अभी पिछले *कुछ दिनों से टी वी के सभी चैंनलों पर Axis bank के होम फाइनेंस का विज्ञापन दिखाया जा रहा है।*जिसमे एक कार में माँ बेटा बैठे हुए आपस मे बात कर रहे है, जिसमे माँ बेटे से उसकी शादी के पहले ही अलग मकान लेने कह रही है, बेटा वजह पूछता है तो माँ कहती है कि बहु आएगी तो उसे एडजस्ट करने में दिक्कत होगी, टोका टोकी होगी, इससे अच्छा तुम अभी से नया घर ले लो । और वह आज्ञाकारी बेटा तुरंत माँ की बात मान लेता है । *अब प्रश्न ये है कि यह विज्ञापन क्या संदेश दे रहा है समाज को ? ऐसे विज्ञापनों के द्वारा हमारे भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर करारी चोट की जा रही है।* हर माँ बाप का सपना होता है कि बेटा जब बड़ा होगा तब शादी करके बहु को घर मे लाएंगे, बहुरानी का स्वागत करेंगे, समयानुसार जब नाती पोते होंगे तो उनकी खिलखिलाहट से घर गूंजेगा । दादा दादी की पदवी मिलेगी । पर *इस विज्ञापन के धूर्त संदेश से युवाओं को माँ बाप से दूर करने की शिक्षा दी जा रही है । लानत है ऐसे बैंक और उन एडवरटाइजिंग एजेंसी पर जो हमारे पारिवारिक संस्कारों और मूल्यों पर चोट कर रहे है । इन्हें तुरंत बंद करना चाहिए।*,,,आप सभी इसका विरोध करे । और अधिक से अधिक share कर जनजागृति लाए।
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Wednesday, September 13, 2017
Wednesday, June 7, 2017
पुत्र के राज में पितातुल्य किसानों पर गोलीचालन
सुना था सत्ता के लिए मुगल सम्राट ने अपनों का कत्ल कर दिया था। लेकिन कलयुग में किसान के बेटे ने अपने पितातुल्य किसानों पर ही गोली चलवा दी। इसके बाद सरकार के गृहमंत्री द्वारा पुलिस गोलीचालन से मुकरना, आंदोलनकारी किसानों को विराेधियों द्वारा भड़काना तथा उन्हें असामाजिक तत्व करार देना आश्चर्यजनक है। फिर सरकार के मुखिया द्वारा मृत किसानों के परिजनों को एक करोड़ रुपए तथा घायलों को पांच लाख रुपए की सहायता देना भी अचंभित करता है। यह राज्य सरकार की अक्षमता, अदूरदर्शिता, अज्ञानता और अति भयभीत होने का प्रमाण है। जब आंदोलनकारी किसान नहीं थे तो कौन थे? गोली पुलिस ने नहीं तो किसने चलाई? अगर पुलिस की गोली से किसान नहीं मरे तो फिर इतना मुआवजा देने का क्या औचित्य है? सरकार के मुखिया और उसके गृहमंत्री द्वारा अटपटे बयान देने से जाहिर है कि शिवराज सरकार कितनी अपरिपक्व है। सरकार की असंवेदनशीलता का इससे बड़ा नमूना क्या होगा कि आंदोलनकारियों से सरकार के किसी भी नुमांइदे ने बात करने की कोशिश नहीं की। आंदोलन को विफल करने के लिए आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ से आंदोलन स्थगित कराने का बयान दिलवाया। जबकि संघ का इस आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। एक तरह से मंदसौर की घटना ने एक बार फिर पुलिस के खुफियातंत्र की कलई खोलकर रख दी है। प्रदेश के मालवांचल में पिछले चार-पांच दिन में असंतोष धधक रहा था, लेकिन शिवराज सरकार के चारण-भाट उन्हें हकीकत बताने की बजाए सख्ती से पेश आने, विरोधियों पर वार करने तथा किसान आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने की
जानकारी देते रहे। जब यह ज्वालामुखी फट गया तब एक दशक से सत्ता के सिंहासन पर काबिज शख्स की हकीकत भी सामने आ गई कि उनका जनता से कितना संवाद है। खुद को किसान और किसान पुत्र कहलाने वाला कर्णधार अपने भाई-बंधुओं से ही कितना दूर है, यह घटना इसका प्रमाण है। किसान के घर में क्या खिचड़ी पक रही है। इस बात से ही उसका बेटा अनभिज्ञ रहा तो इसमें दोष किसका है। बेटे का या भाई-बंधुओं का। एक किसान बेटे के राज में उसके अपने ही मार-गिराए जाए तो क्या जाए? इस धरना से एक बार मुगल तानाशाह औरंगजेब के कारनामों की याद ताजा हो गई, जिसने अपने बड़े भाई का कत्ल कर पिता को आजीवन बंदी बनाकर रखा था।
वैसे तो दोनों में कोई समानता नहीं है, क्योंकि आैरंगजेब बहुत क्रूर शासक था और शिवराज बहुत ही कमजोर शासक हैं।
- भीम सिंह मीणा, पत्रकार
Sunday, May 22, 2016
भाजपा का सपना कांग्रेस कर रही है पूरा
आखिरकार
पांच राज्यों के चुनाव संपन्न हो गए और परिणाम सामने है। लेकिन इस पूरे
चुनाव में परिणाम के बाद जितनी चर्चा अम्मा (जयललिता) और दीदी (ममता
बनर्जी) की जीत की नहीं हुई, उतनी कांग्रेस मुक्त भारत की हुई। हो भी क्यों
न, आखिर देश की सबसे बड़ी पार्टी इस समय देश की सबसे छोटी पार्टी बनने की
कगार पर पहुंच गई है। एक समाचार पत्र ने आंकलन किया है कि कांग्रेस अब देश
के बीस प्रतिशत हिस्से में ही बची है। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि कांग्रेस
मुक्त भारत का सपना पूरा करने में भाजपा की मदद जनता कर रही है या फिर
कांग्रेस स्वयं अपने कर्मो से इस हाल में पहुंच गई है। बहुत सारी बातें हो
रही है चुनाव जीतने व हारने को लेकर और मैं इतना अनुभवी भी नहीं कि कोई ठोस
कारण बता पाऊं। लेकिन एक बात जो मुझे समझ में आई कि कांग्रेस का हाल
कुछ-कुछ नोकिया जैसा हो गया। एक समय नोकिया बाजार में एकछत्र राज्य करता
था, लेकिन समय के साथ बदलाव नहीं किया यानि नए सिस्टम एंड्राइड को नहीं
अपनाया तो आज बाजार में कई पायदान नीचे है। जबकि भाजपा सेमसंग की भांति नए
फंडे अपनाकर आगे की तरफ बढ़ रही है। कमाल की बात तो यह है कि जिन राहुल
गांधी को पूरी दुनिया में पप्पू की उपमा से नवाजा जाने लगा है, उन्हें
सोनिया आंटी देश का प्रधानमंत्री बनाने का ख्वाब संजोए हुए है। खैर सपने
कोई भी देख सकता है। लेकिन सपनों को हकीकत समझ लेने में दिक्कत हो जाती है।
बहरहाल देश में नया खुमार छाया हुआ है और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का
सपना पूरा हो रहा है।
Thursday, October 22, 2015
मध्यप्रदेश के शक्ति पीठ
जय माता दी
इस नवरात्रि 'भारत आज' में आपके लिए मैं लेकर आया हूं मप्र में स्थित शक्ति पीठ और प्रसिद्ध देवी मंदिरों की जानकारी। जी हां देश के इस ह्दय प्रदेश में ढेरों देवी मंदिर और शक्ति पीठ हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनका नाम आते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है।
-मप्र की आस्था का केंद्र है सलकनपुर
भोपाल से 78 किलोमीटर दूर स्थित सलकनपुर एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन यहां मप्र के कोने-कोने से भक्त आते हैं, क्योंकि यहां माँ विजयासन का मंदिर स्थापित है। हरी-भरी वादियों और ऊंचे पर्वत पर विराजमान मां विंध्यावासिनी के दर्शन करने के लिए नवरात्रि के अलावा भी पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन क्वार और वैशाख के नवरात्रों में यहां पूरे नौ दिन मेला लगता है। जनता को कोई परेशानी नहीं हो इसके लिए मंदिर प्रबंधन द्वारा उच्चकोटि की व्यवस्थाएं की गई हैं। अब तो मंदिर के पास में एसी रूम और हाल उपलब्ध है, जिनकी बुकिंग ऑनलाइन की जाती है। वहीं मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते तैयार किए जा चुके हैं। इनमें पहला रास्ता लगभग 1000 सीढ़ियां का है, जहां से पैदल यात्री जाते हैं। दूसरे रास्ते से वाहन सीधे पहाड़ी पर पहुुंचते हैं और तीसरा रास्ता उड़नखटोला है जो रोपवे की मदद से मंदिर तक पहुंचाता है। सलकनपुर में विराजी सिद्धेश्वरी मां विजयासन की ये स्वयंभू प्रतिमा माता पार्वती की है जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लिए हुए बैठी हैं। इसी मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव भी विराजमान हैं। पुराणों के अनुसार देवी विजयासन माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी। देवी विजयासन को कई भक्त कुल देवी के रूप में पूजते हैं। मां जहां एक तरफ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं तो वहीं संतान का वरदान देकर भक्तों की सूनी गोद भर देती हैं।
एक कथा यह भी है
सलकनपुर देवी धाम के महंत प्रभुदयाल शर्मा ने बताया कि जिस स्थान पर रक्त बीज नामक राक्षस का वध करने के पश्चात मां दुर्गा जिस आसन पर आरूढ हुई वही सिद्ध पीठ आज मां विजयासन के नाम से जाना जाता है। यूं तो मां विजयासन के कई प्रमाण है पर इनमे से बंजारों की कथा बहुत लोकप्रिय है। प्राचीन काल में बंजारों का समुह यहा विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करते थे एवं उनका जीवन-यापन पशु व्यवसाय करके बीतता था। बंजारांे जिन मवेशियों चराने थे उन्हीं में से कुछ पशु अदृष्य हो गए। करीब एक सप्ताह तक खोजने के बाद जब हताश हो गए तो बंजारो के ढेरे पर बंजारों को एक कन्या जिसने अपना नाम विन्ध्यवासिनी बताया ने दर्शन दिए और कहा दादा कि आप क्या खोज रहे है? बंजोरों ने अपने खोए हुए पशुओं के बारें में बताया तो विंध्यावासिनी ने कहा कि क्या आपने माता की पूजा अर्चना की? तब बंजारों ने कहा की हमें माता का स्थान पता नही है तो कन्या ने वहां एक पत्थर फेंका और उस पत्थर की दिशा में देखने पर बंजारों को मां विन्ध्यवासिनी यानी मां विजयासन विराजमान दिखाई दी। आज जिस मूर्ति के दर्शन करते हैं उसके बारें में किवदंती है कि वह तब बंजारों ने स्थापित की थी। बंजारों को देवी के दर्शन के बाद अपने पशु भी मिल गए। तभी से आज तक बंजारे वैशाख, ज्यैष्ठ, चैत्र, कुंआर माह मे नवरात्री पर्व पर लाखों की संख्या मे यहां मत्था टेकने जरूर आते हैं।
-सूनी गोद को भर देती है हरसिद्धी माता
राजधानी से 35 किमी दूर स्थित हरसिद्धी माता मंदिर में इन दिनों हजारों भक्तों का तांता लगा हुआ है। भोपाल से बैरसिया जाने वाली रोड से चार किमी अंदर स्थित माता के इस मंदिर को तरावली वाली माता के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि शुरू होते ही दूर-दूर से भक्तों के आने का सिलसिला यहां शुरू हो जाता है और आखिरी तक एक लाख से भी ज्यादा लोग यहां जुट जाते हैं। प्रतिदिन भंडारे आयोजित किए जाते हैं और युवक नौ दिन तक यहां सेवा करते हैं। मान्यता है कि जिन माताओं की कोख सूनी रहती है वे जब यहां आकर मान्यता करती हैं तो संतान की प्राप्ति जरूर होती है। पूरा मंदिर परिसर 51 एकड़ में फैला हुआ है और ढाई लाख स्क्वायर फीट में केवल माता का मंदिर बना हुआ है।
जहां तारे अस्त हुए वहीं बना गया तरावली वाली माता का मंदिर
किवदंती है कि 2030 साल पहले काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए और वहीं से माता मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए। काशी नरेश ने काशी में मां की स्थापना की और सेवा करने लगे। कहा जाता है कि माता प्रसन्न होकर प्रतिदिन काशी नरेश को सवा मन सोना देती थी। काशी नरेश इस सोने को जनता में बांट दिया करते। यह चर्चा उज्जैन तक फैल गई और यहां की जनता भी काशी के लिए पलायन करने लगी। तब उज्जैन में विक्रमादित्य का राज्य था। इस प्रकार जनता के पलायन करने से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे। वहां बेताल की मदद से काशी नरेश काे गहरी निंद्रा में भेजकर स्वयं मां दुर्गा की पूजा करने लगे। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया, जिसे विक्रमादित्य ने काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की। काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि क्या चाहते हो? तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने की मांग की। काशी नरेश नहीं माने तो विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक काशी में रहकर तपस्या की और मां दुर्गा के प्रसन्न होने पर दो वरदान मांगे। पहला उनका वह अस्त्र जिससे वह मृत व्यक्ति को फिर से जीवित कर देती थी और दूसरा उज्जैन चलने का। तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे वहीं रुक जाएंगी। विक्रमादित्य ने यह बात मान ली, क्योंकि उनके साथ चमत्कारी बेताल जो था। लेकिन माता की इच्छा कुछ और थी और उज्जैन पहुंचने के पहले तार अस्त हो गए। तार अस्त होने के कारण उक्त स्थान का नाम तरावली पड़ा। माता इसी स्थान पर रुक गई तो विक्रमादित्य ने फिर उज्जैन चलने जिद की। लेकिन माता नहीं मानी। तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक तपस्या की और अपनी बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को फिर जीवित कर दिया। ऐसा तीन बार हुआ, लेकिन विक्रमादित्य नहीं माने तब चौथी बार मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि मेरे सिर को उज्जैन में स्थापित करो। अब एक ही मां के तीन रूप यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।
भारत सरकार का वस्त्र मंत्रालय कर रहा है कारीगरों के साथ धोखा
कारीगरों को उनका सामान बेचने का अवसर देने वाले हैंडीक्राफ्ट मेले फर्जी लोगों के अड्डे बनकर रह गए हैं। ताजा मामला है गौहर महल में चल रहे गांधी शिल्प बाजार का, जहां फर्जी आईडी कार्ड पर दुकानें आवंटित की गई और अफसर मौजूद होकर भी मौन साधे हैं।
भीम सिंह मीणा
गौहर महल में गांधी शिल्प बाजार मेला 16 अक्टूबर से प्रारंभ हुआ है, जो कि २५ अक्टूबर तक चलेगा। यह मेला मप्र हस्तशिल्प विकास निगम और भारत सरकार के डवलपमेंट कमिश्नर (प्लानिंंग)ऑफ हैंडीक्रॉफट यानी डीसीएच द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है। लेकिन दुकानें आवंटित करने का अधिकार डीसीएच के अफसरों को ही है। डीबी स्टार को मंगलवार की शाम सूचना मिली कि यहां की दुकान नंबर 94 जिस व्यक्ति के नाम से अावंटित हुई है उसका आई कार्ड नकली है। तत्काल मौके पर पहुंचकर देखा और लोगों से बात की तो सही में एक ही नाम के दो आदमी सामने आए। जिस नाम के कार्ड को लेकर हो-हल्ला हुआ वह शुजा अब्बास आब्दी के नाम से डीसीएच ने ही वर्ष 2009 में जारी किया था। दरअसल जब डीबी स्टार मौके पर पहुुंचा तो तब तक काफी हंगामा हो चुका था, क्योंकि असली शुजा अब्बास आब्दी सामने आ गया और उसने नकली शुजा अब्बास आब्दी के कार्ड को अपने पास ले लिया। डीबी स्टार ने वे दोनों कार्ड देखे और पाया कि एक ही डिटेल वाले कार्ड पर फोटो अलग-अलग लगे हुए हैं। इसमें जो व्यक्ति असली शुजा अब्बास आब्दी होने का दावा कर रहा था उनसे बात करने पर एक अलग कहानी सामने निकलकर आई। बातचीत से पता चला कि उक्त कार्ड भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा प्रत्येक कारीगर को जारी किया जाता था। इसी कार्ड से शिल्प या हैंडीक्रॉफ्ट मेलों में दुकानें आवंटित की जाती हैं। उक्त कार्ड छह साल पहले जारी किया, लेकिन इसके असली मालिक यानी को कुछ समय पहले मिला। आज जब असली शुजा ने स्वयं के नाम से दुकान नंबर 94 में एक व्यक्ति को बैठे पाया तो आपत्ति ली और मौके पर मौजूद अफसरों को भी बताया। लेकिन डीसीएच के असिस्टेंट डायरेक्टर संतोष कुमार ने इस मामले में कोई एक्शन नहीं लिया और न ही अन्य दुकानदारों से उनके आई कार्ड मांगकर जांच की। जब डीबी स्टार ने बात की तो गोलमोल जवाब देते रहे। इस पूरे मामले की जानकारी डवलपमेंट कमिश्नर प्लानिंग ऑफिस में दी तो तत्काल कार्यवाही करने का जवाब मिला।
देखते ही देखते बदल गया आदमी
हैंडीक्रॉफ्ट मेलों में किस कदर धांधली और मनमानी की जा रही है यह मामला उसकी एक बानगी है। मंगलवार रात में जब नकली शुजा अब्बासी पकड़ा गया तो तत्काल 94 नंबर की दुकान में अनिल कुमार लोधी नामक आदमी आकर बैठ गया। जबकि थोड़ी देर पहले तक वहां नकली शुजा अब्बासी बैठा हुआ था। इस बात को साबित करती है वह रिकॉर्डिंग जिसमें नकली शुजा अब्बासी स्वीकार कर रहा है कि वह नकली है। डीबी स्टार ने उस नकली शुजा अब्बासी को मेले में ही ढूंढ निकाला और बात की तो उसने किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। हैरत की बात तो यह है कि मौके पर मौजूद डवलपमेंट कमिश्नर के असिस्टेंट डायरेक्टर संतोष कुमार जानते-बूझते भी कार्यवाही करने को तैयार नहीं थे।
असली खेल यह है
इस बार गौहर महल में आयोजित शिल्प बाजार मेले में गौहर महल के अलावा पीछे पड़े मैदान में भी 100 दुकानें आवंटित की गई हैं। इन दुकानों को आवंटित करने के पहले सादा कागज पर एक आवेदन लिया जाता है। 16 अक्टूबर 2015 को भी जब दुकानें आवंटित हो रही थी तो डीबी स्टार टीम मौके पर थी। वहां देखा कि एक-एक करके लोगों को भीतर बुलाया जाता और दुकान दे दी जाती। आरोप है कि एक दुकान के लिए मोटा कमीशन अफसरों के दलालों द्वारा वसूला जाता है। शायद यही कारण है कि पूरे मेले में कौन सी दुकान किस व्यक्ति को आवंटित हुई है इसकी सूची तक नहीं लगाई जाती। चूंकि आधे से ज्यादा दुकानदार जुगाड़ से दुकानें लगाते हैं तो वे सब देखकर भी खामोश रहते हैं और जो असली कारीगर शिकायत भी करते हैं तो उस पर कार्यवाही नहीं की जाती है।
Sunday, October 11, 2015
भोपाल बन रहा है युवाओं का शहर
राजधानी भोपाल के बारें में हमेशा कहा जाता रहा है कि यह बाबुओं का शहर है और चाल बेहद सुस्त है। लेकिन बीते एक साल में यहां आकर पढ़ाई और नौकरी करने वाले युवाओं ने इस जुमले को झुठलाना शुरू कर दिया है। अब भोपाल के नौजवान सूरज उगने के साथ सड़कों पर नजर आते हैं तो देर रात तक फूड जाने पर इनका जमावड़ा रहता है।
भोपाल का रहने वाला उत्कर्ष एमपी नगर जोन दो की एक कोचिंग से आईआईटी की तैयारी कर रहा है। पहले उसके दोस्त केवल भोपाल के निवासी हुआ करते थे, लेकिन अब प्रदेश के अन्य राज्यों से आने वाले युवा उसकी मित्रमंडली में शामिल हैं। उत्कर्ष ही नहीं, बल्कि शहर में अब प्रत्येक विद्यार्थी का मित्रमंडल अंतर्राज्यीय हो गया है। दरअसल यह बदलाव बीते एक-दो साल से हाे रहा था और इस समय अपने चरम पर है। यह सामने तब आया जब नगर निगम भोपाल द्वारा शहर के हॉस्टल की संख्या जांची गई तो पता चला कि अचानक शहर के कुछ इलाके पूरी तरह से स्टूडेंट स्ट्रीट के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। निगम अफसरों को लगातार शिकायत मिल रही थी कि रहवासी क्षेत्रों में लोगों ने अपने घर स्टूडेंटस को दे दिए हैं। निगम ने एक टीम बनाकर पूरे भोपाल की इंटरनल रिपोर्ट जुटाई तो एक बड़ा आंकड़ा सामने आया। हॉस्टलों की संख्या बढ़ने के अलावा खानपान, फैशन और गैजेट्स आदि में भी बदलाव आया है। आलम यह है कि देश-विदेश के बड़े ब्रांड, जिन्हें खरीदने के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था वे भोपाल में आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं। डीबी स्टार ने इस दावे की जांच करने के लिए शहर के उन लोगों से बात की जो भोपाल में खानपान, गैजेट्स, हॉस्टल और कपड़ों के व्यवसाय से जुड़े हैं। इसकी भी पड़ताल की कि आखिर इतनी संख्या संख्या में युवा भोपाल क्यों आ रहे हैं। इस पड़ताल में यह भी खुलासा हुआ कि युवा बाहर से तो आ ही रहे हैं, लेकिन शहर के युवाओं ने दूसरे शहरों की तरफ जाने का मोह छोड़ दिया।
राष्ट्रीय संस्थान और कोचिंग ने बढ़ाई संख्या
युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होन की दो मुख्य वजह हैं। एक तो यहां देश की नामी-गिरामी कोचिंग ने अपने सेंटर शुरू दिए अौर कुछ बड़ी कोचिंग ने वीडियो या ऑनलाइन सेवाएं देना प्रारंभ कर दी है। इससे कोटा व दूसरे शहरों में जाकर कोचिंग करने वाले स्टूडेंट अब भोपाल में ही रहकर कॉम्पटिशन एक्जाम की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी बड़ी वजह है शहर के भीतर राष्ट्रीय संस्थानों की शुरूआत। इनमें नीलबड़ के पास नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी, एमपी नगर में माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, माता मंदिर के पास मैनिट (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी), कोलार रोड पर निफ्ट (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फेशन टेक्नोलॉजी), भदभदा के पास इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, गोविंदपुरा में डिजास्टर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, श्यामला हिल्स पर एनआईटीटीआर, नवीबाग स्थित सिऐक (सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग) और जेके रोड स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग आदि प्रमुख हैं। इन सभी में करीब दो हजार से ज्यादा सीटें हैं, जिन पर बाहर के छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनके अलावा तीन बड़े मेडिकल कॉलेज और करीब पांच डेंटल कॉलेज भी यहां हैं। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज की तो भरमार है।
फूड जोन हुए विकसित
युवाओं की आमद का एक बड़ा प्रमाण है भोपाल के लगभग सभी हिस्सों में बड़े स्तर पर फूड जोन का विकसित होना। बड़ी होटल्स और रेस्तरां ने तो परिवार के साथ स्टूडेंट के लिए एक अलग जगह बनाई है। लेकिन सड़क किनारे बड़ी संख्या जंक फुड की खुली दुकानें इस तथ्य को और मजबूत करती है। नगर निगम की ही एक और रिपोर्ट में लिखा है कि एमपी नगर के दोनों जोन, दो नंबर से बारह नंबर तक के सभी बाजार, न्यू मार्केट, जेके रोड आदि इलाकों में करीब 600 गुमटियां केवल खानपान की चल रही हैं।
यूथ के प्रेशर में पहले दिन मिलते हैं गैजेट्स
दो साल पहले तक शहर में एक ब्रांडेड कार्डलैस के लिए भी आठ से दस दिन तक इंतजार करना पड़ता था। लेकिन यूथ का आगमन से अब चाहे आई फोन हो या फिर कोई अन्य गैजेट्स लांचिंग के तत्काल बाद पूरे देश के साथ भोपाल में आसानी से मिल जाते हैं। दस नंबर स्थित आशा कलेक्शन और शहर के सभी मॉल्स में युवाओं को आसानी से गैजेट्स की दुकानों पर खरीदारी करते देखा जा सकता है। आलम यह है कि पूरे शहर में 400 से 500 मोबाइल प्रतिदिन बेचे जाते हैं और इन्हें खरीदने वाले 60 प्रतिशत युवा ही हैं।
Sunday, April 26, 2015
भूकम्प के वो 30 सेकिंड मेरा पूरा वजूद हिला गए
नेपाल से भोपाल तक भूकंप और मैं भी हुआ प्रभावित
प्रतिदिन की तरह मैं सुबह 10.30 बजे तक ऑफिस (दैनिक भास्कर) पहुंचा और अपने काम में जुट गया। तब तक हमारे ऑफिस का टीवी बंद था और मैं दुनिया में हो रही हलचल से बेखबर अपनी न्यूज स्टोरी को पूरी करने में जुटा हुआ था। उस समय तक एक-दो लोग ही ऑफिस में बैठे थे, लेकिन 11.30 बजे तक सभी आ गए। मैं अपने काम में जुटा था और मेरी बगल में Sr फोटो जर्नलिस्ट सतीश टेवरे, उनके बगल में साथी पत्रकार राधेश्याम दांगी और आखिर में सब एडिटर शमी कुरैशी बैठे हुए थे। अचानक ऐसा लगा कि मेरी टेबिल हिल रही है और बहुत जोर-जोर से। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब ज्यादा हिलने लगी तो साथी टेवरे जी को घूरकर देखा तो पता चला कि वे मुझे घूर रहे हैं। मैं सवाल करता इसके पहले ही कुरैशी जी ने राधेश्याम से पूछ लिया कि टेबिल क्यों हिला रहे हो। राधे बोले कि मैं नहीं हिला रहा हूं तो सब एक-दूसरे का मूंह देखने लगे कि आखिर टेबिल हिला कौन रहा है। इतने में एक शोर उठा और Sr Artist श्री गौतम चक्रवर्ती व उनके साथी भागते हुए आए और बोले की भागो भूकंप आया है। कुछ पल तक समझ में ही नहीं आया कि हो क्या रहा है और मैं अपनी जगह ही बैठा रहा। तब तक कंपनी जारी था और पूरा कम्प्युटर व टेबिल हिल रही थी। जब समझ में आया तो मैं भी बाकी लोगों के साथ उठकर भागा और हम सब दैनिक भास्कर के परिसर में एकत्रित हो गए। नीचे खड़े लोग हमें हैरानी से देख रहे थे कि ये भागकर क्यों आ रहे हैं। दरअसल हम दैनिक भास्कर के चौथे माले पर बैठते हैं और वहां कंपनी हो रहा था। लेकिन नीचे और पहले माले पर बैठे लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि क्या हो रहा है? इतनी देर में सामने वाली बिल्डिंग से भी लोग निकलकर आने लगे। हम संभल भी नहीं पाए थे कि एक और शोर सुनाई दिया और ये वे लोग थे जो अपनी जान बचाकर बिल्डिंग से उतर रहे थे। सभी बदहवास और बेखकर एक-दूसरे को अपने अनुभव सुना रहे थे। पूरा दैनिक भास्कर स्टॉफ परिसर में आकर खड़ा हो गया था। इतने याद आया कि भूकंप तो पूरे शहर में और मेरा घर भी इसी शहर में है। तत्काल घर कॉल करके श्रीमती जी से बात की तो उन्होंने बताया कि वहां भी हलचल हुई थी। मां और बहन का हालचाल जाना। इतने में पूरे शहर से कॉल आना शुरू हो गए कि यहां भी भूकंप आया है। करीब 10 से 15 मिनट तक हम नीचे ही तेज धूप में खड़े रहे और फिर ऊपर अपने ऑफिस में आए। तब तक हमारे एक साथी ने टीवी चालू कर दी थी और हम टीवी पर देख रहे थे कि किस तरह नेपाल भूकंप का शिकार हो गया है। टीवी पर लाशों और ध्वस्त हो चुके मकानों के ही दृश्य थे। एक पत्रकार होने के बाद भी यह सब देख नहीं पाया और टीवी छोड़ वापिस अपने काम में लग गया। लेकिन एक बात फिर स्पष्ट हो गई कि हम सबसे ताकतवर प्राणी होने का दम भरने वाले इंसान प्रकृति के सामने किसी तिनके से ज्यादा औकात नहीं रखते हैं। इसलिए दोस्तों जो जीवन मिला है उसे जिंदादिली से जिएं और दूसरों के लिए जिएं। समाज और देश के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करें, क्योंकि यही यादें आपकी रह जाएंगी।
-भीमसिंह मीणा
Sunday, February 1, 2015
...वो ढाबे वाली लड़की
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| फोटो प्रतीकात्मक |
वो एक हवा के झाैंके की तरह आई और अपनी कहानी सुनाकर चली गई। उसके दर्द को सुनकर वक्त थम सा गया था। वो सांवली सी लड़की। कपड़े से साफ लग रहा था कि राजस्थान या राजस्थान की सीमा से लगे इलाके की रहने वाली है। जब मैं उससे बात कर रहा था तो लोग मुझे घूर रहे थे। तब मुझे अपनी किस्मत पर रश्क हो रहा था, लेकिन बाद में जब हकीकत पता चली तो हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। जिससे बात कर रहा था वो मेरे सामने तो थी, लेेकिन किसी अन्य को उसकी परछाई तक नहीं दिखाई दी। कहते हैं न कि कुछ घटनाओं को भूल पाना आसान नहीं होता है। खासतौर से तब जबकि मामला लड़की और डर से जुड़ा हो। जिस मामले की बात मैं कर रहा हूं वह कुछ दिन पहले की ही है। पहले तो लगा कि इसे छिपाकर रखना चाहिए, लेकिन बाद में लगा कि इस अनुभव को शेयर किया जाए।
यह बात कुछ दिन पहले की ही है जब मैं अपनी ससुराल रतलाम एक विवाह के सिलसिले में गया था। रतलाम के ही पास सैलाना नामक एक छोटा सा कस्बा है। यहां कभी सैलाना रियासत हुआ करती थी और कुछ दिन पहले तक यहां राजपरिवार भी रहता था। लेकिन अब वे लोग इंदौर शहर में रहते हैं। काफी भव्य महल यहां बना हुआ है। इसी महल के पीछे एक कैक्टस पार्क है। पिछले दिनों में यहां घूमने आया तो यहां के चौकीदार ने मुझे एक लड़की की कहानी सुनाई। कहानी हकीकत थी कि अफसाना यह तो पता नहीं, लेकिन सुनकर काफी मजा आया। कहानी में एक राजस्थानी लड़की थी और उसे सैलाना रियासत के एक सिपाही से प्रेम हो गया था। सिपाही एक छोटी सी लड़ाई में मारा गया और वो लड़की अकेली रह गई। सिपाही की मौत ने उसे बावला बना दिया था और वो सैलाना के आसपास ही अपने सिपाही को खोजा करती। अचानक एक दिन उसकी लाश सैलाना से थोड़ा आगे झरनेश्वर नामक कोई स्थान है वहां मिली। कई तरह की बातें हुई। किसी ने कहा कि उसके साथ बलात्कार हुआ और इसके बाद मार दिया गया। किसी ने कहा कि उसने अपने सिपाही के चले जाने के बाद जान दे दी। बात होती रही और गांव वालों ने ही जैसे-तैसे उसका अंतिम संस्कार कर दिया। बात आई-गई हो और अब तो पूरे सैलाना में इसकी चर्चा भी नहीं होती। मेरे जैसे कोई भूले-भटके पर्यटक चले जाए तो कुछ नया जानने के चक्कर में ऐसी कहानियां सुन लेते हैं।
खैर मैं वहां से वापस आ गया और अगले दिन मंदसौर गया। असली कहानी मंदसौर से लौटते वक्त शुरू हुई। लौटते हुए मुझे रात के करीब दो बज गए। मुझे रात में घूमना बड़ा अच्छा लगता है और ढाबों व चायब की दुकानों पर सेल्फी लेना तो और भी मजेदार। मैंने ड्राइवर से किसी ढाबे पर कार रोकने के लिए कहा। उसने मंदसौर से निकलने के बाद ढोढर के पहले एक ढाबे पर कार रोक दी। ढाबा काफी बड़ा था, लेकिन ज्यादा गाड़ियां और ग्राहक नहीं होने के कारण ढाबे के कर्मचारी झपकियां ले रहे थे। ड्राइवर ढाबे के भीतर चाय का आर्डर देने चला गया और मैं खुले मैदान में टहलने लगा। टहलते-टहलते किसी के रोने की आवाज आई। मैं आवाज की दिशा में बढ़ा और जिस तरफ बढ़ रहा था वे ढाबे के दायीं तरफ का हिस्सा था। खाली मैदान, पीछे खेत और धुंध के अलावा मुझे कुछ दिखाई नहीं दिया। मैँ वापस लौटने ही वाला था कि फिर किसी के सिसकने की आवाज आई। मैं फिर उस तरफ बढ़ा तो ढाबे की दीवार से सटकर कंबल ओढ़े एक महिला बैठी थी और अपने घुटनों पर सिर रखकर सिसक रही थी। मैंने पास जाना उचित नहीं समझा और दूर से ही खड़े होकर उसे आवाज दी।
उसने सिर नहीं उठाया।
मैंने फिर आवाज दी।
इस बार उसने ऊपर चेहरा किया तो मैं थोड़ा आश्चर्य में पढ़ गया, क्योंकि वो एक लड़की थी और चेहरे पर गोदना गुदे हुए थे। उसकी बड़ी-बड़ी आंखे और उनसे बहते आंसू मुझे दिखाई दिए। मैं वहीं जड़वत हो गया और दिमाग में विचारों की आंधी चलने लगी। समझ में नहीं आया।
मैंने पूछ- तुम कौन हो और यहां क्यों बैठी हो?
कोई जवाब नहीं और फिर सिर घुटनों के बीच चला गया। सिसकने की आवाज सुनाई दी।
बोलती क्यों नहीं। कौन हो तुम? - फिर मैंने पूछा
उसने सिर उठाया और बोली - दुखियारी हूं। मेरे बारें में जानकर क्या करोगे?
मेरे अंदर का पत्रकार जाग गया। मुझे मामला दिलचस्प लगा।
मैंने कहा - तुम इस हालत में यहां बैठी हो। ठंड नहीं लग रही? और फिर इधर क्यों बैठी हो। चलो ढाबे पर। कोई तुम्हारे साथ है?
ढेर सारे सवाल और सिर्फ एक जवाब - जो मेरा था वो छिन गया।
कुछ समझ में नहीं आया और लगा कि जरूर इसके साथ गलत हुआ और किसी ने इसका सामान छीन लिया।
मैंने कहा - कोई बात नहीं। तुम उठो और मुझे बताओ कि तुम्हारे साथ क्या हुआ? शायद मैं कोई मदद कर पाऊं।
.. मेरी मदद अब कोई नहीं कर सकता - फिर छोटा सा जवाब
मैंने फिर कहा - नहीं मुझे बताओ। मैं एक पत्रकार हूं और तुम्हारी मदद कर सकता हूं।
.. तो फिर मेरी बात सुनोगे - उसने कहा
हां-हां क्यों नहीं । - मैंने कहा
तो सुनो ...
और वो बोलती गई। मैं सुनता गया। समय को जैसे पंख लग गए। उसका एक-एक शब्द मेरे कानों में किसी टंकार की तरह पड़ रहा था। अचानक मुझे किसी ने हिलाया। पलटकर देखा तो मेरा ड्राइवर राजू था।
उसने कहा - आपको क्या हो गया साहब। किससे बात कर रहे हैं? और क्या हाल बन गया।
.. मैं तो उस लड़की से बात कर रहा था - मैंने कहा
किस लड़की से? - राजू ने कहा
मैंने दूसरी दिशा सिर घुमाकर हाथ उठाया तो लड़की वाली जगह पर कुछ नहीं था। लेकिन मैं सर्द रात में पसीने से तर-बतर हो चुका था।
मैंने राजू की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहा था।
मैंने उससे पूछा - मुझे यहां खड़े हुए कितनी देर हो ग?
पांच मिनट- उसने कहा
थोड़ा रुककर फिर बोला - आपकी चाय कब से तैयार है। मुझे लगा कि आप आ जाओगे। थोड़ी देर इंतजार किया। नहीं आए तो बुलाने आया। देखा कि आप ढाबे के इस कोने की तरफ देख रहे थे और माथे पर पसीना आ रहा था। कुछ देर चुप रहा, लेकिन आपकी हालत देखकर घबरा गया था। आपको आवाज दीख् लेकिन आपने सुना ही नहीं। तब मैंने आपको पकड़कर हिलाया।
मैंने माथे का पसीना पोंछा और ढाबे के मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गया।
राजू चाय लेकर आया और मुझे दी, लेकिन मेरा ध्यान तो कहीं और था। खैर हम वहां से रवाना हुए पूरे रास्ते मैंने राजू से बात नहीं की। सुबह के तीन बजे हम रतलाम पहुंचे। बिस्तर पर पहुंच गया, लेकिन उस लड़की की तस्वीर और कैक्टस पार्क की कहानी अब समझ में आने लगी थी।
वो कहानी क्या थी यह फिर कभी आप लोगों से शेयर करुंगा।
-भीमसिंह मीणा
Saturday, January 17, 2015
सेंसर तेरी 'लीला' अपरंपार
देश में इस समय दाे बड़ी खबर चर्चा में हैं। पहली दिल्ली के चुनाव और आईपीएस किरण बेदी का भाजपा में जाना। इनके साथ 'आप; की शाजिया इल्मी का भाजपा में शामिल होना। लेकिन इससे भी बड़ी खबर हो गई है सेंसर बोर्ड की चेयरपर्सन लीला सेमसन और उनके साथ बोर्ड के अन्य सदस्यों का इस्तीफा। इनके इस्तीफे का भी बड़ा ही अजीब कारण है कि फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड को सर्टिफिकेशन अपीलिएट ट्रिब्युनल ने हरी झंडी दे दी है। जबकि सेंसर बोर्ड कमेटी ने इस पर रोक लगाई थी। इस अचानक इस्तीफे ने लीला सेमसन के ऊपर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे पहला सवाल कि सेंसर बोर्ड का मुख्य काम फिल्म पर रोक लगाना कतई नहीं होता है, बल्कि फिल्मों की श्रेणी और उन्हें देखने की उम्र तय करना होता है। फिर भी लीला सेमसन ने फिल्म पर न केवल रोक लगाई बल्कि इस्तीफा भी दिया। लेकिन इन्हीं लीला सेमसन को कुछ दिन पहले प्रदर्शित हुई फिल्म 'pk' में कोई आपत्ति नहीं दिखी। भारत के करोड़ों हिन्दुओं ने विरोध किया और मुसलमानों ने भी माना कि फिल्म गलत है, लेकिन लीला सेमसन को यह आपत्तिजनक नहीं लगा। आखिरकार फिल्म का प्रसारण होता है और अब तक यह फिल्म 333 करोड़ रुपए कमा चुकी है। अब कहा जा रहा है कि फिल्म लोगों ने पंसद की, इसलिए वह सही थी और सेंसर बोर्ड का निर्णय भी सही था। ठीक है स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर यह सब भी हो गया और लोगों ने दिल खोलकर इस बात का स्वागत किया। तो फिर राम-रहीम में ऐसा क्या आपत्तिजनक आ गया कि उसे प्रमाण-पत्र नहीं देने पर बन आई। इस फिल्म को भी प्रमाण पत्र दीजिए और होने दीजिए प्रदर्शित। जनता खुद कर देगी इंसाफ कि फिल्म ने उसकी भावनाओं को कितनी ठेस पहुंचाई है।
थोड़ा सा पीछे जाएं तो कई बातें ऐसी हैँ जिनसे लीला सेमसन के ऊपर भी सवाल खड़े होंगे। पीछे के कारणों पर जाएं तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। दरअसल लीला सेमसन को कांग्रेस ने सेंसर बोर्ड का चेयरमेन बनाया था। इनका कार्यकाल भी समाप्त हो गया है और इन्होंने अपने कार्यकाल को बढ़ाने के लिए जुगत लगाई थी, जो कामयाब नहीं हो सकी। अब जबकि कार्यकाल खत्म हो गया है तो कुछ विवाद खड़े कर दिए और शामिल हो गए राजनीतिक शहीदों की सूची में। लीला सेमसन अप्रैल 2011 से बोर्ड की अध्यक्ष हैं। सवाल यह भी है कि इसके पहले भी कई बार सरकार की तरफ से निर्देश मिलते रहे हैं तो तब क्यों लीला को कुछ दिखाई नहीं दिया। इसके पीछे की एक और कहानी यह है कि राम-रहीम जो डेरा सच्चा सौदा के मुखिया हैं ने भाजपा को हरियाणा चुनाव में सहयोग किया था। इसके बाद राम-रहीम ने फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड यानी MSG बनाई। लीला ने अपनी वफादारी निभाते हुए MSG पर रोक लगा दी और इससे कांग्रेस भी काफी खुश हुई। सीधे-सीधे लीला के नंबर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने बढ़ गए हैं। दूसरी बात लीला ने जितने भी आरोप लगाए कि केंद्र सरकार ने MSG के प्रदर्शन के लिए दबाव बनाया, लेकिन उसका कोई भी प्रमाण पेश नहीं कर सकी। अब यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है न कि धर्म का विषय रहा।
और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
Sunday, December 28, 2014
ये शक्ति प्रदर्शन, ये फिजुलखर्ची क्यों ?
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| फोटो - सधन्यवाद, भास्कर डॉट कॉम से |
शायद आप लोगों को याद होगा कि मप्र में इस समय वित्तीय संकट चल रहा है और केंद्र ने भी इस बार कम बजट दिया है। लेकिन यदि अभी किसी शक्ति प्रदर्शन वाले कार्यक्रम की बारी आएगी तो तंग हाथ खुल जाएंगे। भाजपा सुशासन और मितव्यतता की बात करती है और उम्मीद है झारखंड में इसका पालन होगा।
-भीमसिंह मीणा
Saturday, December 27, 2014
देश में धर्मांतरण हो रहा है कि मतांतरण
देशभर में बवाल मचा हुआ है कि मुसलमानों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें हिन्दु बनाया जा रहा है। हिन्दु संगठनों का कहना है कि हम अपनों की घर वापसी करवा रहे हैं। इस विवाद के बीच एक और चर्चा शुरू हो गई और वह है धर्मांतरण शब्द को लेकर कि किसी के धर्म को परिवर्तन करने वाली व्यवस्था को धर्मांतरण कहेंगे कि मतांतरण। दरअसल इन दोनों शब्दों का अलग-अलग अर्थ है। विद्वान बताते हैं कि कोई व्यक्ति आपके धर्म, विचार और सोच को बदल रहा है तो वह धर्मांतरण नहीं, बल्कि मतांतरण है। अर्थात आपके एक मत को बदलकर दूसरे मत में लाना। लेकिन राजनीतिक व्यक्ति यदि है तो वह सीधे कहेगा कि मतांतरण जैसी कोई चीज नहीं होती है और केवल धर्मांतरण ही एकमात्र शब्द है। इस संबंध में बलवीर पुंज का आर्टिकल "मतांतरण पर बेजा शोर' पढ़ा जा सकता है। इसमें मतांतरण और उसके इतिहास के बारें में बड़े ही उम्दा ढंग से समझाया गया है। खैर बात हो रही है धर्मांतरण और मतांतरण की तो मतांतरण का एक अर्थ मैंने आपको बताया।
Meaning Of मतांतरण in English And हिन्दी
मतांतरण शब्द मतांतर शब्द के प्रचलन से बना है और इसका अंग्रेजी में अर्थ है Diffrent opinion और Divergent View। यानी अलग ढंग से चीजों को देखना और उनके बारें में अलग राय रखना। अपने पहले मत से अलग मत प्रकट करना और मतांतरण ही लोग करवाते हैं। मतांतरण के बारें में पूरी तरह से जानना या समझना है तो इसके लिए हमें रामप्रसाद की किताब मतांतरण से घटता भारत पढ़ना चाहिए। इसमें बड़े ही अच्छे ढंग से मतांतरण के तमाम पहलुओं से परिचय कराया गया है। मेरा इस मामले में कतई यह मत नहीं है कि मुस्लिम या ईसाई मतांतरण गलत है या फिर हिन्दुओं का मतांतरण गलत है। इस पूरे आलेख का मकसद भी केवल इतना है कि जो बातें चलन में हैं उनके इतर बहुत कुछ होता है और अब तक हम केवल धर्मांतरण जैसे शब्दों से ही वाकिफ हैं। इसी प्रकार धर्मांतरण और घर वापसी में भी भारी अंतर है, लेकिन इस बारें में फिर कभी बात करेंगे।
हां इतना जरूर सामने आता है कि मतांतरण पिछले एक वर्ष से जारी है और इतिहास में दर्ज जानकारी बताती है कि प्रथम बार 712 ईस्वी में पहली बार मतांतरण प्रारंभ हुआ। वहीं वर्ष 1548 ईस्वी में गोवी में इसकी शुरूआत हुई। मतांतरण किसने शुरू किया था इस बात का ठीक-ठीक उल्लेख तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि गोवा में इसी समय से इसकी शुरूआत हुई थी। गोवा के अलावा असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय आदि में मतांतरण को बड़े ही पुरजोर ढंग से चलाया गया। कहा जाता है कि शुरूआत में बलात तरीके से इसे अंजाम दिया गया।
-भीमसिंह मीणा
Meaning Of मतांतरण in English And हिन्दी
मतांतरण शब्द मतांतर शब्द के प्रचलन से बना है और इसका अंग्रेजी में अर्थ है Diffrent opinion और Divergent View। यानी अलग ढंग से चीजों को देखना और उनके बारें में अलग राय रखना। अपने पहले मत से अलग मत प्रकट करना और मतांतरण ही लोग करवाते हैं। मतांतरण के बारें में पूरी तरह से जानना या समझना है तो इसके लिए हमें रामप्रसाद की किताब मतांतरण से घटता भारत पढ़ना चाहिए। इसमें बड़े ही अच्छे ढंग से मतांतरण के तमाम पहलुओं से परिचय कराया गया है। मेरा इस मामले में कतई यह मत नहीं है कि मुस्लिम या ईसाई मतांतरण गलत है या फिर हिन्दुओं का मतांतरण गलत है। इस पूरे आलेख का मकसद भी केवल इतना है कि जो बातें चलन में हैं उनके इतर बहुत कुछ होता है और अब तक हम केवल धर्मांतरण जैसे शब्दों से ही वाकिफ हैं। इसी प्रकार धर्मांतरण और घर वापसी में भी भारी अंतर है, लेकिन इस बारें में फिर कभी बात करेंगे।
हां इतना जरूर सामने आता है कि मतांतरण पिछले एक वर्ष से जारी है और इतिहास में दर्ज जानकारी बताती है कि प्रथम बार 712 ईस्वी में पहली बार मतांतरण प्रारंभ हुआ। वहीं वर्ष 1548 ईस्वी में गोवी में इसकी शुरूआत हुई। मतांतरण किसने शुरू किया था इस बात का ठीक-ठीक उल्लेख तो स्पष्ट नहीं है, लेकिन इतना साफ है कि गोवा में इसी समय से इसकी शुरूआत हुई थी। गोवा के अलावा असम, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा और मेघालय आदि में मतांतरण को बड़े ही पुरजोर ढंग से चलाया गया। कहा जाता है कि शुरूआत में बलात तरीके से इसे अंजाम दिया गया।
-भीमसिंह मीणा
न देखा होगा मोदी सा धनुर्धर
उस दिन जब सुबह-सुबह बनारस के अस्सी घाट पर मोदी निरीक्षण कर रहे थे तो उनके हर कदम के साथ एक तीर कई निशानें पर जाकर लग रहा था। उन्होंने आज एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे हर एक दिन में एक इतिहास गढ़ने के लिए आए हैं। हालांकि अखबार, पत्र-पत्रिकाएं मोदी के मल्टी टैलेंटेड पीएम होने के बारें में सैंकड़ों आर्टिकल लिख चुके हैं। लेकिन जब पीएम मोदी ने उस दिन एक तीर से कई निशाने लगाए तो लगा कि इस विषय में लिखना चाहिए।आपने देखा कि किस तरह से 24 दिसंबर को यानी अटलजी व मालवीय जी को भारत रत्न दिए जाने की घोषणा इन दोनों के जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले की गई। ठीक एक दिन बाद यानी आज मोदी सीधे बनारस पहुंच गए और वहां की जनता को याद दिलाया कि उन्होंने वादा किया था कि पंडित मदनमोहन मालवीय भारत रत्न हैं सो उन्हें वो दिया जा रहा है। इस वादे के अलावा उन्होंने भारत को स्वच्छ करने की जो मुहिम शुरू की तो उसे लेकर वह कितने गंभीर हैं यह भी आज दिखाई दिया।साथ ही स्थानीय नरेश की स्मृति को याद करके भी उन्होंने लोगों के मन को जीत लिया। अपने संसदीय क्षेत्र में उस दिन पहुंचकर देश के और खासतौर सं भाजपा के सांसदों को बताया कि यदि चाहे तो कोई सांसद कितनी ही बार क्षेत्र में जा सकता है और अन्य सभी जरूरी काम भी कर सकता है। ये मैसेज खासतौर से उन सांसदों को दिया गया था जो कहते हैं कि वे समयाभाव के कारण अपने संसदीय क्षेत्र में नहीं घूम पाए। लिखने को बहुत कुछ है आगे के आर्टिकल के लिए बाकी।
Sunday, October 19, 2014
ये सिर्फ मोदी की जीत नहीं है, बल्कि वंशावली की भी हार है
मोदी लगातार माहौल को बदल रहे हैं और निरंतर नई घोषणाएं कर रहे हैं। लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि वे अपने द्वारा कहे गए कामों को भी समयावधि में पूरा करेंगे और देश को नई ऊंचाईयों पर ले जाएंगे।
Sunday, September 14, 2014
Saturday, September 6, 2014
Sunday, June 1, 2014
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