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Sunday, July 25, 2010

पाकिस्तान के बारे में सही कहा था मनीष कोइराला ने


भोपाल. जो एक बार गलती करे वो इन्सान, जो दो बार गलती करे वो हिंदुस्तान और जो गलती पर गलती करे वो पाकिस्तान. ये लाइन किसी फिल्म में मनीषा कोईराल ने बोली थी. फिल्म तो पिट गई लेकिन डाईलाग हिट हो गया, और होता भी क्यों नहीं आखिर मनीषा ने सच जो कहा था. ये बात आज पाकिस्तान ने एक बार फिर साबित कर दी है. कश्मीर मुद्दे को लेकर हमेशा से ही अड़ियल रवैया इख्तियार करने वाले पाकिस्तान ने अब एक बार फिर भारत से साफ़- साफ़ कहा है कि जब तक भारत-पाक वार्ता के एजेंडे में कश्मीर मुद्दा शामिल नहीं होता वह भारत से कोई बात नहीं करेगा। 
पाक विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत कश्मीर मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देगा,तो हम बातचीत जारी नहीं रख पाएंगे। अमेरिका के सामने भी अलापा था राग कश्मीर भारत- पाक वार्ता के तत्काल बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने कश्मीर मुद्दा उठाया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से बातचीत के दौरान कहा की पाकिस्तान,भारत के साथ वार्ता जारी रखना चाहता है लेकिन इसके लिए भारत संग कश्मीर मसले पर बात होना बेहद ज़रूरी है।
ये सब हो रहा है और हमारे कर्णधार जिन्हें हमने अपना जीवन चलने का अधिकार सौंपा है कह रहा है की नहीं अभी हालत बिगड़े नहीं है. खैर बात भारत की थी तो दिल का दर्द सामने ले आया. वर्ना तो हम भी खुश है इस हिंदुस्तान में. 
ऐसा भी है पाकिस्तान, मुलायजा फरमाइए-

Friday, July 16, 2010

फर्जी वाडा करो,फिर कमाओ और पकडे जाओ तो घर बैठकर खाओ

भोपाल से...
हमारे देश में दलालों और बेईमानो के लिए बहुत जगह है. अब पुरे देश का हिसाब तो अभी नहीं बताया जा सकता है, लेकिन भोपाल में हुए आज एक फैसले से कुच्छ तो दावा किया ही जा सकता है.  गुरूवार को मध्य प्रदेश शासन मैं कम करने वाले 17 अफसरों के जाती प्रमाण पात्र फर्जी पाए गए. अब सवाल ये उठता है की इनमे से कई के खिलाफ तो पहले भी जांच हो चुकी हैं और इन्ही अफसरों को बा-इज्ज़त बरी भी कर दिया गया था तो क्या वे जांच रिपोर्ट फर्जी थी और नहीं तो क्या गलत जांच करने के लिए उन अफसरों को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री उन्हें दण्डित करेंगे.

धोखेबाज हैं ये 17 अफसर
भोपाल. संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों की जांच करने सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनी छानबीन समिति ने 15 अधिकारी-कर्मचारियों के अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए हैं। इनमें भारतीय वन सेवा के अफसर से लेकर राज्य पुलिस सेवा और मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं।
समिति ने पाया है कि न केवल नौकरी और पदोन्नति में बल्कि मेडिकल कॉलेज में दाखिले तक में गलत जाति प्रमाण पत्र से लाभ उठाया गया। अन्य पिछड़ा वर्ग और ब्राम्हण जाति के लोग भी इस फर्जीवाड़े में शरीक हैं। सरकार ने संबंधित जिलों के कलेक्टर और एसपी को इन अफसरों के जाति सर्टिफिकेट निरस्त करने का आदेश दिया है।
इनके खिलाफ अगली कार्यवाही करने को कहा गया है, इसमें सेवा से बर्खास्तगी शामिल है। राज्य स्तरीय छानबीन समिति के सामने 19 मामले थे। इनमें से महज एक प्रमाण पत्र सही पाया गया जबकि एक मामला हाईकोर्ट में लंबित होने की वजह से उस पर निर्णय नहीं लिया गया। आदिम जाति कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव समिति के अध्यक्ष, केंद्रीय अजजा आयोग के निदेशक एवं राज्य अजजा आयोग के सचिव, आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के संयुक्त संचालक समिति के सदस्य हैं।
एके भूगांवकर भारतीय वन सेवा (राज्य वन सेवा से पदोन्नत) भोपाल
वीके भूगांवकर चीफ इंजीनियर पीडब्ल्युडी भोपाल
पीरन सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बहादुर सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बादाम सिंह मीना जिला रोजगार अधिकारी
नागेश्वर सोनकेसरी सहायक आबकारी आयुक्त मंदसौर
खुशेंद्र सोनकेसरी एमपीपीएससी से डीएसपी चयनित
पूनम खंतवाल पुलिस सब इंस्पेक्टर भोपाल
राकेश कश्यप सेक्शन ऑफिसर मंत्रालय
जयेंद्र सिंह तंवर व्याख्याता आदिम जाति कल्याण विभाग अलीराजपुर
शशिकला धकाते लिपिक वन विभाग छिंदवाड़ा
रेखा सहकाटे स्टेनोग्राफर मंत्रालय
अरुणा चौधरी स्टॉफ नर्स जबलपुर
कपिल कुमार जोशी स्टेट बैंक इंदौर में मैनेजर थे
भागीरथ रायक जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी
प्रेमशंकर धानका अध्यापक पद के लिए आवेदन किया था

फर्जी प्रमाण पत्र की जगह नया सर्टिफिकेट कर लिया मंजूर : अनुसूचित जाति के संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच की राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने एक प्रमाण पत्र को फर्जी पाया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की। विकास आयुक्त कार्यालय के लिपिक गौतम कठाने ने 1980 में जो जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर नौकरी हासिल की, जांच में कलेक्टर छिंदवाड़ा ने फर्जी पाया।
कलेक्टर ने समिति को भेजी रिपोर्ट में कहा कि यह प्रमाण पत्र जारी ही नहीं हुआ। कठाने ने 2005 में तैयार कठाने ने महार जाति का प्रमाण पत्र पेश किया, समिति ने उसे मान लिया क्योंकि जांच में पाया गया कि वे महार जाति के ही हैं। लेकिन फर्जी प्रमाण पत्र से 25 वर्ष सेवा करने और लाभ लेने के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इनका मामला कोर्ट में
समिति ने कर्मचारी महेंद्र सिंह के संदिग्ध जाति प्रमाण पत्र मामले में कोई निर्णय नहीं लिया, क्योंकि प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित है। समिति ने सुनवाई का पूरा मौका देकर जांच के बाद 16 अधिकारी, कर्मचारियों के सर्टिफिकेट निरस्त करने की सिफारिश की है। संबंधित जिलों के कलेक्टरों को कार्यवाही करने के आदेश दिया गया है। 

अरुण कोचर,आदिवासी विकास आयुक्त मप्र

भोपाल में पदस्थ लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता वीके भूगांवकर उनके भाई एके भूगांवकर के प्रमाण पत्र में उन्हें आदिवासी जाति हल्बा का बताया गया है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं जो ओबीसी में आती है। उनके पिता मंत्रालय की सेवा में रहे थे और वे ओबीसी में ही थे। वीके भूगांवकर ने अजा वर्ग के आरक्षण का सेवा में लाभ लिया लेकिन स्कूल शिक्षा प्रमाण पत्रों में उन्हें ब्राम्हण दर्शाया गया है। इनका जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बना।
राज्य वन सेवा से भारतीय वन सेवा में पदोन्नत हो चुके प्रेमशंकर धनका गड़रिया जाति के पाए गए जो अनुसूचित नहीं बल्कि ओबीसी में है। धनका ने नरसिंहपुर से प्रमाण पत्र बनवाया। जिला रोजगार अधिकारी पदस्थ बादाम सिंह मीना लटेरी में निवास के आधार पर अजजा का लाभ रहे थे, वे जांच में गुना जिले के निवासी पाए गए जहां मीना जाति आदिवासी वर्ग में नहीं आती। इन्होंने विदिशा से जाति प्रमाण पत्र बनवाया।
मंदसौर में पदस्थ आबकारी विभाग में सहायक आयुक्तनागेश्वर सोनकेशरी और उनके भाई डीएसपी खसेंद्र सोनकेसरी का जाति प्रमाण पत्र भी हल्बा जाति का है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं। नागेश्वर का प्रमाणपत्र भोपाल के कमलानगर क्षेत्र में निवास का बना है।
कमलानगर के जिस मकान में रहना दर्शाया गया उसके मालिक ने इंकार कर दिया कि नागेश्वर नाम का किरायेदार उनके यहां रहा। इनका जाति प्रमाण पत्र मंडला से जारी हुआ।
सर्टिफिकेट कैसे-कैसे
राकेश कश्यप ने कीर जाति के प्रमाण पत्र से नौकरी हासिल की वे ढीमर जाति के पाए गए जो अजजा में नहीं है। जयेंद्र सिंह तंवर ने झाबुआ से कंवर जनजाति का सर्टिफिकेट पर नौकरी प्राप्त की। प्रमाण पत्र गलत पाया गया।
शशिकला धकाते आदिम जाति अनुसंधान संस्थान में पदस्थ हैं, उनका हल्बा अजा जाति प्रमाण पत्र गलत मिला। वे भी कोष्टा जाति की हैं। भिलाला जाति के प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी कर रहे भागीरथ रायक काछी जाति के पाए गए। इन्हें छिंदवाड़ा से जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया।
ये भी दूध के धुले नहीं
रेखा सहकाटे की जाति महाराष्ट्र में अजजा में है मप्र में नहीं। इनका प्रमाण पत्र भोपाल से जारी किया गया। पूनम खंतवाल पौढ़ी गढ़वाल की मूल निवासी हैं लेकिन मप्र में अजजा नागवंशी का जाति प्रमाण पत्र लेकर नौकरी पाई।
जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बनवाया। कपिल कुमार जोशी ने भी फर्जी अजजा प्रमाण पत्र से नौकरी पाई और जांच में वे ब्राम्हण पाए गए। इन्होंने भोपाल से प्रमाण पत्र बनवाया। पीरन सिंह और बहादुर सिंह गिल का गोंड जाति प्रमाण पत्र फर्जी मिला, वे अनुसूचित जाति के हैं।
पीरन सिंह होमगार्ड में कंपनी कमांडर हैं। इन्होंने सागर से प्रमाण पत्र बनवाए। कंवर जाति प्रमाण के आधार पर एमबीबीएस कर रही ज्योति छत्तरी जांच में ताम्रकार पाई गईं जो ओबीसी में है। ज्योति ने इंदौर से प्रमाण पत्र बनवाया।

Thursday, November 19, 2009

आओ बनाये नकली स्वर्णिम मध्यप्रदेश?????

भोपाल। मध्य प्रदेश में भ्रम की स्थिति है की हम क्या वाकई स्वर्णिम मध्य प्रदेश के सपने को साकार होते देख रहे हैं या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का भाषण का शानदार हिस्सा है। बहरहाल ये बहस मुझे नही करीं है, क्योंकि भोपाल टीवी जगत के पत्रकार काशीनाथ ने स्वर्णिम मध्य प्रदेश की हकीकत की सही पोल बहुत अच्छे ढंग से दखल पर खोली है।
मध्य प्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाना है, इसके वासियों में मध्य प्रदेशी होने का गर्व पैदा करना है, हमारे प्रदेश का एक अपना गीत होगा, अकेले सरकार नहीं जनता को भी प्रदेश की तरक्की से जोडेंगे ये वो बातें हैं जो हमने एक नवम्बर को भोपाल के मोती लाल नेहरु स्टेडियम में मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस के कार्य क्रम में सुनी थी और बड़े ही गर्व के साथ हमारे सूबे के सूबेदार शिवराज सिंह चौहान ने भोपाल सहित पूरे प्रदेश में इस तरह के आयोजन में मौजूद हर प्रदेश वासी को एक शपथ भी राज्यपाल के जरिये दिलाई थी। उसी दिन ये भी कहा गया की इस साल स्थापना दिवस का जलसा एक दिन नहीं पूरे सात दिन चलेगा और जनता को अपना प्रदेश की भावना से ओत प्रोत करके ही दम लिया जायेगा. ये जलसा चल पड़ा पहले दिन की शाम को भोपाल के रविन्द्र भवन के मुक्ताकाशी मंच पर गीतकार शान ने अपना जलवा बिखेर दिया. रॉक एंड डांस और झूमते युवाओं की टोलियों से लगा की अपना मध्य प्रदेश स्वर्णिम बन रहा है. अलग अलग जिलों और संभागों में विकास की तमाम चर्चाएँ भी चलती रही. लोगों में एक भाव आया भी की अपना प्रदेश है और इसकी तरक्की में हम सब जुट जाएँ तो बड़ी मुश्किल भी आसान हो जायेगी. फिर सरकार साथ है तो काम भी शुरु होगा. ६वे दिन की बात है सूबेदार शिवराज सिंह जी सूबे के एक जिले सतना आये विन्ध्य इलाके का ये जिला उद्योग खासकर सीमेंट उद्योग के लिए प्रसिद्ध भी है. सतना में मौका था गरीब उत्थान सम्मलेन का तमाम गरीब इकठ्ठा थे उनको लग रहा था की प्रदेश को स्वर्णिम बनाने का महाभियान चल रहा है.राजा आये है तो आज तो गरीब नहीं गरीबी हटाने की कोई मुहिम या बात होगी जादू का पिटारा भले ही ना खुले जादू की छड़ी तो दिखेगी जो नया रास्ता दिखाएगी हुआ भी कुछ ऐसा ही हमारे शिवराज जी ने हुंकार भरी और कहा की अब ये नहीं चलेगा की जमीन हमारी, खनिज हमारा, प्रदेश हमारा और उद्योग लगाने वाले हमारे मध्य प्रदेशी को रोजगार ना देकर बिहारी या और दुसरे प्रदेश के लोगों को रोजगार दें. यहाँ उद्योग लगोगे तो रोजगार भी यहाँ के लोगों को देना होगा. जनता खुश, सभी को लगा की हमारे मध्य प्रदेश की नई चाल चरित्र और चेहरा होगा. गरीबी भी दूर होगी और रोजगार भी मिलेगा. आज शिव ने अपना रौद्र रूप दिखा दिया है अब जो आड़े आएगा वो भस्म हो जायेगा. शिव की जनता को के हक पर अब कोई डाका नहीं डाल पायेगा. जनता खुश की चलो पहली बार किसी ने अपने प्रदेश वासी होने का एहसास कराया है. बात बड़ी थी और दमदार भी. सो सबकी नजर में आ गई. वाकई ये पहला मौका था जब मध्य प्रदेश में बड़ी चर्चा बनी और लगा की किसी ने ये बीडा उठाया है.( सही या गलत की बहस अभी नहीं करना चाहते और बहस भी लम्बी है. इसको आगे चलाया भी जा सकता है. और मुंबई की घटना के बाद तो और भी जरुरी है.)शिव के शब्द बाण कैमरा ने पकड़ लिए और इस मामले ने दुसरे दिन यानि ७ नवम्बर (स्थापना दिवस सप्ताह का आखरी दिन) को सुबह से टीवी चेनल्स पर हंगामा खडा हो गया. पहला स्लग चला " शिव चले राज की चाल" चेनल्स ने शिवराज सिंह की तुलना राज ठाकरे से करते हुए खबर को उठा दिया. हम पत्रकारों को भी ख़ुशी की चलो आज प्रदेश की खबर और मुख्यमंत्री हर चेनल की हेड लाइन है. खूब चेट और फोनों होने लगे पत्रकार साथी भी बढ़ चढ़ कर हांकने लगे. सरकार सकते में ये क्या हो रहा है. बिहार के नेता भी बाईट देने लगे पक्ष और विपक्ष दोनों तरह की प्रतिक्रिया आने लगी कुल जमा एक तेज हलचल का दिन. लेकिन तभी दोपहर के तीन बजे प्रदेश के ही दुसरे जिले इंदौर में ये क्या हमारे शिवराज जी ने कहा की मेरा कहने का आशय ये नहीं था मध्य प्रदेश के दरवाजे सभी के लिए खुले है. यानि ठीक २४ घंटे के अन्दर मुख्यमंत्री ने अपना कहा पलट दिया. लो अब क्या करोगे चेनल वाले चुप सबको लगा था अच्छा मसाला मिला खूब खेलेंगे. शाम को प्राइम टाइम में भी चेट करेंगे और खेलेंगे. कभी कभी तो मौका आता है जब मध्य प्रदेश से कोई खबर इतनी बिकती है. मुख्यमंत्री ने जो कहा उसको बदल दिया और बात बीत गई. खैर मैं भी मानता हूँ की किसी भाषा, प्रदेश, जाति, बोली और मजहब के नाम पर या का सहारा लेकर किसी भी तरह के विकास की बात संविधान के खिलाफ तो है ही भारत की बहुरंगी बसाहट, जिन्दगी, रिवाज, तासीर के भी खिलाफ है. लेकिन फिर भी मैंने सोचा ये बात तो शिव ने कही थी आम तौर पर ये माना जाता है की शिव ने जो भी कहा या वरदान दिया, उससे वो वापस नहीं हुए फिर चाहे श्रीराम की विरूद्व रावन का मामला हो या भस्मासुर का. शिव ने कह दिया तो कह दिया जो होगा देखेंगे. लेकिन हमारे शिव तो २४ घंटे में ही रण छोड़ कर अलग हो गए. वो तो रण छोड़ निकले. अब जनता परेशान की अपना प्रदेश क्या बनेगा. हुंकार भर कर राजा ही पीछे हो जाये तो प्रजा की क्या बिसात. फिर लगा की इतना भावुक होने की जरुरत नहीं नहीं है. प्रदेश के असली वारिस या बाशिंदे आदिवासी हैं जो अब भी फटेहाल ही हैं उनकी बात तो हो नहीं रही थी, आदिवासी को ये भी मालूम है की स्वर्णिम प्रदेश तो तब था जब उनका राज था और ये बावन गढ़ओ का सूबा हुआ करता था. आज तो इस पर बाहर से आये और दो और तीन पीढी पहले बसे लोगों का प्रदेश है अब स्वर्णिम भी बना तो आदिवासी तक पहुँच पायेगा इसकी उम्मीद भी उसको कम ही है. कोई रण छोडे तो कोई बात नहीं लेकिन मैं तो अपने प्रदेश को स्वर्णिम ही देखना चाहता हूँ और जो बन पड़ेगा करूँगा भी क्यूंकि में सियासतदा तो नहीं इस सूबे का आम आदमी हूँ मेरे कहने और करने में अदला बदली की गुंजाइश कम ही है. मैं दम से कहता हूँ जय मध्य प्रदेश सब आओ मिल कर बनाओ स्वर्णिम और देश.

फ़िर खुली राजनेताओं और प्रशासन के दावो की पोल

भोपाल। मध्य प्रदेश में आमजन के उत्पीड़न की स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर जा चुकी है। प्रशासन हमेशा की तरह ख़ामोशी की चादर ओड़े हुए है। जबलपुर की एक लोमहर्षक घटना इसका प्रमाण है।
कहाँ खो गई प्रशासन की संवेदनशीलता
कहाँ खो गई प्रशासन की संवेदनशीलताभगवानदेव ईसरानीजबलपुर के मदन महल इलाके में नाले से निकासी पर पड़ोसियों के आपसी विवाद और उसके निदान में पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन की उदासीनता व उपेक्षा से क्षुब्ध एक युवक सुनील सेन ने कुल्हाड़ी से अपनी माँ, बहन, दो बेटों और एक भतीजे की हत्या कर दी । एक बुजुर्ग पड़ोसी को भी मार डाला । ऐसी ही लोमहर्षक घटना मुंबई के ठाणे इलाके से सामने आई है । फ्रांसिस गोम्स नाम के इस व्यक्ति ने अपनी पत्नी सहित तीन जवान बेटियों को सात साल तक एक कमरे में इस डर से कैद रखा कि वे घर से बाहर जाएंगी तो उनके साथ दुष्कृत्य हो जाएगा । दोनों घटनाएँ मूलतः प्रशासनिक चूक और उससे उत्पन्न स्थितियों, बल्कि व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का ही परिणाम है । इन्हें सिर्फ मानसिक रोगी का कृत्य मानकर या होनी कहकर टालना सत्य से मुँह मोड़ना है। राजनीतिक हस्तक्षेप सहित विभिन्न कारणों से प्रशासनिक संवेदनशीलता में अदालतों में लंबित मामलों की वजह से हर क्षेत्र में अधिकांश अपराधी सजा नहीं पा पाते । अपराधियों में प्रशासन व कानून का डर समाप्त हो जाने का परिणाम आज समाज का हर वर्ग किसी न किसी रूप में भुगत रहा है । जनसमस्याओं के प्रति प्रशासन की असंवेदनशीलता के कारण ही धरने, प्रदर्शनों ने अब चक्काजाम, रेल रोको और शासकीय सम्पत्ति की तोड़फोड़ का रूप ले लिया है । पढ़ी-लिखी और समझदार जमात नक्सलियों की समर्थक होती हम देख रहे हैं । अपराधी तत्वों के हौसले इस हद तक हैं कि पिछले दिनों भोपाल के ही निशातपुरा थाना क्षेत्र में दो टी।आई. सहित आधा दर्जन पुलिसकर्मी अपराधियों के हमले से घायल हुए । पुलिस महानिदेशक के उपस्थित रहते इन्दौर में कंट्रोल रूम प्रभारी को पीट दिया गया । १ अप्रैल २००४ से ३१ दिसम्बर २००७ के दौरान शासकीय अफसरों व कर्मचारियों की मारपीट, उनकी प्रताड़ना के दर्ज मामलों की संख्या ७१२८ है । यदि ये हालात आम जनता के बदल रहे आचरण का संकेत है तो इसके निदान में विलंब घातक हो सकता है । हमें यह मानना होगा कि महिलाओं, बालिकाओं के साथ बलात्कार, व्यभिचार, छोड़छाड़ गंभीर समस्या बन गया है । शासन बालिकाओं की पैदाइश व पोषण से लेकर उनकी शादी और महिलाओं के सुरक्षित प्रसव तक की व्यवस्था कर रहा है, लेकिन आज भी उनके सुरक्षित शौच, सम्मानित जीवन व सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था हम नहीं कर पाए हैं । फ्रांसिस गोम्स की मानसिक स्थिति का अंदाजा इस प्रदेश की कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है, क्योंकि ऐसी ही घटनाएँ और उसके परिणाम कमजोर बुद्धि वाले व्यक्तियों या पीड़ितों के अंतर्मन में घर कर जाती है और गहरे अवसाद का कारण बनती है । सर्वे में ये बात सामने आई है कि कन्या भ्रूण हत्या का एक कारण अगर दहेज और दहेज प्रताड़ना है तो दूसरा बड़ा कारण कानून व्यवस्था की स्थिति भी है, जिसके कारण बालिकाओं के स्वाभिमान की रक्षा करने में माँ-बाप खुद को असमर्थ पाते हैं । प्रदेश में एक समय उम्मीद का आया था, लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री की संवेदनशीलता और क्रियाशीलता जब तक रंग लाती, तब तक वे बदल दिए गए । मार्च १९९० में शीतला सहाय ने प्रभावी ढंग से गृहमंत्री के रूप में काम प्रारंभ किया । उन्होंने माना कि वीआईपी ड्यूटी, कानून व्यवस्था तथा मामलों की तफ्तीश एक ही अमले के द्वारा नहीं होना चाहिए । तफ्तीश के अमले को दूसरे कामों में नहीं लगाया जाना चाहिए, ताकि जन-समस्याओं और अपराधों का निराकरण समय पर हो सके । उन्होंने यह साहसकि घोषाा भी की कि थाने में रिपोर्ट लिखी जाना अनिवार्य हो, ताकि अपने-अपने इलाकों में अपराध कम बताने के लिए थाने का स्टाफ आंकड़ों की बाजीगरी न कर सके, लेकिन तीन माह बाद जून १९९० में वे सिंचाई मंत्री बना दिए गए । वर्ष १९९० में बलात्कार के मामलों की संख्या १७०५ थी, जो फरवरी २००८ में बढ़कर १२२३८ हो गई है । दिसम्बर २००३ से जून २००७ तक सामूहिक बलात्कार के १२१७ मामले हुए । इनमें से अवयस्क बालिकाओं के साथ घटे मामले ७२६ थे । यह सब बताने का उद्देश्य प्रशासन की संवेदनशीलता को जाग्रत करना ही है, क्योंकि बिना इसके समस्या का निदान संभव नहीं है । कानून का सम्मान वापस लाने के प्रयास हुए बिना जनता का विश्वास वापस नहीं लाया जा सकता । पुलिस प्रशासन से लेकर सीबीआई तक से आम जनता का विश्वास अकारण नहीं घटा है, वर्तमान संसदीय व्यवस्था और राजनेताओं के प्रति आम जनता में उपेक्षा का भाव बढ़ने की भी ठोस वजहें हैं और उसका परिणाम है राजनेताओं पर जूते-चप्पल फेंकने की घटनाएँ । इसे समय रहते रोकना होगा अन्यथा जनाक्रोश कल क्या रूप लेगा, इसे कोई नहीं बता सकता । कानून व्यवस्था में सुधार हर प्राथमिकता से ऊपर है । प्रदेश की लाडली को लक्ष्मी के साथ सम्मान से जीने का हक भी देना होगा ।
लेखक मध्यप्रदेश विधानसभा के सचिव भगवानदेव ईसरानी हैं

Wednesday, November 11, 2009

सदन से भी क्यों मांगते हो माफ़ी

हिंदू, हिन्दी, हिन्दुश्थान ही रहेगा सबसे ऊँचा
भोपाल। अभी-अभी महाराष्ट्र विधानसभा में फ़िर हंगामा हुआ। अफ़सोस की बात है की ये हंगामा उनके द्वारा ही किया गया, जिन्होंने मंगलवार को विधायक अबू काज़मी के साथ मारपीट की थी। महाराष्ट्र की नवगठित विधानसभा के विशेष सत्र के अंतिम दिन आज विपक्षी शिवसेना व भाजपा के विधायकों ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के खिलाफ़ समाजवादी पार्टी विधायक अबू आसिम आजमी की कथित विवादास्पद टिप्पणी को लेकर काफ़ी हंगामा मचाया और अबू आजमी की गिरफ्तारी की मांग की। अब ये लोग
अपने आका बाल ठाकरे को सामने रखकर ख़ुद को जनता के सामने पाक साफ घोषित करना चाहते हैं। अब काग रहे हैं की वे सदन से माफ़ी मांग लेंगे लेकिन अबू काज़मी से माफ़ी नहीं मंगेंगऐ। में तो खटा हबन की सदन से भी क्यों माफ़ी मांग रहे हो। क्योंकि शर्मशार तो सदन को किया था। अबू काज़मी भी कोई ढूढ़ के धुले नही होंगे लेकिन सदन क्यों इन विधायक रूपी गुंडों को सहे।
सुबह के सत्र में शिवसेना विधायक दल के नेता सुभाष देसाई और सदन में विपक्ष के नेता एकनाथ खड़से भाजपा के नेतृत्व में सदस्यों की नारेबाजी और हंगामे के बीच सदन की कार्रवाई तीन बार स्थगित करनी पड़ी. श्री आजमी ने कल कथित रूप से संवाददाताओं से कहा था कि बाल ठाकरे बूढ़े हो चले हैं और बच्चों की तरह बातें करते हैं. श्री आजमी ने यह शिवसेना के मुखपत्र मराठी दैनिक सामना में छपे संपादकी के बारे में पूछने पर यह कथित टिप्पणी की थी. शिवसेना विधायकों ने श्री आजमी का विधान भवन के बाहर घेराव किया था पर श्री आजमी ने ऐसी कोई टिप्पणी करने से इनकार किया था. इसी के बाद आज हंगामा हुआ। दरअसल राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवर्निमाण सेना (मनसे) ने आज कहा कि वह अपने कृत्य के लिए सदन से माफी मांगेगी न कि समाजवादी पार्टी के नेता अबु आजमी से, जिन पर मनसे विधायकों ने हमला किया था। अब मनसे नेता अतुल सरपोतदार bअडे नैतिक होने का ढोंग कर रहे हैं और कह रहे हैं की , "हम सदन से माफी मांगेगे क्योंकि हमारा इरादा सदन की छवि को धूमिल करने का नहीं था।

Wednesday, June 3, 2009

बेसहारा हुए शिवराजसिंह चौहान और नरेन्द्रसिंह तोमर

भोपाल। लोकसभा चुनाव में मात खाने के बाद भाजपा का आईटी प्रकोष्ठ निष्क्रिय हो गया है। बड़ी धूम धाम के साथ शुरू किए गए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और अब मुरैना सीट से संसद नरेंद्र सिंह तोमर के ब्लॉग बेसहारा हो गए हैं।
मध्य प्रदेश में भाजपा ने लोकसभा में मात क्या खाई कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर कि वेबसाईट व ब्लॉग बेसहारा हो गए हैं। प्रचार अभियान के दौरान सुचना प्रोद्यिगिकी धूमधाम के बीच आरंभ किए गए। ब्लॉग व वेबसाईट पर एक महीने से अपडेट नही है। ब्लोग्स पर पुराणी पोस्ट धूल खा रही है। और भाजपा को एक वोट देने कि मांग अब भी कायम है।
जीतेगी भाजपा जीतेगा कमल-"केन्द्र में हो भाजपा सरकार, मध्यप्रदेश में चले दो गुनी रफ्तार" ये नारे वेब साईट के मुखमंडल पर अब भी सुशोभित है। जबकि नतीजे सामने आने के बाद भी भाजपा के सुचना प्रोद्यिगिकी प्रकोष्ठ के उन दो हजार आईटी के जानकारों को इन्हे अपडेट करने कि नही सूझी है। जो प्रदेश के प्रचार अभियान में जुटे थे। गौरतलब है कि प्रकोष्ठ में भोपाल में २४ अप्रैल को मुख्यमंत्री के हाथों प्रदेश अध्यक्ष के ब्लॉग और वेब साईट का शुभारंभ तकनीकी तामझाम के साथ कराया था
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का ब्लॉग- http://blog.shivrajsinghchouhan.in/
18 se 26 अप्रैल के बीच हुई कुल 4 पोस्ट
पहली पोस्ट में स्वर्णिम मध्यप्रदेश कि अवधारणा पर चर्चा, दूसरी तरफ़ एक वोट भाजपा को, मध्यप्रदेश 100 कदम विकास कि और। जबकि तीसरी पोस्ट में पीएम -सीएम के चुनाव एक साथ करने कि पैरवी और आखिरी पोस्ट विवेकानंद के व्यक्तित्व पर है।
नरेंद्र सिंह तोमर का ब्लॉग - http://blog.nstomar.in/
28 अप्रैल से 2 मई के बीच कुल 4 पोस्ट
पहली पोस्ट में समाज के हर वर्ग से जुड़ने का संकल्प, दूसरे में मुरैना के चहुंमुखी विकास कि 11 घोषनाये, तीसरी पोस्ट लोकतंत्र के महायज्ञ में वोट कि आहुति परऔर आखरी पोस्ट में मध्यप्रदेश के मतदाताओं को साधुवाद दिया है।

Friday, February 13, 2009

शिवराज नहीं थाम पा रहे हैं दलाली का रथ

ये बडी विचित्र स्थिति है कि जब पूरे प्रदेश की जनता अपने मुखिया को गरम तवे बैठकर ईमानदार मानने को तैयार है, इसके बावजूद उनके मुखिया अपनी जनता के हितों के मंत्रियों के हितों पर ज्‍यादा ध्‍यान दे रहे हैं। या कहें कि वे मंत्रियों की तरफ भ्रष्‍टाचार करने पर बिल्‍कुल ध्‍यान नहीं दे रहे हैं फिर चाहे मंत्री कितना ही भ्रष्‍ट क्‍यों न हो। मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से प्रदेश की साढे छह करोड जनता को बडी आशाएं हैं। वह भी तब जब शिवराज दोबारा मुख्‍यमंत्री बने। ये अलग बात है कि इस चुनाव में कांग्रेस ने हार को जीत में बदलने के लिए कुछ भी नहीं किया। जबकि प्रदेश में भाजपा के मंत्रियों द्वारा किए गए भ्रष्‍टाचार से कौन त्रस्‍त नहीं था। खैर ये अलग विषय है।
मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दूसरी पारी के कुछ पहले और अब जो कुछ कर रहे है, उसमें गाँव की मिट्टी तथा आम आदमी के पसीने की गंध की बजाय कारपोरेट और डिजाइनर नेताओं की गंध आ रही है उन्‍होंने अभी अपने मंत्रियों की राजनितिक-प्रशासनिक क्षमता और दक्षता को परखने के लिए पचमढ़ी में शिविर आयोजित किया शिवराज सिंह चौहान बताये कि वे राजनीति में तीस साल से है क्या इससे पहले उन्‍होंने कोई राजनीति की पाठशाला ज्वाइन की थी? लालू यादव और लाल कृष्ण आडवानी आईआईएम से पढ़े हुए है ? नही फ़िर यह चोचलेबाजी क्यों ? दरअसल ये कवायद वे लोग करते हैं , जो पांच सितारा होटल्स और कारपोरेट हाउसेस की दल्लागिरी करके राजनीति में आते हैं या राजनीति से दल्लागिरी करते हैं चुनाव पूर्व हुई भोपाल की रैली हो या चुनाव के ठीक बाद मुख्‍यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह , सबमे करोडो रुपए फूंके गए क्या इन आयोजनों पर सरकारी अथवा पार्टी फंड से खर्च हुआ ? नही ! इन आयोजनों पर दलालों ने खर्च किया, जो कि शिवराज सिंह चौहान की ईमानदारी पर सवालिया निशान लगाती है। भाई प्रदेश की मुख्‍यमंत्री पर ऐतबार करती है तो उनकी जिम्मेदारी पुरे तंत्र को भष्टाचार मुक्त बनाने की हैं इसकी शुरुआत योजनाओं के मूल से होना चाहिए अफसर, राजनेता, ठेकेदार और बिचोलियों का गठजोड़ नई योजनाओ - पालिसियों पर कड़ी नजर रखता है
यह चिंतनीय और शोभनीय है। शिवराज सिंह चौहान भली भांति जानते है कि कौन भ्रष्ट है और कौन दलाल हैं , फ़िर भी वे मौन क्यों हैं? क्या संघ के कतिपय मठाधीशों के हस्तिनापुर से आप बंधे हुए हैं? अगर हां तो कोई बात नही अगर नही तो मुख्‍यमंत्री को सफाई अभियान चलाना चाहिए।

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