमांडर हैं। इन्होंने सागर से प्रमाण पत्र बनवाए। कंवर जाति प्रमाण के आधार पर एमबीबीएस कर रही ज्योति छत्तरी जांच में ताम्रकार पाई गईं जो ओबीसी में है। ज्योति ने इंदौर से प्रमाण पत्र बनवाया।

पूरा हुआ लक्ष्मण का बनवास

भोपाल से... एक लम्बे समय तक लक्ष्मण सिंह कांग्रेस से दूर रहे और आज बदजुबानी को बहाना बनाकर भाजपा ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. ये सभी के लिए एक सबक है, जिसमे साडी बातें सामने आ जाती हैं. दरअसल लक्ष्मण सिंह का मन तभी से पार्टी में नहीं लएजी रहा था जबसे भाजपा केंद्र के चुनाव हरी और उसके बाद में खुद लक्ष्मण सिंह अपने ही भाई की तरफ से खड़े किये गए गए प्यादे से हार गए. बदजुबानी तो पहले भी हुई है लेकिन निर्णय आज ही क्यों कर दिया गया. शायद लक्ष्मण सिंह भी यही चाहते थे क्योंकि वे व्ही अपनी अयोध्या से बहुत दिनों तक दूर नहीं रह सकते हैं. आख़िरकार बहाना कोई भी हो लेकिन आज लक्ष्मण का वन्बास तो पूरा हुआ. 

(दैनिक भास्कर की खबर पड़ने के लिए किल्क करैं)
 खबर आज की जिसमे है पूरा घटनाक्रम...
भोपाल. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के अनुज और पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह को प्रदेश भाजपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। नितिन गडकरी के खिलाफ बयानबाजी के चलते यह कार्रवाई हुई है। हाल ही में गडकरी ने दिग्विजय सिंह के बारे में कहा था कि आतंवादियों की तरफदारी करने वाले औरंगजेब की औलाद हैं।
इस टिप्पणी के बाद लक्ष्मण सिंह ने खुलकर गडकरी की आलोचना की थी। तभी से उन पर कार्रवाई की तलवार लटक रही थी। उधर लक्ष्मण सिंह ने दैनिक भास्कर से चर्चा में कहा कि उन्हें इस कार्रवाई से कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि गडकरी और उनके नेतृत्व में भाजपा इन दिनों जिस तरह की भाषा बोल रही है वह निरंकुश और हिटलरशाही प्रवृत्ति को दर्शाती है। हाल ही मप्र में मंत्रियों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई हुई है वह इसकी पुष्टि करती है।उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह के समय भाजपा सही रास्ते पर थी। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। लक्ष्मण सिंह ने कहा कि गडकरी ने उनके परिवार के खिलाफ जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया उसके बाद उनका चुप रहना असंभव था।
भविष्य के बारे में विचार नहीं-लक्ष्मण सिंह ने कहा कि उन्होंने अभी यह तय नहीं किया है कि वह कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी से जुडें़गे। मैं सामाजिक कार्यकर्ता की तरह काम करुंगा।
इसलिए आए थे भाजपा में
लक्ष्मण सिंह ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। इसलिए वे भाजपा से जुड़े थे। सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते क्या वे फिर कांग्रेस में लौटेंगे? इसका उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। सात साल तक नाता रहा भाजपा से
2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान ब्यावरा में उमा भारती की मौजूदगी में आयोजित एक कार्यक्रम में लक्ष्मण सिंह कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें 2004 के लोकसभा चुनाव में राजगढ़ लोकसभा सीट से टिकट दिया और वे विजयी हुए। 2009 में भी वह भाजपा के टिकट पर इसी सीट से चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार नारायण सिंह अमलाबे के हाथों पराजित हो गए। वे राजगढ़ से कुल पांच बार सांसद रहे। इनमें से चार बार वह कांग्रेस के टिकट पर जीते थे. 

जगह तो अच्छी है लेकिन क्या गारंटी है की सरकार फिल्मवालों को परेशान नहीं करेगी?

भोपाल. जब भी कही कोई बड़ा बदलाव आता है तो सबसे पहले कुछ छोटी और फिर बड़ी घटनाएं हो जाती हैं. भोपाल के मामले में थोडा उल्टा रहा. इस शहर को पहचान दी एक हादसे ने जिसे न चाहते हुए भी याद करना पड़ता है. यानी गैस कांड. एक लम्बे अन्तराल के बाद एक फिर भोपाल में सुखद बयार बह रही है और वह है भोपाल और उसके आसपास हो रही फिल्मों की शूटिंग जिसने भोपाल को फिर एक नई पहचान देना शुरू कर दी है. अब सवाल एक ही है की क्या जिस तरीके से फिल्म की शूटिंग करने वालों को भोपाल लाने का मन बनाया है क्या उसी तरह इसको जारी भी रखा जाएगा. बहरहाल इस  सवाल का जवाब भले ही बाद में मिले लेकिन भोपाल में फिल्मों के लिए कितनी संभावनाए हैं ये जिक्र भास्कर न्यूज़ की वेबसाइट ने बहुत बेहतर ढंग से दिखाई हैं. 
मिनी बॉलीवुड बनने को बेताब लेक सिटी
भोपाल. झीलों की नगरी भोपाल जल्दी ही फिल्मों के लिए हब बनने जा रहा है। फिल्म इंस्डस्ट्री से लेकर मध्य प्रदेश की सरकार तक इस प्रयास में लगी है कि जल्द से जल्द भोपाल में एक ऐसी फिल्म सिटी का निर्माण हो जाए, जहां बॉलीवुड के लोग बिना किसी हिचक के फिल्मों का निर्माण कर सकें। इसके लिए भोपाल के पास बगरोदा में 430 एकड़ जमीन भी चिंहित कर ली गई है।
पूरा भोपाल और मप्र है शूटिंग के लिए आइडियल
राजधानी में फिल्मों की शूटिंग के लिए एक से बढ़कर एक लोकेशंस है। जिसे कुछ दिनों पहले आई फिल्म राजनीति में भी देखा जा सकता है। भोपाल का गौहर महल, सदर मंजिल, इस्लाम नगर, बोट क्लब, लेकव्यू, तवा, देलावाड़ी, केरवा, भीमबैठका, चिड़ियाटोल, रातापानी अभ्यारण्य, कोलार डेम, कठोतिया, बेनजीर पैलेस, अहमदाबाद पैलेस, कमलापति महल, मनुआभान टेकरी, वीआईपी रोड, रेल कोच, ताजमहल शूटिंग के लिए बेहतर स्थान है।
तैयार है कंस्पेट नोट
मप्र सरकार प्रदेश में फिल्म सिटी बनाने के लिए पूरी तरह तत्पर है। इसके लिए बकायदा एक कंस्पेट नोट भी बना लिया गया है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि सरकार फिल्म निर्माताओं को क्या सुविधा देगी। मप्र सरकार के संस्कृति मंत्री लक्ष्मी नारायण शर्मा कहते हैं कि हमारा पूरा प्रयास है कि जल्द से जल्द फिल्म सिटी बन कर तैयार हो जाए। इसके लिए हमने जमीन का भी चुनाव कर लिया है। जो भी फिल्म निर्माता यहां फिल्म बनाएगा, उसे पर्याप्त सुविधाओं के साथ कर में भी छूट दी जाएगी। वहीं, संस्कृति विभाग के निदेशक श्रीराम तिवारी कहते हैं कि मैंने फिल्म सिटी के लिए कंस्पेट नोट तैयार कर लिया है। जिसे सरकार को दिया जाएगा। फिल्म सिटी पर कोई भी फैसला राज्य सरकार ही करेगी।
जब कई फिल्मों में दिखा भोपाल
भोपाल में साठ सालों से लगातार फिल्मों की शूटिंग हो रही है। दिलीप कुमार अभिनीत नया दौर से लेकर वर्ष २क्क्९ में प्रकाश झा की विवादित फिल्म राजनीति की अधिकांश शूटिंग इसी शहर में हुई है। इसके अलावा भोपाल को लेकर कई किताबें और फिल्में भी बन चुकी हैं। जिसमें सबसे अधिक ख्यात फिल्में सूरमा भोपाली, भोपाली एक्सप्रेस, वो तेरा नाम था हैं, शामिल हैं।
भोपाल में बनेगा राष्ट्रीय नाटच्य विद्यालय
दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में भी राष्ट्रीय नाटच्य विद्यालय बनाने की योजना है। इसके लिए सरकार पूरी तरह तैयार है। इस विद्यालय के भोपाल में बन जाने के बाद फिल्मों की शूटिंग के लिए बड़े पैमाने पर अच्छे कलाकार मिल सकेंगे।
भोपाल क्यों बेहतर है फिल्म सिटी के लिए
भोपाल की सबसे बड़ी खासियत उसका देश के बीचोंबीच में होना है। जिसके कारण न सिर्फ रेल बल्कि सड़क और हवाई यातायात से भी यह शहर जुड़ा हुआ है। इसके अलावा यहां कई झीलें हैं। जो कि फिल्मों के लिए अच्छी लोकेशन साबित हो सकती है। वहीं, भोपाल की हरी-भरी वादियां और यहां का खूबसूरत मौसम भी फिल्म निर्माताओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसके अतिरिक्त अन्य शहरों की तुलना में भोपाल आज भी काफी सस्ता है। इंडस्ट्री से जुड़ी सामग्री और सुविधाएं यहां सस्ती मिलती हैं। इसके अलावा यहां ऐसे कलाकारों की भी भरमार है जिन्हें फिल्मों में काम करने का अनुभव है।
फिल्म अभिनेता रजा मुराद कहते हैं कि भोपाल की अधिकांश जगह अभी भी पूरी तरह वर्जिन है। यहां कई ऐसे स्थान हैं, जिसका उपयोग फिल्मों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। मसलन जैसे राजा भोज का मंदिर हो या फिर भीम बैठका। ये सभी लोकेशन फिल्मों के लिए बहुत खूबसूरत हैं। मुराद आगे कहते हैं कि फिल्म सिटी का पूरा प्रस्ताव अभी कागजों पर ही है लेकिन जिस दिन वह पूरा हो जाएगा, उस दिन बॉलीवुड को एक खूबसूरत लोकेशन मिल जाएगी।
मिले अधिक से अधिक सुविधाएं
बॉलीवुड से जुड़े फिल्म निर्माताओं भोपाल में फिल्म बनाने को तैयार हैं बशर्ते यदि उन्हें और अधिक सुविधाएं मिलें। रजा मुराद कहते हैं कि यदि सरकार फिल्मों के लिए सभी जरुरी सुविधाएं मुहैया कराती हैं तो बड़ी संख्या में फिल्म निर्माता भोपाल का रुख कर सकेंगे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर संस्कृति व पर्यटन मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा तक कह चुके हैं कि यदि राज्य में किसी फिल्म की पचास फीसदी या इससे अधिक शूटिंग होती है तो मनोरंजन कर में पचास फीसदी की छूट मिलेगी। प्रस्तावित फिल्म सिटी भोपाल के पास बगरोदा में बनना है।
पैनोरमा फिल्म समारोह से बॉलीवुड को रिझाया
फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भोपाल में सोलह साल बाद फिर से भारतीय पैनोरमा फिल्म समारोह शुरु हुआ है। इसमें भाग लेने के लिए बॉलीवुड के कई कलाकारों ने यहां शिरकत की। जिसमें अनुपम खेर पमुख थे। राज्य सरकार ने इस कार्यक्रम के माध्यम से फिल्म निर्माताओं को रिझाने की कोशिश की।
फिल्म निर्देशकों का कहना है कि भोपाल में लोकेशंस से लेकर यहां तहजीब तक शानदार है। इसका यदि उपयोग फिल्मों में किया जाए तो न सिर्फ भोपाल के साथ न्याय होगा बल्कि बॉलीवुड को भी एक आर्कषक लोकेशंस मिल जाएगी। कुछ दिनों पहले ही भोपाल में अपनी नई फिल्म के लिए लोकेशन देखने आए फिल्म निर्देशक मुज्जफर अली को यहां की तहजीब और संस्कृति ने काफी लुभाया। वे कहते हैं कि भोपाल एक बहुत खूबसूरत शहर है। भोपाल गैस त्रासदी पर उन्होंने शीशों का मसीहा नामक एक फिल्म बनाई थी। फिलहाल अली भोपाल में अपनी अगली फिल्म की शूटिंग की तैयारी कर रहे हैं।
बॉलीवुड से लेकर टेलीविजन तक में है भोपाल का दबदबा
बॉलीवुड की बात करें या फिर टेलीविजन की दुनिया की। हर जगह भोपाल का काफी दबदबा देखने को मिलता है। वरिष्ठ कलाकार से लेकर कई लेखक तक भोपाल से जाकर अपनी किस्मत अजमाएं हैं। चाहे वह जया बच्चन के जीजा राजीव वर्मा हों या फिर मॉडल से अभिनेता बने शावर अली खान।
भोपाल पर फिदा हैं सितारे
झीलों की नगरी को जो भी पहली बार देखता है, वह फिदा हो जाता है। चाहे वह आमिर खान हो या फिर रणवीर कपूर। रणवीर कपूर कहते हैं कि भोपाल आने से पहले मैं काफी चिंता में था। लेकिन शूटिंग के दौरान पता चला कि यहां के लोग काफी अच्छे हैं। रणवीर बार-बार भोपाल आना चाहते हैं। वे कहते हैं कि हिंदुस्तान के अन्य शहरों में कई बार शूटिंग के लिए जाना होता है लेकिन भोपाल की बात ही कुछ और है। राजनीति फिल्म की शूटिंग के दौरान जब कैटरीना कैफ भोपाल आई थीं तो उन्हें पहली ही नजर में भोपाल से प्यार हो गया था। वे कहती हैं कि यह शहर पहली नजर में ही पसंद आ गया। यह शांति, हरियाली और खुशमिजाज लोगों का शहर है। किसी शहर की इससे अच्छी पहचान क्या हो सकती है।
रजा मुराद ने दैनिक भास्कर डॉट कॉम को बताया कि भोपाल बहुत खूबसूरत शहर है। यह अभी भी पूरी तरह ऐसा शहर है जिसे छूआ नहीं गया है। यदि यहां फिल्मों की शूटिंग की जाए तो काफी अच्छा होगा। रजा मुराद की बात को आगे बढ़ाते हुए फिल्मकार केतन देसाई कहते हैं कि कुछ दिनों पहले ही नए प्रोजेक्ट के लिए लोकेशन देखने भोपाल आए थे। देसाई कहते हैं कि उन्हें भोपाल और आसपास की कई जगह काफी पसंद आई। वे अपने कई प्रोजेक्ट यहां शुरु करने वाले हैं।
भोपाल के सितारे
फिल्मों में : अनू कपूर, जावेद अली, जावेद अख्तर, शावर अली, रजा मुराद, सैफ अली खान, राजीव वर्मा, जया बच्चन
टीवी में : सारा खान।
भोपाल और आसपास के इलाके में शूटिंग : नया दौर, राजनीति, एक विवाह ऐसा भी, पीपली लाइव, शूल, युवा, तहीकात।

Thursday, July 8, 2010

पार्टी नहीं खुद का दम भी चलता है

भोपाल.बार-बार ये बात सामने आती है की पार्टी बड़ी है या फिर व्यक्ति. लेकिन एक बार ये बात साबित हो गई की व्यक्ति का अपना कद होता है. आंध्र प्रदेश से कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रे़ड्डी ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा उठा कर ye बात साबित कर दी. जिस प्रकार उनको जनता का समर्थन मिला है वह काबिले गौर है. हालाँकि इसमें एक दर ये भी है की कही जगमोहन का हश्र उमा भारती के जैसा न हो जाए. खैर कल के बारे में किसने सोचा है. जगमोहन ने सोनिया गांधी के मना करने के बावजूद अपने पूर्व तय कार्यक्रम के मुताबिक ही आठ जुलाई से श्रीकाकुलम से अपनी उदार्पू (दिलासा यात्रा) शुरू करने का फैसला किया है। जगनमोहन ने जनता के नाम सोमवार को लिखे अपने खुले पत्र में कहा है कि वह हर सूरत में . अपनी यात्रा शुरू करेंगे। उनका कहना है कि उसी दिन के पिता वाईएसआर का जन्मदिन है इसलिए यात्रा शुरू करने के लिए इससे अच्छा कोई और दिन नहीं हो सकता। जगन की इस यात्रा का जाहिर तौर पर उद्देश्य यह है कि वह उन परिवारों को दिलासा देना चाहते हैं जिनके सदस्यों की वाईएसआर की मौत की खबर सुनकर सदमे के कारण मौत हो गई थी अथवा उन्होंने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी।
इस यात्रा ने मार्च के महीने में उस समय एक विवादास्पद मो़ड़ ले लिया था जब जगन ने तेलंगाना में अपनी यात्रा ले जाने की कोशिश की और तेलंगाना राज्य के समर्थकों ने उसे रोका। इससे हिंसा भ़डक उठी और पुलिस ने जगन को गिरफ्तार कर लिया। उसकोलेकर जगन और कांग्रेस आलाकमान के बीच काफी क़डवाहट बढ़ गई। आखिर जगन को अपनी यात्रा स्थगित करनी प़डी, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जगन को यात्रा की अनुमति नहीं दी।
खुद जगन ने अब जनता के नाम अपने खुले पत्र में कहा है कि गत महीने उन्होंने उनकी मां और छोटी बहन के साथ सोनिया गांधी से भेंटकर स्पष्ट किया था कि उनकी यह यात्रा क्यों जरूरी है, लेकिन इसके बाद भी सोनिया यात्रा के पक्ष में दिखाई नहीं दी। जगन ने कहा कि वह एक महान नेता के बेटे होने के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं और अपने पिता की मौत के स्थान पर उन्होंने जनता से जो वादा किया था, उसे निभाना चाहते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें केवल अपनी रक्ता ही नहीं बल्कि स्वभाव भी दिया है। चुनौती देने वाले अंदाज में जगन ने आगे कहा है कि उनके लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण बात नहीं है कि वह कितना लंबा जीते हैं बल्कि यह बात अहम है कि वह किस अंदाज में जीते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन देते हुए कहा है कि वह ओदर्यू यात्रा निकालने और हर दुखी परिवार को दिलासा देने का जो वादा किया है, उसे जरूर पूरा करेंगे। अपने सोनिया गांधी से मतभेदों के बारे में जगन कहते हैं कि पिछली भेंट में सोनिया गांधी ने उनसे कहा था कि वह यात्रा निकालने के बजाए सारे दुखी परिवारों को एक जगह बुलाएं और उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दें। इस पर उनकी मां विजयलक्ष्मी ने सोनिया गांधी से कहा कि यह बात अच्छी परंपराओं के विरूद्ध होगी। उन्होंने सोनिया गांधी को यह भी याद दिलाया कि जब उनके पति (वाईएसआर) का निधन हो गया था तो सोनिया ने दिल्ली से हैदराबाद आकर उनके परिवार को दिलासा दी थी, न कि परिवार को दिल्ली बुलाया था। दूसरी ओर इस यात्रा से पहले ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस दो गुटों में बंट गई है। मुख्यमंत्री रौसय्या के समर्थक जगनमोहन रेड्डी का विरोध कर रहे हैं और जगन के समर्थक मुख्यमंत्री को निशाना बना रहे हैं। वाईएसआर का जन्मदिन भी टकराव का कारण बन गया है।
जगन चाहते हैं कि सभी विधायक और मंत्री श्रीकाकुलम में उनके कार्यक्रम में आकर उनके पिता को श्रद्धांजलि दें जबकि ऎसी किसी कोशिश को विफल करने के लिए सरकार ने उस रोज विधानसभा का सत्र बुला लिया है और कहा है कि वाईएसआर का जन्मदिन समारोह हैदराबाद में ही मनाया जाएगा। गौरतलब है कि गत सितंबर में उनके पिता की मौत के बाद करीब सभी विधायकों ने जगन को नया मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी और कई मंत्रियों ने भी इसका समर्थन किया था, मगर आलाकमान ने इसे खारिज करते हुए रौसय्या को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी से सीधी टक्कर में कितने मंत्री और विधायक जगनमोहन रेड्डी का साथ देते हैं

Wednesday, July 7, 2010

सेवा करते हैं या फिर केवल आबादी बड़ा रहे हैं

भोपाल. एनजीओ नाम सुनते ही जेहन में सेवा शब्द कौंध जाता है, लेकिन जिस प्रकार से एनजीओ की संख्या बढ रही है उसकी अपेक्षा काम दिखाई नहीं दे रहा है. दैनिक भास्कर की एक खबर से ये कारण एकदम स्पष्ट हो जाता है. भारत में गैर सरकार, गैर लाभकारी संस्‍थाओं या एनजीओ की बाढ़ आई हुई है। यहां सक्रिय एनजीओ की संख्‍या दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा है। एक सरकारी अध्‍ययन के मुताबिक 2009 तक इनकी संख्‍या 33 लाख थी। यानी प्रत्‍येक 400 से भी कम भारतीयों पर एक एनजीओ।
यह संख्‍या वास्‍तविक संख्‍या से कहीं कम होगी, क्‍योंकि सरकारी अध्‍ययन में की गई गणना 2008 की ही है। साथ ही, इस गणना में केवल उन्‍हीं संगठनों को शामिल किया गया, जो सोसायटीज रजिस्‍ट्रेशन एक्‍ट, 1860 या फिर मुंबई पब्लिक ट्रस्‍ट एक्‍ट और इस तर्ज पर दूसरे राज्‍य में लागू काननू के तहत निबंधित हैं। जबकि एनजीओ का निबंधन कई कानूनों के तहत कराया जाता है। इमनें इंडियन ट्रस्‍ट एक्‍ट, 1882, पब्लिक ट्रस्‍ट एक्‍ट 1950, इंडियन कंपनीज एक्‍ट, 1956 (धारा 25), रिलीजियस एंडोमेंट एक्‍ट, 1863, चैरिटेबल एंड रिलीजीयस ट्रस्‍ट एक्‍ट, 1920, मुसलमान वक्‍फ एक्‍ट, 1923, वक्‍फ एक्‍ट, 1954 और पब्लिक वक्‍फ्स (एक्‍सटेंशन ऑफ लिमिटेशन एक्‍ट), एक्‍ट, 1959 आदि शामिल हैं।
महाराष्‍ट्र में सबसे ज्‍यादा एनजीओ
सरकारी आंकड़े के मुताबिक सबसे ज्‍यादा (4.8 लाख) एनजीओ महाराष्‍ट्र में निंबंधित हैं। इसके बाद आंध्र प्रदेश (4.6 लाख), उत्‍तर प्रदेश (4.3 लाख), केरल (3.3 लाख), कर्नाटक (1.9 लाख), गुजरात (1.7 लाख), पश्चिम बंगाल (1.7 लाख), तमिलनाडु (1.4 लाख), ओडि़शा (1.3 लाख) और राजस्‍थान (1 लाख) का नंबर है। इन दस राज्‍यों में ही 80 फीसदी से ज्‍यादा एनजीओ हैं।
80 हजार करोड़ रुपये का सवाल
अनुमान है कि ये संस्‍थाएं हर साल 40 हजार से 80 हजार करोड़ रुपये के बीच जुटा लेते हैं। सबसे ज्‍यादा पैसा तो सरकार से ही आता है। ग्‍यारहवीं योजना के दौरान सामाजिक क्षेत्र के लिए 18 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। एनजीओ को पैसा देने वालों में विदेशी दाता दूसरे नंबर पर हैं। 2007-08 में विदेश से 9,700 करोड़ रुपये आए।
निजी क्षेत्र की कंपनियों से भी एनजीओ को काफी पैसा आता है। भारत में तो कम चलन है, पर विदेश में निजी कंपनियां सामाजिक क्षेत्र पर अच्‍छा खर्च करती हैं। भारत की कंपनियां इस मद में अपने सालाना लाभ का एक फीसदी से भी कम खर्च करती हैं, जबकि ब्रिटिश कंपनियां 1.5 और अमेरिकी कंपनियां 2.0 फीसदी तक मुनाफा सामाजिक कार्यों पर खर्च करती हैं।
एनजीओ की संख्‍या पिछले कुछ सालों में बड़ी तेजी से बढ़ी है। सरकारी आंकड़े पर गौर करें तो 1970 तक केवल 1.44 लाख सोसायटीज रजिस्‍टर्ड थीं, पर अगले तीन दशकों में यह संख्‍या क्रमश: 1.79 लाख, 5.52 लाख और 11.22 लाख होती गई। साल 2000 के बाद सबसे ज्‍यादा एनजीओ रजिस्‍टर्ड हुए।
‘सरकारी अध्‍ययन में शामिल तमाम आंकड़े मोटे अनुमान पर आधारित हैं। वास्‍तविक स्थिति का किसी को पता नहीं है, क्‍योंकि पिछले सालों में यह क्षेत्र बड़ी तेजी से बढ़ा है। यही नहीं, इसका कोई आधिकारिक डेटाबेस बनाने की भी कोशिश नहीं हुई है।’

Saturday, June 12, 2010

देश के राष्ट्रपति और इतिहास

भोपाल. कई बार मन सवाल उठता है की देश में राष्ट्रपति तो है लेकिन सीधे तौर पर कभी भी वे दखल नहीं देते. आरोप भी लगते रहे हैं की राष्ट्रपति स्टाम्प पेपर की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं. हालाँकि इस मामले में डॉ एपीजे अब्दुल कलाम थोड़े अलग रहे हैं. इस बार राष्ट्रपति से जुडी कुछ जानकारी भारतआज  पर.
भारत के राष्ट्रपति-
भारत के राष्ट्रपति  या भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्रप्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। सिद्धांतः राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है। पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं।
राष्ट्रपति को भारत के संसद के दोनो सदनों (लोक सभा और राज्य सभा) तथा साथ ही राज्य विधायिकाओं (विधान सभाओं) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाँच वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। पदधारकों को पुनः चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गई है। वोट आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राज्य की जनसंख्या और उस राज्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त नहीं होती है तो एक स्थापित प्रणाली है जिससे हारने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य उम्मीदवारों को तबतक हस्तांतरित होता है, जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती। उपराष्ट्रपति को लोक सभा और राज्य सभा के सभी (निर्वाचित और नामजद) सदस्यों द्वारा एक सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है।
भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने हीं इस पद पर दो कार्यकाल पूरा किया है।
महामहिम प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभीत करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को पद व गोपनीयता की शपथ ली थी।
जब एक महिला बनी राष्ट्रपति-
आजादी की 60वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे भारतीय गणतंत्र में 12वें राष्ट्रपति के चुनाव के बाद प्रतिभा  पाटिल देश की पहली महिला प्रथम नागरिक होंगी। 15 अगस्त 1947 को आजादी हासिल करने के बाद 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और 30 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यभार संभाला।नवविर्नाचित राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की तरह डॉ. प्रसाद भी पेशे से वकील थे। वह 13 मई 1962 तक इस पद पर रहे।
उनके बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और ठीक 5 साल तक इस पद पर रहे। 13 मई 1967 को डॉ. जाकिर हुसैन ने यह पद संभाला। उनके निधन के कारण 24 अगस्त 1969 में वी.वी. गिरि देश के चौथे राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने इससे पहले 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में यह पद संभाला और उनके बाद 20 जुलाई से 24 अगस्त के बीच मोहम्मद हिदायतुल्लाह कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे। डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद 24 अगस्त 1974 को देश के पांचवे राष्ट्रपति बने, लेकिन 11 फरवरी 1977 में उनके निधन के कारण बासप्पा दानप्पा जत्ती को 25 जुलाई तक कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया और उनके बाद 25 जुलाई 1977 को नीलम संजीव रेड्डी इस शीर्ष संवैधानिक पद पर आसीन हुए। 

इतिहास-15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था और अन्तरिम व्यवस्था के तहत देश एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य बन गया। इस व्यवस्था के तहत भारत के गवर्नर जनरल को भारत के राष्ट्रप्रमुख के रूप में स्थापित किया गया, जिन्हें भारत के अन्तरिम राजा - जॉर्ज VI द्वारा ब्रिटिश सरकार के बजाय भारत के प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त करना था।

यह एक अस्थायी उपाय था, परन्तु भारतीय राजनीतिक प्रणाली में साझा राजा के अस्तित्व को जारी रखना सही मायनों में संप्रभु राष्ट्र के लिए उपयुक्त विचार नहीं था। आजादी से पहले भारत के आखरी ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन हीं भारत के पहले गवर्नर जनरल बने थे। जल्द ही उन्होंने सी.राजगोपालाचारी को यह पद सौंप दिया, जो भारत के इकलौते भारतीय मूल के गवर्नर जनरल बने थे। इसी बीच डा. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में संविधान सभा द्नारा 26 नवम्बर 1949 को भारतीय सविंधान का मसौदा तैयार हो चुका था और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से संविधान को स्वीकार किया गया था। इस तारीख का प्रतीकात्मक महत्व था क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन से पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज़ दी थी। जब संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति का पद सभांला तो उसी समय गवर्नर जनरल और राजा का पद एक निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।
इस कदम से भारत की एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य की स्थिति समाप्त हो गया। लेकिन यह गणतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा। क्योंकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने तर्क किया की यदि कोई भी राष्ट्र ब्रिटिश सम्राट को "राष्ट्रमंडल के प्रधान" के रूप में स्वीकार करे पर ज़रूरी नहीं है की वह ब्रिटिश सम्राट को अपने राष्ट्रप्रधान की मान्यता दे, उसे राष्ट्रमंडल में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय था जिसने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नए-स्वतंत्र गणराज्य बने कई अन्य पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों के राष्ट्रमंडल में रहने के लिए एक मिसाल स्थापित किया।

राष्ट्रपति का चुनाव-

राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक योग्यता

भारत का कोई नागरिक जिसकी उम्र 35 साल या अधिक हो वो एक राष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार हो सकता है। राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार को लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता होना चाहिए और सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए। परन्तु निम्नलिखित कुछ कार्यालय-धारकों को राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने की अनुमति दी गई है:
यदि उपराष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल या मंत्री को राष्ट्रपति चुना जाता है, तो यह उमीद की जाती है की जिस तारीख को वे राष्ट्रपति के रूप में सेवा शुरू करते हैं, उस दिन वह अपना पिछला पद छोड़ चुके होंगे.

चुनाव पद्धति-

जब भी राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने वाला होता है, तो एक निर्वाचन मंडल द्वारा नया राष्ट्रपति चुना जाता है। इस निर्वाचन मंडल में संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति के माध्यम से चुनाव आयोजित किया जाता है। गुप्त मतदान प्रणाली द्वारा मतदान होता है। अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति के चुनाव विस्तृत ब्योरा दिया गया हैं।
हालाकीं राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है। पर आमतौर से वे अपनी राजनैतिक दलों द्वारा समर्थित उम्मिद्वारों को हीं अपना मत देते हैं।
 
निर्वाचन मंडल
राज्य विधान सभाओं और संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा डाली वोट का मूल्य भारत के संविधान के अनुच्छेद 55 (2) के उपबंधों के अनुसार निर्धारित किया जाता है। 2007 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदाता और वोट की संख्या का विवरण नीचे दिया गया है।
भारत में राष्ट्रपति चुनाव संबंधित राज्यों से आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा होता है। राज्य विधानसभा के प्रत्येक मत के मूल्य का गणना निम्नलिखित सू्त्र से किया जाता है

Saturday, April 17, 2010

ध्वज आज भी है दिल में

भोपाल. कोई लाख कहे की देश के युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं, लेकिन ये सच नहीं है. हकीकत तो ये है की आज भी दिल में देश बसता है. इसका साबुत फिर देखने को मिला जब जी टीवी के सीरिअल डांस इंडिया डांस में एक डांस के बाद देश भक्ति का माहोल बन गया और तीनों जज के साथ ग्रां मस्ते मिथुन दा भी खड़े हो गए. वही जिस लड़की ने तिरंगे के रंग वाले कपडे पहनकर डांस किया था उसके प्रति भी सभी ने नमन किया. दरअसल हम हैं ही ऐसे की जब भी देश की बात आती है तो एकजुट हो जाते हैं, फिर कुछ लोग कहते हैं युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं. बात जब देश की निकली है तो आज इस ब्लॉग पर देश के ध्वज के बारे में लिखने का मन कर रहा है. 
भारतीय तिरंगे का इतिहास  
"सभी राष्‍ट्रों के लिए एक ध्‍वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्‍यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप होगा। ध्‍वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्‍व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्‍वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्‍लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्‍द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।" 

"हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्‍यूस, पारसी और अन्‍य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्‍वज को मान्‍यता दें और इसके लिए मर मिटें।"
- महात्‍मा गांधी

प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। यह एक स्‍वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘’तिरंगे’’ का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है।भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

तिरंगे का विकास

यह जानना अत्‍यंत रोचक है कि हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्‍वतंत्रता के राष्‍ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्‍यता दी गई। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्‍ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है। हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:
1906 में भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज
1907 में भीका‍जीकामा द्वारा फहराया गया बर्लिन समिति का ध्‍वज
इस ध्‍वज को 1917 में गघरेलू शासन आंदोलन के दौरान अपनाया गया
इस ध्‍वज को 1921 में गैर अधिकारिक रूप से अपनाया गया
इस ध्‍वज को 1931 में अपनाया गया। यह ध्‍वज भारतीय राष्‍ट्रीय सेना का संग्राम चिन्‍ह भी था।
भारत का वर्तमान तिरंगा ध्‍वज
प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना।

ध्‍वज के रंग

भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।

चक्र

इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।

ध्‍वज संहिता

26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।
26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए: 
क्‍या करें
  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
  • किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
  • नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

क्‍या न करें

  • इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
  • इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
  • किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।
भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं द र्शाता है। यह हमारे राष्‍ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सशस्‍त्र सेना बलों के सदस्‍यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की पूरी शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्‍यौछावर किए हैं।

भारत के गणतंत्र की यात्रा

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