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Sunday, February 1, 2015

...वो ढाबे वाली लड़की

फोटो प्रतीकात्मक
वो एक हवा के झाैंके की तरह आई और अपनी कहानी सुनाकर चली गई। उसके दर्द को सुनकर वक्त थम सा गया था। वो सांवली सी लड़की। कपड़े से साफ लग रहा था कि राजस्थान या राजस्थान की सीमा से लगे इलाके की रहने वाली है। जब मैं उससे बात कर रहा था तो लोग मुझे घूर रहे थे। तब मुझे अपनी किस्मत पर रश्क हो रहा था, लेकिन बाद में जब हकीकत पता चली तो हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। जिससे बात कर रहा था वो मेरे सामने तो थी, लेेकिन किसी अन्य को उसकी परछाई तक नहीं दिखाई दी। कहते हैं न कि कुछ घटनाओं को भूल पाना आसान नहीं होता है। खासतौर से तब जबकि मामला लड़की और डर से जुड़ा हो। जिस मामले की बात मैं कर रहा हूं वह कुछ दिन पहले की ही है। पहले तो लगा कि इसे छिपाकर रखना चाहिए, लेकिन बाद में लगा कि इस अनुभव को शेयर किया जाए। 
        यह बात कुछ दिन पहले की ही है जब मैं अपनी ससुराल रतलाम एक विवाह के सिलसिले में गया था। रतलाम के ही पास सैलाना नामक एक छोटा सा कस्बा है। यहां कभी सैलाना रियासत हुआ करती थी और कुछ दिन पहले तक यहां राजपरिवार भी रहता था। लेकिन अब वे लोग इंदौर शहर में रहते हैं। काफी भव्य महल यहां बना हुआ है। इसी महल के पीछे एक कैक्टस पार्क है। पिछले दिनों में यहां घूमने आया तो यहां के चौकीदार ने मुझे एक लड़की की कहानी सुनाई। कहानी हकीकत थी कि अफसाना यह तो पता नहीं, लेकिन सुनकर काफी मजा आया। कहानी में एक राजस्थानी लड़की थी और उसे सैलाना रियासत के एक सिपाही से प्रेम हो गया था। सिपाही एक छोटी सी लड़ाई में मारा गया और वो लड़की अकेली रह गई। सिपाही की मौत ने उसे बावला बना दिया था और वो सैलाना के आसपास ही अपने सिपाही को खोजा करती। अचानक एक दिन उसकी लाश सैलाना से थोड़ा आगे झरनेश्वर नामक कोई स्थान है वहां मिली। कई तरह की बातें हुई। किसी ने कहा कि उसके साथ बलात्कार हुआ और इसके बाद मार दिया गया। किसी ने कहा कि उसने अपने सिपाही के चले जाने के बाद जान दे दी। बात होती रही और गांव वालों ने ही जैसे-तैसे उसका अंतिम संस्कार कर दिया। बात आई-गई हो और अब तो पूरे सैलाना में इसकी चर्चा भी नहीं होती। मेरे जैसे कोई भूले-भटके पर्यटक चले जाए तो कुछ नया जानने के चक्कर में ऐसी कहानियां सुन लेते हैं।
          खैर मैं वहां से वापस आ गया और अगले दिन मंदसौर गया। असली कहानी मंदसौर से लौटते वक्त शुरू हुई। लौटते हुए मुझे रात के करीब दो बज गए। मुझे रात में घूमना बड़ा अच्छा लगता है और ढाबों व चायब की दुकानों पर सेल्फी लेना तो और भी मजेदार। मैंने ड्राइवर से किसी ढाबे पर कार रोकने के लिए कहा। उसने मंदसौर से निकलने के बाद ढोढर के पहले एक ढाबे पर कार रोक दी।  ढाबा काफी बड़ा था, लेकिन ज्यादा गाड़ियां और ग्राहक नहीं होने के कारण ढाबे के कर्मचारी झपकियां ले रहे थे। ड्राइवर ढाबे के भीतर चाय का आर्डर देने चला गया और मैं खुले मैदान में टहलने लगा। टहलते-टहलते किसी के रोने की आवाज आई। मैं आवाज की दिशा में बढ़ा और जिस तरफ बढ़ रहा था वे ढाबे के दायीं तरफ का हिस्सा था। खाली मैदान, पीछे खेत और धुंध के अलावा मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। मैँ वापस लौटने ही वाला था कि फिर किसी के सिसकने की आवाज आई। मैं फिर उस तरफ बढ़ा तो ढाबे की दीवार से सटकर कंबल ओढ़े एक महिला बैठी थी और अपने घुटनों पर सिर रखकर सिसक रही थी। मैंने पास जाना उचित नहीं समझा और दूर से ही खड़े होकर उसे आवाज दी।
उसने सिर नहीं उठाया।
मैंने फिर आवाज दी।
इस बार उसने ऊपर चेहरा किया तो मैं थोड़ा आश्चर्य में पढ़ गया, क्योंकि वो एक लड़की थी और चेहरे पर गोदना गुदे हुए थे। उसकी बड़ी-बड़ी आंखे और उनसे बहते आंसू मुझे दिखाई दिए। मैं वहीं जड़वत हो गया और दिमाग में विचारों की आंधी चलने लगी। समझ में नहीं आया। 
मैंने पूछ- तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?
कोई जवाब नहीं और फिर सिर घुटनों के बीच चला गया। सिसकने की आवाज सुनाई दी।
बोलती क्यों नहीं। कौन हो तुम? - फिर मैंने पूछा
उसने सिर उठाया और बोली - दुखियारी हूं। मेरे बारें में जानकर क्या करोगे?
मेरे अंदर का पत्रकार जाग गया। मुझे मामला दिलचस्प लगा।
मैंने कहा - तुम इस हालत में यहां बैठी हो। ठंड नहीं लग रही? और फिर इधर क्यों बैठी हो। चलो ढाबे पर। कोई तुम्हारे साथ है?
ढेर सारे सवाल और सिर्फ एक जवाब - जो मेरा था वो छिन गया।
कुछ समझ में नहीं आया और लगा कि जरूर इसके साथ गलत हुआ और किसी ने इसका सामान छीन लिया। 
मैंने कहा - कोई बात नहीं। तुम उठो और मुझे बताओ कि तुम्हारे साथ क्या हुआ? शायद मैं कोई मदद कर पाऊं।
.. मेरी मदद अब कोई नहीं कर सकता - फिर छोटा सा जवाब
मैंने फिर कहा - नहीं मुझे बताओ। मैं एक पत्रकार हूं और तुम्हारी मदद कर सकता हूं।
.. तो फिर मेरी बात सुनोगे - उसने कहा
हां-हां क्यों नहीं । - मैंने कहा
तो सुनो ... 
और वो बोलती गई। मैं सुनता गया। समय को जैसे पंख लग गए। उसका एक-एक शब्द मेरे कानों में किसी टंकार की तरह पड़ रहा था। अचानक मुझे किसी ने हिलाया। पलटकर देखा तो मेरा ड्राइवर राजू था।
उसने कहा - आपको क्या हो गया साहब। किससे बात कर रहे हैं? और क्या हाल बन गया।
.. मैं तो उस लड़की से बात कर रहा था - मैंने कहा
किस लड़की से? - राजू ने कहा
मैंने दूसरी दिशा सिर घुमाकर हाथ उठाया तो लड़की वाली जगह पर कुछ नहीं था। लेकिन मैं सर्द रात में पसीने से तर-बतर हो चुका था।
मैंने राजू की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहा था।
मैंने उससे पूछा - मुझे यहां खड़े हुए कितनी देर हो ग?
पांच मिनट- उसने कहा
थोड़ा रुककर फिर बोला - आपकी चाय कब से तैयार है। मुझे लगा कि आप आ जाओगे। थोड़ी देर इंतजार किया। नहीं आए तो बुलाने आया। देखा कि आप ढाबे के इस कोने की तरफ देख रहे थे और माथे पर पसीना आ रहा था। कुछ देर चुप रहा, लेकिन आपकी हालत देखकर घबरा गया था। आपको आवाज दीख् लेकिन आपने सुना ही नहीं। तब मैंने आपको पकड़कर हिलाया।
मैंने माथे का पसीना पोंछा और ढाबे के मुख्य द्वार  की तरफ बढ़ गया। 
राजू चाय लेकर आया और मुझे दी, लेकिन मेरा ध्यान तो कहीं और था। खैर हम वहां से रवाना हुए पूरे रास्ते मैंने राजू से बात नहीं की। सुबह के तीन बजे हम रतलाम पहुंचे। बिस्तर पर पहुंच गया, लेकिन उस लड़की की तस्वीर और कैक्टस पार्क की कहानी अब समझ में आने लगी थी।
वो कहानी क्या थी यह फिर कभी आप लोगों से शेयर करुंगा।
-भीमसिंह मीणा

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