अब जबकि देश के प्रमुख पांच राज्य पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, केरल और पुडचेरी में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के गुरूवार की सुबह से परिणाम आना शुरू हो जाएगा।सभी पार्टियों की धड़कन बढ़ गई होगी। खासतौर से कांग्रेस की, क्योंकि इनका काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। परिणाम को लेकर चिंतित तो भाजपा भी है, लेकिन उतनी नहीं। कारण साफ है कि भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और जितनी भी सीटें, जिस भी राज्य में मिलेंगी इनको फायदा ही होना है। सबसे बड़ी बात की इस बहाने भाजपा अपने संगठन को प्रत्येक राज्य में मजबूत कर रही है। कार्यकर्ता खड़े हो रहे हैं और अब काम दिखाई देने लगा है। दरअसल इन पांच राज्यों में जिस प्रकार से भाजपा ने कैम्पेन किया, वह मिशन 2019 की तैयारी के लिए था। बिहार के बाद भाजपा अपने कैम्पेन को लेकर बेहद सतर्क है और डीएनए टेस्ट जैसा एक भी जुमला इन पांच राज्यों के प्रचार में सुनने को नहीं मिला। माना जा रहा है कि यह चुनाव भेल ही क्षेत्रीय हुए हो, लेकिन इस बार इनको राष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें ममता बनर्जी, जयललिता,
तरुण गोगोई, एम करुणानिधि, ओमन चांडी, वीएस अच्युतानंदन, बुद्धदेव
भट्टाचार्य, सर्बानंद सोनोवाल और एन रंगासामी जैसे बड़े नेताओं की किस्मत का फैसला जो होने वाला है। सर्वे में ममता बनर्जी को सुरक्षित बताया जा रहा है, लेकिन जब तक मतपेटी के भीतर से वोटर्स का फैसला बाहर नहीं आ जाता, कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भले चैनल सर्वे केरल, असम और तमिलनाडू में सत्ता परिवर्तन के संकेत दे रहे हो, लेकिन चर्चा हो रही है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व को कितना बचा पाएगी। दरअसल भाजपा का बड़ा ही स्पष्ट एजेंडा है कि वो भारत को कांग्रेस मुक्त करना चाहती है। यही कारण है कि बिहार में हारने के बाद भाजपा नेताओं को इतना अफसोस नहीं हुआ, जितना उत्तराखंड में कांग्रेस की वापसी से हुआ। बहरहाल इस बार इन गैर हिन्दी राज्यों के चुनाव परिणाम में हिन्दी राज्यों के लोगों की खासी दिलचस्पी है।
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Wednesday, May 18, 2016
Sunday, April 26, 2015
भूकम्प के वो 30 सेकिंड मेरा पूरा वजूद हिला गए
नेपाल से भोपाल तक भूकंप और मैं भी हुआ प्रभावित
प्रतिदिन की तरह मैं सुबह 10.30 बजे तक ऑफिस (दैनिक भास्कर) पहुंचा और अपने काम में जुट गया। तब तक हमारे ऑफिस का टीवी बंद था और मैं दुनिया में हो रही हलचल से बेखबर अपनी न्यूज स्टोरी को पूरी करने में जुटा हुआ था। उस समय तक एक-दो लोग ही ऑफिस में बैठे थे, लेकिन 11.30 बजे तक सभी आ गए। मैं अपने काम में जुटा था और मेरी बगल में Sr फोटो जर्नलिस्ट सतीश टेवरे, उनके बगल में साथी पत्रकार राधेश्याम दांगी और आखिर में सब एडिटर शमी कुरैशी बैठे हुए थे। अचानक ऐसा लगा कि मेरी टेबिल हिल रही है और बहुत जोर-जोर से। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब ज्यादा हिलने लगी तो साथी टेवरे जी को घूरकर देखा तो पता चला कि वे मुझे घूर रहे हैं। मैं सवाल करता इसके पहले ही कुरैशी जी ने राधेश्याम से पूछ लिया कि टेबिल क्यों हिला रहे हो। राधे बोले कि मैं नहीं हिला रहा हूं तो सब एक-दूसरे का मूंह देखने लगे कि आखिर टेबिल हिला कौन रहा है। इतने में एक शोर उठा और Sr Artist श्री गौतम चक्रवर्ती व उनके साथी भागते हुए आए और बोले की भागो भूकंप आया है। कुछ पल तक समझ में ही नहीं आया कि हो क्या रहा है और मैं अपनी जगह ही बैठा रहा। तब तक कंपनी जारी था और पूरा कम्प्युटर व टेबिल हिल रही थी। जब समझ में आया तो मैं भी बाकी लोगों के साथ उठकर भागा और हम सब दैनिक भास्कर के परिसर में एकत्रित हो गए। नीचे खड़े लोग हमें हैरानी से देख रहे थे कि ये भागकर क्यों आ रहे हैं। दरअसल हम दैनिक भास्कर के चौथे माले पर बैठते हैं और वहां कंपनी हो रहा था। लेकिन नीचे और पहले माले पर बैठे लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि क्या हो रहा है? इतनी देर में सामने वाली बिल्डिंग से भी लोग निकलकर आने लगे। हम संभल भी नहीं पाए थे कि एक और शोर सुनाई दिया और ये वे लोग थे जो अपनी जान बचाकर बिल्डिंग से उतर रहे थे। सभी बदहवास और बेखकर एक-दूसरे को अपने अनुभव सुना रहे थे। पूरा दैनिक भास्कर स्टॉफ परिसर में आकर खड़ा हो गया था। इतने याद आया कि भूकंप तो पूरे शहर में और मेरा घर भी इसी शहर में है। तत्काल घर कॉल करके श्रीमती जी से बात की तो उन्होंने बताया कि वहां भी हलचल हुई थी। मां और बहन का हालचाल जाना। इतने में पूरे शहर से कॉल आना शुरू हो गए कि यहां भी भूकंप आया है। करीब 10 से 15 मिनट तक हम नीचे ही तेज धूप में खड़े रहे और फिर ऊपर अपने ऑफिस में आए। तब तक हमारे एक साथी ने टीवी चालू कर दी थी और हम टीवी पर देख रहे थे कि किस तरह नेपाल भूकंप का शिकार हो गया है। टीवी पर लाशों और ध्वस्त हो चुके मकानों के ही दृश्य थे। एक पत्रकार होने के बाद भी यह सब देख नहीं पाया और टीवी छोड़ वापिस अपने काम में लग गया। लेकिन एक बात फिर स्पष्ट हो गई कि हम सबसे ताकतवर प्राणी होने का दम भरने वाले इंसान प्रकृति के सामने किसी तिनके से ज्यादा औकात नहीं रखते हैं। इसलिए दोस्तों जो जीवन मिला है उसे जिंदादिली से जिएं और दूसरों के लिए जिएं। समाज और देश के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करें, क्योंकि यही यादें आपकी रह जाएंगी।
-भीमसिंह मीणा
Saturday, January 17, 2015
सेंसर तेरी 'लीला' अपरंपार
देश में इस समय दाे बड़ी खबर चर्चा में हैं। पहली दिल्ली के चुनाव और आईपीएस किरण बेदी का भाजपा में जाना। इनके साथ 'आप; की शाजिया इल्मी का भाजपा में शामिल होना। लेकिन इससे भी बड़ी खबर हो गई है सेंसर बोर्ड की चेयरपर्सन लीला सेमसन और उनके साथ बोर्ड के अन्य सदस्यों का इस्तीफा। इनके इस्तीफे का भी बड़ा ही अजीब कारण है कि फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड को सर्टिफिकेशन अपीलिएट ट्रिब्युनल ने हरी झंडी दे दी है। जबकि सेंसर बोर्ड कमेटी ने इस पर रोक लगाई थी। इस अचानक इस्तीफे ने लीला सेमसन के ऊपर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। सबसे पहला सवाल कि सेंसर बोर्ड का मुख्य काम फिल्म पर रोक लगाना कतई नहीं होता है, बल्कि फिल्मों की श्रेणी और उन्हें देखने की उम्र तय करना होता है। फिर भी लीला सेमसन ने फिल्म पर न केवल रोक लगाई बल्कि इस्तीफा भी दिया। लेकिन इन्हीं लीला सेमसन को कुछ दिन पहले प्रदर्शित हुई फिल्म 'pk' में कोई आपत्ति नहीं दिखी। भारत के करोड़ों हिन्दुओं ने विरोध किया और मुसलमानों ने भी माना कि फिल्म गलत है, लेकिन लीला सेमसन को यह आपत्तिजनक नहीं लगा। आखिरकार फिल्म का प्रसारण होता है और अब तक यह फिल्म 333 करोड़ रुपए कमा चुकी है। अब कहा जा रहा है कि फिल्म लोगों ने पंसद की, इसलिए वह सही थी और सेंसर बोर्ड का निर्णय भी सही था। ठीक है स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति के नाम पर यह सब भी हो गया और लोगों ने दिल खोलकर इस बात का स्वागत किया। तो फिर राम-रहीम में ऐसा क्या आपत्तिजनक आ गया कि उसे प्रमाण-पत्र नहीं देने पर बन आई। इस फिल्म को भी प्रमाण पत्र दीजिए और होने दीजिए प्रदर्शित। जनता खुद कर देगी इंसाफ कि फिल्म ने उसकी भावनाओं को कितनी ठेस पहुंचाई है।
थोड़ा सा पीछे जाएं तो कई बातें ऐसी हैँ जिनसे लीला सेमसन के ऊपर भी सवाल खड़े होंगे। पीछे के कारणों पर जाएं तो पूरी तस्वीर साफ हो जाती है। दरअसल लीला सेमसन को कांग्रेस ने सेंसर बोर्ड का चेयरमेन बनाया था। इनका कार्यकाल भी समाप्त हो गया है और इन्होंने अपने कार्यकाल को बढ़ाने के लिए जुगत लगाई थी, जो कामयाब नहीं हो सकी। अब जबकि कार्यकाल खत्म हो गया है तो कुछ विवाद खड़े कर दिए और शामिल हो गए राजनीतिक शहीदों की सूची में। लीला सेमसन अप्रैल 2011 से बोर्ड की अध्यक्ष हैं। सवाल यह भी है कि इसके पहले भी कई बार सरकार की तरफ से निर्देश मिलते रहे हैं तो तब क्यों लीला को कुछ दिखाई नहीं दिया। इसके पीछे की एक और कहानी यह है कि राम-रहीम जो डेरा सच्चा सौदा के मुखिया हैं ने भाजपा को हरियाणा चुनाव में सहयोग किया था। इसके बाद राम-रहीम ने फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड यानी MSG बनाई। लीला ने अपनी वफादारी निभाते हुए MSG पर रोक लगा दी और इससे कांग्रेस भी काफी खुश हुई। सीधे-सीधे लीला के नंबर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सामने बढ़ गए हैं। दूसरी बात लीला ने जितने भी आरोप लगाए कि केंद्र सरकार ने MSG के प्रदर्शन के लिए दबाव बनाया, लेकिन उसका कोई भी प्रमाण पेश नहीं कर सकी। अब यह मामला पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है न कि धर्म का विषय रहा।
और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-
Sunday, December 28, 2014
ये शक्ति प्रदर्शन, ये फिजुलखर्ची क्यों ?
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| फोटो - सधन्यवाद, भास्कर डॉट कॉम से |
शायद आप लोगों को याद होगा कि मप्र में इस समय वित्तीय संकट चल रहा है और केंद्र ने भी इस बार कम बजट दिया है। लेकिन यदि अभी किसी शक्ति प्रदर्शन वाले कार्यक्रम की बारी आएगी तो तंग हाथ खुल जाएंगे। भाजपा सुशासन और मितव्यतता की बात करती है और उम्मीद है झारखंड में इसका पालन होगा।
-भीमसिंह मीणा
Sunday, October 19, 2014
ये सिर्फ मोदी की जीत नहीं है, बल्कि वंशावली की भी हार है
मोदी लगातार माहौल को बदल रहे हैं और निरंतर नई घोषणाएं कर रहे हैं। लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि वे अपने द्वारा कहे गए कामों को भी समयावधि में पूरा करेंगे और देश को नई ऊंचाईयों पर ले जाएंगे।
Sunday, September 14, 2014
Saturday, September 6, 2014
Saturday, August 9, 2014
Tuesday, June 3, 2014
Sunday, June 1, 2014
Saturday, May 31, 2014
Thursday, May 1, 2014
Thursday, January 2, 2014
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