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Friday, May 13, 2011
भारतीय पुलिस सेवा के नौ अधिकारी प्रशिक्षण पर
भारतीय पुलिस सेवा के नौ वरिष्ठ अधिकारी आगामी दिनों भारतीय पुलिस अकादमी हैदराबाद तथा ब्रिटेन में आयोजित विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों में शामिल होंगेंे। यह अधिकारी 16 मई से 24 जून, 2011राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद तथा 27 जून से 8 जुलाई, 2011तक ब्रिटेन(यू.के.) में आयोजित मिड कैरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम में भाग लेंगें। इन अधिकारियों की प्रशिक्षण अवधि में उनके कार्य-दायित्वों के संपादन के लिये गृह विभाग द्वारा विभिन्न अधिकारियों को निर्देशित किया गया है ।
गृह विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार श्री उपेन्द्र कुमार जैन, पुलिस महानिरीक्षक, उज्जैन रेंज उज्जैन की प्रशिक्षण अवधि में श्री डी.एस.सेंगर, पुलिस महानिरीक्षक बिसबल,इंदौर, श्री आदर्श कटियार, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,भोपाल की प्रशिक्षण अवधि में श्री योगेश चौधरी, पुलिस अधीक्षक,भोपाल, श्री डी.श्रीनिवास राव,वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, इंदौर की प्रशिक्षण अवधि में श्री पवन श्रीवास्तव, पुलिस उप महानिरीक्षक, इंदौर रेंज, इंदौर, श्री जी.जनार्दन, पुलिस उप महानिरीक्षक, खरगोन रेंज,खरगोन की प्रशिक्षण अवधि में श्री एम.के.मुद्गल, पुलिस उप महानिरीक्षक,अपराध अनुसंधान विभाग पुलिस मुख्यालय,भोपाल, श्री के.पी.खरे, पुलिस उप महानिरीक्षक रीवा रेंज,रीवा की प्रशिक्षण अवधि में श्री उमेश जोगा, पुलिस अधीक्षक, रीवा, सुश्री सोनाली मिश्रा, पुलिस उप महानिरीक्षक, जबलपुर रेंज,जबलपुर की प्रशिक्षण अवधि में श्री संतोष कुमार सिंह, पुलिस अधीक्षक, जबलपुर, श्री राजाबाबू सिंह, पुलिस उप महानिरीक्षक,शहडोल रेंज, शहडोल की प्रशिक्षण अवधि में श्री सुधीर लाड, पुलिस अधीक्षक, शहडोल, श्री डी.पी.गुप्ता, पुलिस उपमहानिरीक्षक चंबल रेंज, मुरैना की प्रशिक्षण अवधि में श्री संजय कुमार, पुलिस अधीक्षक,मुरैना और डाँ मंयक जैन, पुलिस उप महानिरीक्षक उज्जैन रेंज,उज्जैन की प्रशिक्षण अवधि में श्री सतीश कुमार सक्सेना, पुलिस अधीक्षक, उज्जैन संबंधित दायित्वों का निर्वहन करेंगें ।
Thursday, May 12, 2011
मप्र पुलिस ने समस्या तो बता दी, समाधान बताना भूल गए
| bhopal court ke paas Advoket bhi kharid rahe hain ghatiya gudvatta vale halmet. |
भोपाल। मप्र की राजधानी भोपाल में इन दिनों पुलिस द्वारा हेलमेट मुहिम चलाई जा रही है। इस मुहिम के तहत हेलमेट नहीं पहनने वाले से 50 रुपए का चालान काटा जा रहा है। यहां तक तो सब ठीक है, लेकिन परेशानी वाली बात यह है कि इस चालान कटवाने के बाद जब व्यक्ति थोड़ा आगे जाता है तो उसके मन में एकमात्र भावना होती है हेलमेट खरीदने की। उसे अचानक फुटपाथ पर चलती हुई हेलमेट की दुकान मिल भी जाती है। जैसे ही चालान का मारा आदमी हेलमेट खरीदने पहुंचता है तो उसे घटिया गुणवत्ता वाला आईएसआई मार्क के बिना हेलमेट मिलता है। उसका भी दाम 500 रुपए बताया जाता है। जब ग्राहक बार्गनिंग करता है तो दुकानदार 300 से 350 रुपए में हेलमेट देने के लिए तैयार हो जाता है। ऐसा पहली बार देख रहे हैं जब दुकानदार अपनी मर्जी से आम आदमी को कोई घटिया सामान बेच रहा है और ग्राहक हाथ जोड़कर उस माल को खरीदने के लिए मजबूर है। यह सब हो रहा है पुलिस की बदइंतजामी के कारण। पुलिस ने चालान काटना तो शुरू कर दिया, लेकिन आम आदमी को यह नहीं बताया जा रहा है कि वह सही हेलमेट कहां से खरीदे? इस पर भी अगर कोई सवाल करे तो उसे आंखे दिखाई जाती है।
| Asli, nakli helmet. |
| Jahan mili jagah vahi gaye Jam. |
![]() |
| Ek sahi helmet ki pahchan |
| Bhopal me rajbhavan ke paas police cheking |
Wednesday, May 4, 2011
Sunday, July 25, 2010
बिन सावन भारत सून
भोपाल. भारत में त्योहारों और व्रत का बड़ा महत्व है. अगर व्रत, त्यौहार को ख़त्म कर दिया जाए तो भारत की पहचान पर खतरा हो जाएगा. इस कड़ी में सावन का महिना अति विशिष्ट महिना है और इसका अपना महत्व है. सावन माह में शिवभक्तों द्वारा की जाने वाली भगवान शिव की आराधना, पूजा, जयकारे और धार्मिक आयोजन ऐसा शिवमय वातावरण बना देते हैं कि उसके प्रभाव से ईश भक्ति से दूर रहने वाले लोगों के मन भी शिवभक्ति और श्रद्धा की लहर पैदा हो जाती है। इससे यही प्रश्र हर धर्मजन के मन में पैदा होता है कि आखिर श्रावण मास और शिव भक्ति का क्या संबंध है और इस मास में शिव उपासना का इतना अधिक महत्व क्यों है। इस बात का उत्तर हिन्दू धर्म ग्रंथ ऋग्वेद में बताया गया है। वेदों में प्रकृति और मानव का गहरा संबंध बताया गया है। वेदों में लिखें कुछ मंत्रों का संदेश कुछ इस प्रकार है -
बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ और धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और इस दौरान वह ऐसे मंत्रों को पढ़ते हैं, जो सुख और शांति देने वाले होते हैं। बारिश के मौसम में अनेक तरह के जीव-जंतु बाहर निकल आते है और तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती है। ऐसा लगता है कि जैसे लंबे समय तक व्रत रखकर सभी ने अपनी चुप्पी तोड़ी हो। इस बात के द्वारा संदेश दिया गया है कि जिस तरह जीव-जंतु बारिश के मौसम में बोलने लगते हैं, उसी तरह से हर व्यक्ति को श्रावण से शुरु होने वाले चार मासों में धर्म और ईश्वर की भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ करना या सुनना चाहिए। इसी प्रकार बारिश या सावन मास में अनेक प्रकार के पौधे पैदा होते हैं, जो औषधीय गुणों के होते हैं। यह हमारी आयु और शरीर सुखों को बढ़ाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से पूरी प्रकृति ही शिव का रुप है। इसलिए प्रकृति की पूजा के रुप में सावन मास में शिव की पूजा की जाती है। खास तौर पर वर्षा के मौसम जल तत्व की अधिकता होती है। इसलिए शिव का जल से अभिषेक सुख, समृद्धि, संतान, धन, ज्ञान और लंबी उम्र देने वाला होता है।
अनिल सिरवैया द्वारा भेजा गया भजनइक जरा छींक ही दो तुम चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
ओरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ और धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और इस दौरान वह ऐसे मंत्रों को पढ़ते हैं, जो सुख और शांति देने वाले होते हैं। बारिश के मौसम में अनेक तरह के जीव-जंतु बाहर निकल आते है और तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती है। ऐसा लगता है कि जैसे लंबे समय तक व्रत रखकर सभी ने अपनी चुप्पी तोड़ी हो। इस बात के द्वारा संदेश दिया गया है कि जिस तरह जीव-जंतु बारिश के मौसम में बोलने लगते हैं, उसी तरह से हर व्यक्ति को श्रावण से शुरु होने वाले चार मासों में धर्म और ईश्वर की भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ करना या सुनना चाहिए। इसी प्रकार बारिश या सावन मास में अनेक प्रकार के पौधे पैदा होते हैं, जो औषधीय गुणों के होते हैं। यह हमारी आयु और शरीर सुखों को बढ़ाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से पूरी प्रकृति ही शिव का रुप है। इसलिए प्रकृति की पूजा के रुप में सावन मास में शिव की पूजा की जाती है। खास तौर पर वर्षा के मौसम जल तत्व की अधिकता होती है। इसलिए शिव का जल से अभिषेक सुख, समृद्धि, संतान, धन, ज्ञान और लंबी उम्र देने वाला होता है।
अनिल सिरवैया द्वारा भेजा गया भजनइक जरा छींक ही दो तुम
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
ओरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो
रिपोर्टर, पीपुल्स समाचार
पाकिस्तान के बारे में सही कहा था मनीष कोइराला ने
पाक विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत कश्मीर मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देगा,तो हम बातचीत जारी नहीं रख पाएंगे। अमेरिका के सामने भी अलापा था राग कश्मीर भारत- पाक वार्ता के तत्काल बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने कश्मीर मुद्दा उठाया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से बातचीत के दौरान कहा की पाकिस्तान,भारत के साथ वार्ता जारी रखना चाहता है लेकिन इसके लिए भारत संग कश्मीर मसले पर बात होना बेहद ज़रूरी है।
ये सब हो रहा है और हमारे कर्णधार जिन्हें हमने अपना जीवन चलने का अधिकार सौंपा है कह रहा है की नहीं अभी हालत बिगड़े नहीं है. खैर बात भारत की थी तो दिल का दर्द सामने ले आया. वर्ना तो हम भी खुश है इस हिंदुस्तान में.
Thursday, July 8, 2010
पार्टी नहीं खुद का दम भी चलता है
भोपाल.बार-बार ये बात सामने आती है की पार्टी बड़ी है या फिर व्यक्ति. लेकिन एक बार ये बात साबित हो गई की व्यक्ति का अपना कद होता है. आंध्र प्रदेश से कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रे़ड्डी ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा उठा कर ye बात साबित कर दी. जिस प्रकार उनको जनता का समर्थन मिला है वह काबिले गौर है. हालाँकि इसमें एक दर ये भी है की कही जगमोहन का हश्र उमा भारती के जैसा न हो जाए. खैर कल के बारे में किसने सोचा है. जगमोहन ने सोनिया गांधी के मना करने के बावजूद अपने पूर्व तय कार्यक्रम के मुताबिक ही आठ जुलाई से श्रीकाकुलम से अपनी उदार्पू (दिलासा यात्रा) शुरू करने का फैसला किया है। जगनमोहन ने जनता के नाम सोमवार को लिखे अपने खुले पत्र में कहा है कि वह हर सूरत में . अपनी यात्रा शुरू करेंगे। उनका कहना है कि उसी दिन के पिता वाईएसआर का जन्मदिन है इसलिए यात्रा शुरू करने के लिए इससे अच्छा कोई और दिन नहीं हो सकता। जगन की इस यात्रा का जाहिर तौर पर उद्देश्य यह है कि वह उन परिवारों को दिलासा देना चाहते हैं जिनके सदस्यों की वाईएसआर की मौत की खबर सुनकर सदमे के कारण मौत हो गई थी अथवा उन्होंने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी।
इस यात्रा ने मार्च के महीने में उस समय एक विवादास्पद मो़ड़ ले लिया था जब जगन ने तेलंगाना में अपनी यात्रा ले जाने की कोशिश की और तेलंगाना राज्य के समर्थकों ने उसे रोका। इससे हिंसा भ़डक उठी और पुलिस ने जगन को गिरफ्तार कर लिया। उसकोलेकर जगन और कांग्रेस आलाकमान के बीच काफी क़डवाहट बढ़ गई। आखिर जगन को अपनी यात्रा स्थगित करनी प़डी, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जगन को यात्रा की अनुमति नहीं दी।
खुद जगन ने अब जनता के नाम अपने खुले पत्र में कहा है कि गत महीने उन्होंने उनकी मां और छोटी बहन के साथ सोनिया गांधी से भेंटकर स्पष्ट किया था कि उनकी यह यात्रा क्यों जरूरी है, लेकिन इसके बाद भी सोनिया यात्रा के पक्ष में दिखाई नहीं दी। जगन ने कहा कि वह एक महान नेता के बेटे होने के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं और अपने पिता की मौत के स्थान पर उन्होंने जनता से जो वादा किया था, उसे निभाना चाहते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें केवल अपनी रक्ता ही नहीं बल्कि स्वभाव भी दिया है। चुनौती देने वाले अंदाज में जगन ने आगे कहा है कि उनके लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण बात नहीं है कि वह कितना लंबा जीते हैं बल्कि यह बात अहम है कि वह किस अंदाज में जीते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन देते हुए कहा है कि वह ओदर्यू यात्रा निकालने और हर दुखी परिवार को दिलासा देने का जो वादा किया है, उसे जरूर पूरा करेंगे। अपने सोनिया गांधी से मतभेदों के बारे में जगन कहते हैं कि पिछली भेंट में सोनिया गांधी ने उनसे कहा था कि वह यात्रा निकालने के बजाए सारे दुखी परिवारों को एक जगह बुलाएं और उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दें। इस पर उनकी मां विजयलक्ष्मी ने सोनिया गांधी से कहा कि यह बात अच्छी परंपराओं के विरूद्ध होगी। उन्होंने सोनिया गांधी को यह भी याद दिलाया कि जब उनके पति (वाईएसआर) का निधन हो गया था तो सोनिया ने दिल्ली से हैदराबाद आकर उनके परिवार को दिलासा दी थी, न कि परिवार को दिल्ली बुलाया था। दूसरी ओर इस यात्रा से पहले ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस दो गुटों में बंट गई है। मुख्यमंत्री रौसय्या के समर्थक जगनमोहन रेड्डी का विरोध कर रहे हैं और जगन के समर्थक मुख्यमंत्री को निशाना बना रहे हैं। वाईएसआर का जन्मदिन भी टकराव का कारण बन गया है।
जगन चाहते हैं कि सभी विधायक और मंत्री श्रीकाकुलम में उनके कार्यक्रम में आकर उनके पिता को श्रद्धांजलि दें जबकि ऎसी किसी कोशिश को विफल करने के लिए सरकार ने उस रोज विधानसभा का सत्र बुला लिया है और कहा है कि वाईएसआर का जन्मदिन समारोह हैदराबाद में ही मनाया जाएगा। गौरतलब है कि गत सितंबर में उनके पिता की मौत के बाद करीब सभी विधायकों ने जगन को नया मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी और कई मंत्रियों ने भी इसका समर्थन किया था, मगर आलाकमान ने इसे खारिज करते हुए रौसय्या को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी से सीधी टक्कर में कितने मंत्री और विधायक जगनमोहन रेड्डी का साथ देते हैं
इस यात्रा ने मार्च के महीने में उस समय एक विवादास्पद मो़ड़ ले लिया था जब जगन ने तेलंगाना में अपनी यात्रा ले जाने की कोशिश की और तेलंगाना राज्य के समर्थकों ने उसे रोका। इससे हिंसा भ़डक उठी और पुलिस ने जगन को गिरफ्तार कर लिया। उसकोलेकर जगन और कांग्रेस आलाकमान के बीच काफी क़डवाहट बढ़ गई। आखिर जगन को अपनी यात्रा स्थगित करनी प़डी, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जगन को यात्रा की अनुमति नहीं दी।
खुद जगन ने अब जनता के नाम अपने खुले पत्र में कहा है कि गत महीने उन्होंने उनकी मां और छोटी बहन के साथ सोनिया गांधी से भेंटकर स्पष्ट किया था कि उनकी यह यात्रा क्यों जरूरी है, लेकिन इसके बाद भी सोनिया यात्रा के पक्ष में दिखाई नहीं दी। जगन ने कहा कि वह एक महान नेता के बेटे होने के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं और अपने पिता की मौत के स्थान पर उन्होंने जनता से जो वादा किया था, उसे निभाना चाहते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें केवल अपनी रक्ता ही नहीं बल्कि स्वभाव भी दिया है। चुनौती देने वाले अंदाज में जगन ने आगे कहा है कि उनके लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण बात नहीं है कि वह कितना लंबा जीते हैं बल्कि यह बात अहम है कि वह किस अंदाज में जीते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन देते हुए कहा है कि वह ओदर्यू यात्रा निकालने और हर दुखी परिवार को दिलासा देने का जो वादा किया है, उसे जरूर पूरा करेंगे। अपने सोनिया गांधी से मतभेदों के बारे में जगन कहते हैं कि पिछली भेंट में सोनिया गांधी ने उनसे कहा था कि वह यात्रा निकालने के बजाए सारे दुखी परिवारों को एक जगह बुलाएं और उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दें। इस पर उनकी मां विजयलक्ष्मी ने सोनिया गांधी से कहा कि यह बात अच्छी परंपराओं के विरूद्ध होगी। उन्होंने सोनिया गांधी को यह भी याद दिलाया कि जब उनके पति (वाईएसआर) का निधन हो गया था तो सोनिया ने दिल्ली से हैदराबाद आकर उनके परिवार को दिलासा दी थी, न कि परिवार को दिल्ली बुलाया था। दूसरी ओर इस यात्रा से पहले ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस दो गुटों में बंट गई है। मुख्यमंत्री रौसय्या के समर्थक जगनमोहन रेड्डी का विरोध कर रहे हैं और जगन के समर्थक मुख्यमंत्री को निशाना बना रहे हैं। वाईएसआर का जन्मदिन भी टकराव का कारण बन गया है।
जगन चाहते हैं कि सभी विधायक और मंत्री श्रीकाकुलम में उनके कार्यक्रम में आकर उनके पिता को श्रद्धांजलि दें जबकि ऎसी किसी कोशिश को विफल करने के लिए सरकार ने उस रोज विधानसभा का सत्र बुला लिया है और कहा है कि वाईएसआर का जन्मदिन समारोह हैदराबाद में ही मनाया जाएगा। गौरतलब है कि गत सितंबर में उनके पिता की मौत के बाद करीब सभी विधायकों ने जगन को नया मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी और कई मंत्रियों ने भी इसका समर्थन किया था, मगर आलाकमान ने इसे खारिज करते हुए रौसय्या को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी से सीधी टक्कर में कितने मंत्री और विधायक जगनमोहन रेड्डी का साथ देते हैं
Saturday, June 12, 2010
देश के राष्ट्रपति और इतिहास
भोपाल. कई बार मन सवाल उठता है की देश में राष्ट्रपति तो है लेकिन सीधे तौर पर कभी भी वे दखल नहीं देते. आरोप भी लगते रहे हैं की राष्ट्रपति स्टाम्प पेपर की तरह इस्तेमाल किये जाते हैं. हालाँकि इस मामले में डॉ एपीजे अब्दुल कलाम थोड़े अलग रहे हैं. इस बार राष्ट्रपति से जुडी कुछ जानकारी भारतआज पर.
भारत के राष्ट्रपति-
भारत के राष्ट्रपति या भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्रप्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। सिद्धांतः राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है। पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं।
राष्ट्रपति को भारत के संसद के दोनो सदनों (लोक सभा और राज्य सभा) तथा साथ ही राज्य विधायिकाओं (विधान सभाओं) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाँच वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। पदधारकों को पुनः चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गई है। वोट आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राज्य की जनसंख्या और उस राज्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त नहीं होती है तो एक स्थापित प्रणाली है जिससे हारने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य उम्मीदवारों को तबतक हस्तांतरित होता है, जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती। उपराष्ट्रपति को लोक सभा और राज्य सभा के सभी (निर्वाचित और नामजद) सदस्यों द्वारा एक सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है।
भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने हीं इस पद पर दो कार्यकाल पूरा किया है।
महामहिम प्रतिभा पाटिल भारत की 12वीं तथा इस पद को सुशोभीत करने वाली पहली महिला राष्ट्रपति हैं। उन्होंने 25 जुलाई, 2007 को पद व गोपनीयता की शपथ ली थी।
जब एक महिला बनी राष्ट्रपति-
आजादी की 60वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे भारतीय गणतंत्र में 12वें राष्ट्रपति के चुनाव के बाद प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला प्रथम नागरिक होंगी। 15 अगस्त 1947 को आजादी हासिल करने के बाद 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ और 30 जनवरी 1950 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में अपना कार्यभार संभाला।नवविर्नाचित राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की तरह डॉ. प्रसाद भी पेशे से वकील थे। वह 13 मई 1962 तक इस पद पर रहे।
उनके बाद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन देश के राष्ट्रपति बने और ठीक 5 साल तक इस पद पर रहे। 13 मई 1967 को डॉ. जाकिर हुसैन ने यह पद संभाला। उनके निधन के कारण 24 अगस्त 1969 में वी.वी. गिरि देश के चौथे राष्ट्रपति चुने गए। उन्होंने इससे पहले 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में यह पद संभाला और उनके बाद 20 जुलाई से 24 अगस्त के बीच मोहम्मद हिदायतुल्लाह कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे। डॉ. फखरुद्दीन अली अहमद 24 अगस्त 1974 को देश के पांचवे राष्ट्रपति बने, लेकिन 11 फरवरी 1977 में उनके निधन के कारण बासप्पा दानप्पा जत्ती को 25 जुलाई तक कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया और उनके बाद 25 जुलाई 1977 को नीलम संजीव रेड्डी इस शीर्ष संवैधानिक पद पर आसीन हुए।
इतिहास-15 अगस्त 1947 को भारत ब्रिटेन से स्वतंत्र हुआ था और अन्तरिम व्यवस्था के तहत देश एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य बन गया। इस व्यवस्था के तहत भारत के गवर्नर जनरल को भारत के राष्ट्रप्रमुख के रूप में स्थापित किया गया, जिन्हें भारत के अन्तरिम राजा - जॉर्ज VI द्वारा ब्रिटिश सरकार के बजाय भारत के प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त करना था।
यह एक अस्थायी उपाय था, परन्तु भारतीय राजनीतिक प्रणाली में साझा राजा के अस्तित्व को जारी रखना सही मायनों में संप्रभु राष्ट्र के लिए उपयुक्त विचार नहीं था। आजादी से पहले भारत के आखरी ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड माउंटबेटन हीं भारत के पहले गवर्नर जनरल बने थे। जल्द ही उन्होंने सी.राजगोपालाचारी को यह पद सौंप दिया, जो भारत के इकलौते भारतीय मूल के गवर्नर जनरल बने थे। इसी बीच डा. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में संविधान सभा द्नारा 26 नवम्बर 1949 को भारतीय सविंधान का मसौदा तैयार हो चुका था और 26 जनवरी 1950 को औपचारिक रूप से संविधान को स्वीकार किया गया था। इस तारीख का प्रतीकात्मक महत्व था क्योंकि 26 जनवरी 1930 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटेन से पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को आवाज़ दी थी। जब संविधान लागू हुआ और राजेंद्र प्रसाद ने भारत के पहले राष्ट्रपति का पद सभांला तो उसी समय गवर्नर जनरल और राजा का पद एक निर्वाचित राष्ट्रपति द्वारा प्रतिस्थापित हो गया।
इस कदम से भारत की एक राष्ट्रमंडल अधिराज्य की स्थिति समाप्त हो गया। लेकिन यह गणतंत्र राष्ट्रों के राष्ट्रमंडल का सदस्य बना रहा। क्योंकि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने तर्क किया की यदि कोई भी राष्ट्र ब्रिटिश सम्राट को "राष्ट्रमंडल के प्रधान" के रूप में स्वीकार करे पर ज़रूरी नहीं है की वह ब्रिटिश सम्राट को अपने राष्ट्रप्रधान की मान्यता दे, उसे राष्ट्रमंडल में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण निर्णय था जिसने बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में नए-स्वतंत्र गणराज्य बने कई अन्य पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों के राष्ट्रमंडल में रहने के लिए एक मिसाल स्थापित किया।
राष्ट्रपति का चुनाव-
राष्ट्रपति बनने के लिए आवश्यक योग्यता
भारत का कोई नागरिक जिसकी उम्र 35 साल या अधिक हो वो एक राष्ट्रपति बनने के लिए उम्मीदवार हो सकता है। राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार को लोकसभा का सदस्य बनने की योग्यता होना चाहिए और सरकार के अधीन कोई लाभ का पद धारण नहीं करना चाहिए। परन्तु निम्नलिखित कुछ कार्यालय-धारकों को राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में खड़ा होने की अनुमति दी गई है:
- वर्तमान राष्ट्रपति (अधिकतम दो कार्यकाल)
- वर्तमान उपराष्ट्रपति.
- किसी भी राज्य के राज्यपाल.
- संघ या किसी राज्य के मंत्री.
यदि उपराष्ट्रपति, राज्य के राज्यपाल या मंत्री को राष्ट्रपति चुना जाता है, तो यह उमीद की जाती है की जिस तारीख को वे राष्ट्रपति के रूप में सेवा शुरू करते हैं, उस दिन वह अपना पिछला पद छोड़ चुके होंगे.
चुनाव पद्धति-
जब भी राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने वाला होता है, तो एक निर्वाचन मंडल द्वारा नया राष्ट्रपति चुना जाता है। इस निर्वाचन मंडल में संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। आनुपातिक प्रतिनिधित्व व्यवस्था के अनुसार एकल संक्रमणीय मत पद्धति के माध्यम से चुनाव आयोजित किया जाता है। गुप्त मतदान प्रणाली द्वारा मतदान होता है। अनुच्छेद 55 में राष्ट्रपति के चुनाव विस्तृत ब्योरा दिया गया हैं।
हालाकीं राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है। पर आमतौर से वे अपनी राजनैतिक दलों द्वारा समर्थित उम्मिद्वारों को हीं अपना मत देते हैं।
हालाकीं राष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं (विधान सभा) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा होता है। पर आमतौर से वे अपनी राजनैतिक दलों द्वारा समर्थित उम्मिद्वारों को हीं अपना मत देते हैं।
निर्वाचन मंडल
राज्य विधान सभाओं और संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों द्वारा डाली वोट का मूल्य भारत के संविधान के अनुच्छेद 55 (2) के उपबंधों के अनुसार निर्धारित किया जाता है। 2007 के राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदाता और वोट की संख्या का विवरण नीचे दिया गया है।
भारत में राष्ट्रपति चुनाव संबंधित राज्यों से आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा होता है। राज्य विधानसभा के प्रत्येक मत के मूल्य का गणना निम्नलिखित सू्त्र से किया जाता है।
Saturday, April 17, 2010
ध्वज आज भी है दिल में
भोपाल. कोई लाख कहे की देश के युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं, लेकिन ये सच नहीं है. हकीकत तो ये है की आज भी दिल में देश बसता है. इसका साबुत फिर देखने को मिला जब जी टीवी के सीरिअल डांस इंडिया डांस में एक डांस के बाद देश भक्ति का माहोल बन गया और तीनों जज के साथ ग्रां मस्ते मिथुन दा भी खड़े हो गए. वही जिस लड़की ने तिरंगे के रंग वाले कपडे पहनकर डांस किया था उसके प्रति भी सभी ने नमन किया. दरअसल हम हैं ही ऐसे की जब भी देश की बात आती है तो एकजुट हो जाते हैं, फिर कुछ लोग कहते हैं युवा दिग्भ्रमित हो रहे हैं. बात जब देश की निकली है तो आज इस ब्लॉग पर देश के ध्वज के बारे में लिखने का मन कर रहा है.
"सभी राष्ट्रों के लिए एक ध्वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्ट करना पाप होगा। ध्वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।"
"हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्यूस, पारसी और अन्य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्वज को मान्यता दें और इसके लिए मर मिटें।"
- महात्मा गांधी
- महात्मा गांधी
प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक ध्वज होता है। यह एक स्वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना पिंगली वैंकैयानन्द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘’तिरंगे’’ का अर्थ भारतीय राष्ट्रीय ध्वज है।भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्तंभ पर बना हुआ है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।
तिरंगे का विकास
यह जानना अत्यंत रोचक है कि हमारा राष्ट्रीय ध्वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्वतंत्रता के राष्ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्यता दी गई। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है। हमारे राष्ट्रीय ध्वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:
प्रथम राष्ट्रीय ध्वज 7 अगस्त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।
द्वितीय ध्वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।
तृतीय ध्वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्तऋषि के अभिविन्यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा भी था।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।
वर्ष 1931 ध्वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्वज को हमारे राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया । यह ध्वज जो वर्तमान स्वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्पष्ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्प्रदायिक महत्व नहीं था और इसकी व्याख्या इस प्रकार की जानी थी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्त भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्व बना रहा। केवल ध्वज में चलते हुए चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्वज अंतत: स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज बना।
ध्वज के रंग
भारत के राष्ट्रीय ध्वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।
चक्र
इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गतिशील है और रुकने का अर्थ मृत्यु है।
ध्वज संहिता
26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्वज संहिता में संशोधन किया गया और स्वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्टरी में न केवल राष्ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्ट्रीय ध्वज का सामान्य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्थानों आदि के सदस्यों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्द्रीय और राज्य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।
26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्वज को किस प्रकार फहराया जाए:
क्या करें
- राष्ट्रीय ध्वज को शैक्षिक संस्थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्काउट शिविरों आदि) में ध्वज को सम्मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्वज आरोहण में निष्ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
- किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्थान के सदस्य द्वारा राष्ट्रीय ध्वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्यथा राष्ट्रीय ध्वज के मान सम्मान और प्रतिष्ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
- नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्वज फहराने का अधिकार देना स्वीकार किया गया है।
क्या न करें
- इस ध्वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाना चाहिए।
- इस ध्वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
- किसी अन्य ध्वज या ध्वज पट्ट को हमारे ध्वज से ऊंचे स्थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्वज को वंदनवार, ध्वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारत के नागरिकों की आशाएं और आकांक्षाएं द र्शाता है। यह हमारे राष्ट्रीय गर्व का प्रतीक है। पिछले पांच दशकों से अधिक समय से सशस्त्र सेना बलों के सदस्यों सहित अनेक नागरिकों ने तिरंगे की पूरी शान को बनाए रखने के लिए निरंतर अपने जीवन न्यौछावर किए हैं।
भारत के गणतंत्र की यात्रा
- भारतीय राष्ट्रीय ध्वज
- गणतंत्र के आयोजन
- गणतंत्र दिवस की परेड का जीवन्त वेबकास्ट (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)
- मेरा भारत मेरी शान
- साभार भारत सरकार की वेबसाईट
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