Tuesday, April 2, 2024

क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके?

 क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके? अब तक तो यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन खबर दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुई है और दो सीनियर रिपार्टर ने इंवेस्टिगेशन की है। फोटो के साथ बताया कि कैसे और कहां पीटा। इस खबर के बाद कोई शक या सवाल बाकी नहीं रह जाता। ऐसे में अब राज्यमंत्री #Narendra_Shivaji_Patel का थाने में जाकर बेटे को छुड़वाना जायज लगता है, क्योंकि कोई भी पिता अपने बेटे के साथ हुई इस तरह की मारपीट होते देख तड़प ही जाएगा। वे भी खास से एकदम आम बन ही गए। खैर…
असल सवाल अब भी बाकी है? आखिर पुलिस में इतना साहस आया कैसे? आमतौर पर मोहल्ले के नेता को भी कुर्सी देकर आवभगत करने वाली पुलिस ने ऐसे ही तो मंत्रीपुत्र की “सुधार सिंह” (उस बेल्ट का नाम, जिससे मंत्रीपुत्र को पीटा गया) से मिजाजपुर्सी नहीं की होगी। जवाब जानने के लिए अपने कुछ अय्यारों से बात की तो उन्होंने इशारों में बताया कि पुलिस तब पूरी तरह बेकाबू हो जाती है, जब उनकी वर्दी पर कोई सवाल उठाता है। वर्दी उतरवाने की धमकी देता है। वर्दी पर उठी ऊंगलियों को पुलिसकर्मी बर्दाश्त नहीं करते हैं और फिर पुलिस वाले भी इस मूड में आ जाते हैं कि जाओ करवा देना सस्पेंड। सच क्या है, यह तो पुलिस जांच के बाद पता चलेगा। अभी कई सारे तथ्य आना बाकी है।
इस मामले के बाद सुनने में यह आया है कि पार्टी ने सभी मंत्रियों को समझाईश दे दी है कि किसी के भी परिजन की तरफ से इस प्रकार की हरकत होती है तो वह स्वयं जिम्मेदार होगा। वैसे बता दें कि मंत्री पुत्रों के कारनामों की फेहरिस्त लंबी है। फिर चाहे नर्मदा किनारे वाले पूर्व कैबीनेट मंत्री के बेटे हो या फिर वर्तमान कैबीनेट के सीनियर मंत्री के बल्लेबाज पुत्र हो। इन सभी के चर्चे राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त कर चुके हैं।
बीजेपी नेताओं के परिजनों द्वारा की जाने वाली इन हरकतों पर इसलिए भी जोरदार चर्चा होती है कि यह पार्टी अनुशासित और कैडर बैस है। इतनी अनुशासित कि कांग्रेस से आए हु़ड़दंगी नेता भी यहां जमीन पर बैठना सीख गए हैं। इस मामले में वर्तमान सीएम डॉ. मोहन यादव की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने अब तक अपने परिवार को राजनीतिक ग्लैमर से दूर रखा है। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि परिवार और राजनीति को मैं अलग ही रखता हूं। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन क्या वे अपने दर्जन भर नए मंत्रियों में भी इतना ही संयम ला पाएंगे? यदि कर पाए तो बड़ी बात होगी। बहरहाल राज्यमंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल के बेटे के मामाले में राजनीति और गरमाएगी।
- भीम सिंह मीणा, पत्रकार
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Wednesday, April 18, 2018

सिंह के बदले सिंह को ही चुना भाजपा ने

पत्रकार भीम सिंह सीहरा की कलम से...
आखिरकार आज भाजपा ने तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा कर दी। जबलपुर सांसद राकेश सिंह ने आज भाजपा के  नए प्रदेशाध्यक्ष पद की शपथ ली। सिंह की नियुक्ति को लेकर कहा जा रहा है कि यह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पंसद हैं। लेकिन वर्तमान में चल रहे घटनाक्रम को देखकर ऐसा लग रहा है कि नए प्रदेशाध्यक्ष की नियुक्ति केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की पंसद है। यानि सिंह के बदले में सिंह को ही लाया गया है। इसके कई सारे कारण साफ नजर आते हैं। शिवराज भले ही जनता की पहली पसंद हो, लेकिन चुनाव के मामले में अदभुत संगठनात्मक क्षमताओं वाले नरेंद्र सिंह ताेमर का कोई तोड़ पार्टी को नजर नहीं आ रहा है। वजह भी ठोस है। पिछले दो चुनाव में शिवराज और नरेंद्र सिंह ताेमर की जोड़ी ने जिस तरह से शानदार जीत दिलाई वह सबके सामने है। इस बार तोमर प्रदेशाध्यक्ष के लिए इच्छुक नहीं थे तो पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा, वीडी शर्मा, भूपेंद्र सिंह समेत अन्य कई नामों पर विचार किया। मगर मामला जमा नहीं। देर रात राकेश सिंह के नाम पर सहमति बनी या यूं कहें कि पहले से ही यह नाम तय था। इस नाम को तय करने में परदे के पीछे से भूमिका नरेंद्र सिंह की बताई जाती है। प्रदेशाध्यक्ष के साथ चुनाव प्रबंध समिति की घाेषणा कर दी गई और नरेंद्र सिंह तोमर को ही संयोजक बनाया गया। इशारा साफ है कि इस बार भी शिव-नरेंद्र की जोड़ी ही चुनाव लड़वाएगी। दूसरी तरफ मप्र में निकाली जा रही है किसान सम्मान यात्रा के पीछे भी तोमर का ही दिमाग बताया जाता है। किसान सम्मान यात्रा की अगुवाई तोमर के खास और पूर्व विधायक रणवीर सिंह रावत ही कर रहे हैं। रणवीर अभी किसान मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष हैं और तोमर ने ही उन्हें यह जिम्मेदारी दिलवाई थी। ऐसा लगता है कि चुनाव तक यह जोड़ी मिलकर काम करेगी और परिणाम यदि प्रतिकूल रहता है तो प्रदेश में मुखिया बदला जा सकता है।

Wednesday, September 13, 2017

यह विज्ञापन क्या सिखा रहा है।

अभी पिछले *कुछ दिनों से टी वी के सभी चैंनलों पर Axis bank के होम फाइनेंस का विज्ञापन दिखाया जा रहा है।*जिसमे एक कार में माँ बेटा बैठे हुए आपस मे बात कर रहे है, जिसमे माँ बेटे से उसकी शादी के पहले ही अलग मकान लेने कह रही है, बेटा वजह पूछता है तो माँ कहती है कि बहु आएगी तो उसे एडजस्ट करने में दिक्कत होगी, टोका टोकी होगी, इससे अच्छा तुम अभी से नया घर ले लो । और वह आज्ञाकारी बेटा तुरंत माँ की बात मान लेता है । *अब प्रश्न ये है कि यह विज्ञापन क्या संदेश दे रहा है समाज को ? ऐसे विज्ञापनों के द्वारा हमारे भारतीय संस्कृति और मूल्यों पर करारी चोट की जा रही है।* हर माँ बाप का सपना होता है कि बेटा जब बड़ा होगा तब शादी करके बहु को घर मे लाएंगे, बहुरानी का स्वागत करेंगे, समयानुसार जब नाती पोते होंगे तो उनकी खिलखिलाहट से घर गूंजेगा । दादा दादी की पदवी मिलेगी । पर *इस विज्ञापन के धूर्त संदेश से युवाओं को माँ बाप से दूर करने की शिक्षा दी जा रही है । लानत है ऐसे बैंक और उन एडवरटाइजिंग एजेंसी पर जो हमारे पारिवारिक संस्कारों और मूल्यों पर चोट कर रहे है । इन्हें तुरंत बंद करना चाहिए।*,,,आप सभी इसका विरोध करे । और अधिक से अधिक share कर जनजागृति लाए।

Wednesday, June 7, 2017

पुत्र के राज में पितातुल्य किसानों पर गोलीचालन

सुना था सत्ता के लिए मुगल सम्राट ने अपनों का कत्ल कर दिया था। लेकिन  कलयुग में किसान के बेटे ने अपने पितातुल्य किसानों पर ही गोली चलवा दी। इसके बाद सरकार के गृहमंत्री द्वारा पुलिस गोलीचालन से मुकरना, आंदोलनकारी किसानों को विराेधियों द्वारा भड़काना तथा उन्हें असामाजिक तत्व करार देना आश्चर्यजनक है। फिर सरकार के मुखिया द्वारा मृत किसानों के परिजनों को एक करोड़ रुपए तथा घायलों को पांच लाख रुपए की सहायता देना भी अचंभित करता है। यह राज्य सरकार की अक्षमता, अदूरदर्शिता, अज्ञानता और अति भयभीत होने का प्रमाण है। जब आंदोलनकारी किसान नहीं थे तो कौन थे? गोली पुलिस ने नहीं तो किसने चलाई? अगर पुलिस की गोली से किसान नहीं मरे तो फिर इतना मुआवजा देने का क्या औचित्य है? सरकार के मुखिया और उसके गृहमंत्री द्वारा अटपटे बयान देने से जाहिर है कि शिवराज सरकार कितनी अपरिपक्व है। सरकार की असंवेदनशीलता का इससे बड़ा नमूना क्या होगा कि आंदोलनकारियों से सरकार के किसी भी नुमांइदे ने बात करने की कोशिश नहीं की। आंदोलन को विफल करने के लिए आरएसएस से जुड़े भारतीय किसान संघ से आंदोलन स्थगित कराने का बयान दिलवाया। जबकि संघ का इस आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। एक तरह से मंदसौर की घटना ने एक बार फिर पुलिस के खुफियातंत्र की कलई खोलकर रख दी है। प्रदेश के मालवांचल में पिछले चार-पांच दिन में असंतोष धधक रहा था, लेकिन शिवराज सरकार के चारण-भाट उन्हें हकीकत बताने की बजाए सख्ती से पेश आने, विरोधियों पर वार करने तथा किसान आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने की जानकारी देते रहे। जब यह ज्वालामुखी फट गया तब एक दशक से सत्ता के सिंहासन पर काबिज शख्स की हकीकत भी सामने आ गई कि उनका जनता से कितना संवाद है। खुद को किसान और किसान पुत्र कहलाने वाला कर्णधार अपने भाई-बंधुओं से ही कितना दूर है, यह घटना इसका प्रमाण है। किसान के घर में क्या खिचड़ी पक रही है। इस बात से ही उसका बेटा अनभिज्ञ रहा तो इसमें दोष किसका है। बेटे का या भाई-बंधुओं का। एक किसान बेटे के राज में उसके अपने ही मार-गिराए जाए तो क्या जाए? इस धरना से एक बार मुगल तानाशाह औरंगजेब के कारनामों की याद ताजा हो गई, जिसने अपने बड़े भाई का कत्ल कर पिता को आजीवन बंदी बनाकर रखा था। 
वैसे तो दोनों में कोई समानता नहीं है, क्योंकि आैरंगजेब बहुत क्रूर शासक था और शिवराज बहुत ही कमजोर शासक हैं।
- भीम सिंह मीणा, पत्रकार

Thursday, July 14, 2016

अब इतना सन्नाटा क्यों पसरा है भाई

आज की बड़ी खबर है कि जिस दादरी कांड के लिए अखलाक के परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। ऐसा फैसला ग्रेटर नोएडा की एक अदालत ने दिया है। बिसाीडा गांव के लोगों ने ही यह केस लगाया था, जिसमें फैसला भी आ गया है। गौरतलब है कि पूरी जांच के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि अखलाक के घर के भीतर फ्रिज जो मीट पाया गया था वह गोवंश का ही था। लेकिन इसके पहले रिपोर्ट के ऊपर बिना चर्चा किए और बिना किसी प्रमाण के अखलाक को बेकसूर ठहराकर कई लोगाें को जेल में बंद कर दिया गया। इससे भी ज्यादा हंगामा बरपाया गया कि अखलाक बेकसूर था और भारत में असहिष्णुता फैल रही है। यहां तक कि कुछ लोगों ने तो असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर भारत में स्वयं को असुरक्षित करार दे दिया। तो कुछ की पत्नियाें ने देश छोड़ने की बात कर डाली। लेकिन अब यही लोग खामोशी की चादर ओढ़कर बैठ गए हैं।

Sunday, May 22, 2016

भाजपा का सपना कांग्रेस कर रही है पूरा

आखिरकार पांच राज्यों के चुनाव संपन्न हो गए और परिणाम सामने है। लेकिन इस पूरे चुनाव में परिणाम के बाद जितनी चर्चा अम्मा (जयललिता) और दीदी (ममता बनर्जी) की जीत की नहीं हुई, उतनी कांग्रेस मुक्त भारत की हुई। हो भी क्यों न, आखिर देश की सबसे बड़ी पार्टी इस समय देश की सबसे छोटी पार्टी बनने की कगार पर पहुंच गई है। एक समाचार पत्र ने आंकलन किया है कि कांग्रेस अब देश के बीस प्रतिशत हिस्से में ही बची है। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि कांग्रेस मुक्त भारत का सपना पूरा करने में भाजपा की मदद जनता कर रही है या फिर कांग्रेस स्वयं अपने कर्मो से इस हाल में पहुंच गई है। बहुत सारी बातें हो रही है चुनाव जीतने व हारने को लेकर और मैं इतना अनुभवी भी नहीं कि कोई ठोस कारण बता पाऊं। लेकिन एक बात जो मुझे समझ में आई कि कांग्रेस का हाल कुछ-कुछ नोकिया जैसा हो गया। एक समय नोकिया बाजार में एकछत्र राज्य करता था, लेकिन समय के साथ बदलाव नहीं किया यानि नए सिस्टम एंड्राइड को नहीं अपनाया तो आज बाजार में कई पायदान नीचे है। जबकि भाजपा सेमसंग की भांति नए फंडे अपनाकर आगे की तरफ बढ़ रही है। कमाल की बात तो यह है कि जिन राहुल गांधी को पूरी दुनिया में पप्पू की उपमा से नवाजा जाने लगा है, उन्हें सोनिया आंटी देश का प्रधानमंत्री बनाने का ख्वाब संजोए हुए है। खैर सपने कोई भी देख सकता है। लेकिन सपनों को हकीकत समझ लेने में दिक्कत हो जाती है। बहरहाल देश में नया खुमार छाया हुआ है और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का सपना पूरा हो रहा है।

Wednesday, May 18, 2016

भाजपा का सपना जीतना नहीं, भारत को कांग्रेस मुक्त करना है

अब जबकि देश के प्रमुख पांच राज्य पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, केरल और पुडचेरी में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के गुरूवार की सुबह से परिणाम आना शुरू हो जाएगा।सभी पार्टियों की धड़कन बढ़ गई होगी। खासतौर से कांग्रेस की, क्योंकि इनका काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। परिणाम को लेकर चिंतित तो भाजपा भी है, लेकिन उतनी नहीं। कारण साफ है कि भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और जितनी भी सीटें, जिस भी राज्य में मिलेंगी इनको फायदा ही होना है। सबसे बड़ी बात की इस बहाने भाजपा अपने संगठन को प्रत्येक राज्य में मजबूत कर रही है। कार्यकर्ता खड़े हो रहे हैं और अब काम दिखाई देने लगा है। दरअसल इन पांच राज्यों में जिस प्रकार से भाजपा ने कैम्पेन किया, वह मिशन 2019 की तैयारी के लिए था। बिहार के बाद भाजपा अपने कैम्पेन को लेकर बेहद सतर्क है और डीएनए टेस्ट जैसा एक भी जुमला इन पांच राज्यों के प्रचार में सुनने को नहीं मिला। माना जा रहा है कि यह चुनाव भेल ही क्षेत्रीय हुए हो, लेकिन इस बार इनको राष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें ममता बनर्जी, जयललिता, तरुण गोगोई, एम करुणानिधि, ओमन चांडी, वीएस अच्युतानंदन, बुद्धदेव भट्टाचार्य, सर्बानंद सोनोवाल और एन रंगासामी जैसे बड़े नेताओं की किस्मत का फैसला जो होने वाला है। सर्वे में ममता बनर्जी को सुरक्षित बताया जा रहा है, लेकिन जब तक मतपेटी के भीतर से वोटर्स का फैसला बाहर नहीं आ जाता, कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भले चैनल  सर्वे केरल, असम और तमिलनाडू में सत्ता परिवर्तन के संकेत दे रहे हो, लेकिन चर्चा हो रही है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व को कितना बचा पाएगी। दरअसल भाजपा का बड़ा ही स्पष्ट एजेंडा है कि वो भारत को कांग्रेस मुक्त करना चाहती है। यही कारण है कि बिहार में हारने के बाद भाजपा नेताओं को इतना अफसोस नहीं हुआ, जितना उत्तराखंड में कांग्रेस की वापसी से हुआ। बहरहाल इस बार इन गैर हिन्दी राज्यों के चुनाव परिणाम में हिन्दी राज्यों के लोगों की खासी दिलचस्पी है।

Friday, December 25, 2015

मोदी का मास्टर स्ट्रोक

बस कयास लग रहे हैं, असली मकसद समझ से बाहर है
आज मोदी ने जबरदस्त मास्टर स्ट्रोक खेला। उन्होंने अचानक पाकिस्तान जाकर और किसी खास मित्र की तरह नवाज शरीफ से मुलाकात लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी पाकिस्तान घूमकर भी आ गए और कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। परंपरा अनुसार कांग्रेस ने इस यात्रा का विरोध यह कहकर कर दिया कि पहले से मीटिंग फिक्स थी। लेकिन उनकी तरफ से यह बात बिना किसी प्रमाणिकता के कहीं जाने का एक ही मतलब है कि जैसे कोई खिसयानी बिल्ली खंबा नोंच रही है। कांग्रेस के एक और प्रवक्ता ने तो यह तक कह दिया कि किसी उद्योगपति ने यह मीटिंग फिक्स कराई, लेकिन उस उद्योगपति का नाम वे नहीं बता पाए। खैर हम बात करें यात्रा कि इसके मायने किसी को भी समझ में नहीं आए हैं। जानकार, बुद्धिजीवी, मीडिया, विरोधी और अन्य केवल कयास लगा रहे हैं कि आखिर सब अचानक कैसे हो गया? पाकिस्तान में मोदी के कदम पड़ते ही चर्चा, चिलपों शुरू हो गया। इस दौरान देखा कि कष्मीर के नेता, आर्मी के विषेषज्ञ इसे अच्छी पहल बता रहे हैं, लेकिन कुछ और भी संदेष हैं जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया।
पहला तो यह कि मोदी पाकिस्तान यात्रा को बहुत ज्यादा तूल नहीं देना चाहते थे और उनके दिमाग में 25 दिसम्बर की तारीख पहले से तय थी। क्योंकि यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है कि आज अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जिन्ना और नवाज शरीफ का भी जन्मदिन है। वहीं नवाज शरीफ की नवाजी मेहरूनिसां की शादी है। निष्चित रूप से योजना पहले ही मोदी के दिमाग में जन्म ले चुकी थी। बस वे इस यात्रा पर कोई बवाल नहीं चाहते थे। यदि घोषित करके पाकिस्तान यात्रा की जाती तो विरोधियों के साथ षिवसेना व पार्टी के अंदर ही इस बात का विरोध शुरू हो जाता। अब चूंकि यात्रा हो ही गई है तो सिर्फ विलाप करने या खुषियां मनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। एक और बात जो मोदी ने सबको समझाई है कि वे पाकिस्तान को बहुत बड़ा नहीं समझते हैं और जैसे देष में भ्रमण करते हैं वैसे ही उनके लिए पाकिस्तान है। यानि वे जो कहते थे कि भारत के लिए पाकिस्तान छोटी समस्या यह है तो यह बात मोदी के काम में नजर भी आ रही है। वे चहल कदमी करते हुए गए और फिर भारत आ गए। इस यात्रा के बाद परिणाम क्या आएंगे, ये तो आना वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल मोदी का कद बढ़ा है और नवाज अपने बचे-खुचे बाल नोंचते हुए सोच रहे होंगे कि वे इसका क्या जवाब दें। क्योंकि मोदी तो शादी के बहाने आ गए, लेकिन नवाज तो ऐसा भी नहीं कर पाएंगे।
कहीं जेटली को बचाने के लिए तो नहीं उठाया कदम!
इस यात्रा के कई सारे मायने हैं और एक मायना यह भी लगता है कि इस पूरी यात्रा से मीडिया व देष का पूरा ध्यान बंट गया है। जबकि कल तक डीडीसीए घोटाले के बहाने लगातार जेटली पर निषाना साधा जा रहा था। विरोधी भी मजबूरन सब काम छोड़कर मोदी की पाकिस्तान यात्रा पर राग अलापने लगे हैं। मोदी ने अपने एक कदम से हवा का रूख बदल दिया है और संभवतः अगले एक-दो दिन में वे समस्या को ही खत्म कर दें। इस बीच केजरीवाल ने डीडीसीए के लिए आयोग बनाने की नाकाम कोषिष भी कर डाली।

Thursday, October 22, 2015

मध्यप्रदेश के शक्ति पीठ

जय माता दी
इस नवरात्रि 'भारत आज' में आपके लिए मैं लेकर आया हूं मप्र में स्थित शक्ति पीठ और प्रसिद्ध देवी मंदिरों की जानकारी। जी हां देश के इस ह्दय प्रदेश में ढेरों देवी मंदिर और शक्ति पीठ हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जिनका नाम आते ही सिर श्रद्धा से झुक जाता है।

-मप्र की आस्था का केंद्र है सलकनपुर
भोपाल से 78 किलोमीटर दूर स्थित सलकनपुर एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन यहां मप्र के कोने-कोने से भक्त आते हैं, क्योंकि यहां माँ विजयासन का मंदिर स्थापित है। हरी-भरी वादियों और ऊंचे पर्वत पर विराजमान मां विंध्यावासिनी के दर्शन करने के लिए नवरात्रि के अलावा भी पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन क्वार और वैशाख के नवरात्रों में यहां पूरे नौ दिन मेला लगता है। जनता को कोई परेशानी नहीं हो इसके लिए मंदिर प्रबंधन द्वारा उच्चकोटि की व्यवस्थाएं की गई हैं। अब तो मंदिर के पास में एसी रूम और हाल उपलब्ध है, जिनकी बुकिंग ऑनलाइन की जाती है। वहीं मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते तैयार किए जा चुके हैं। इनमें पहला रास्ता लगभग 1000 सीढ़ियां का है, जहां से पैदल यात्री जाते हैं। दूसरे रास्ते से वाहन सीधे पहाड़ी पर पहुुंचते हैं और तीसरा रास्ता उड़नखटोला है जो रोपवे की मदद से मंदिर तक पहुंचाता है। सलकनपुर में विराजी सिद्धेश्वरी मां विजयासन की ये स्वयंभू प्रतिमा माता पार्वती की है जो वात्सल्य भाव से अपनी गोद में भगवान गणेश को लिए हुए बैठी हैं इसी मंदिर में महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवान भैरव भी विराजमान हैं। पुराणों के अनुसार देवी विजयासन माता पार्वती का ही अवतार हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी। देवी विजयासन को कई भक्त कुल देवी के रूप में पूजते हैं। मां जहां एक तरफ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे जीवनसाथी का आशीर्वाद देती हैं तो वहीं संतान का वरदान देकर भक्तों की सूनी गोद भर देती हैं।
एक कथा यह भी है
सलकनपुर देवी धाम के महंत प्रभुदयाल शर्मा ने बताया कि जिस स्थान पर रक्त बीज नामक राक्षस का वध करने के पश्चात मां दुर्गा जिस आसन पर आरूढ हुई वही सिद्ध पीठ आज मां विजयासन के नाम से जाना जाता है। यूं तो मां विजयासन के कई प्रमाण है पर इनमे से बंजारों की कथा बहुत लोकप्रिय है। प्राचीन काल में बंजारों का समुह यहा विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करते थे एवं उनका जीवन-यापन पशु व्यवसाय करके बीतता था। बंजारांे जिन मवेशियों चराने थे उन्हीं में से कुछ पशु अदृष्य हो गए। करीब एक सप्ताह तक खोजने के बाद जब हताश हो गए तो बंजारो के ढेरे पर बंजारों को एक कन्या जिसने अपना नाम विन्ध्यवासिनी बताया ने दर्शन दिए और कहा दादा कि आप क्या खोज रहे है? बंजोरों ने अपने खोए हुए पशुओं के बारें में बताया तो विंध्यावासिनी ने कहा कि क्या आपने माता की पूजा अर्चना की? तब बंजारों ने कहा की हमें माता का स्थान पता नही है तो कन्या ने वहां एक पत्थर फेंका और उस पत्थर की दिशा में देखने पर बंजारों को मां विन्ध्यवासिनी यानी मां विजयासन विराजमान दिखाई दी। आज जिस मूर्ति के दर्शन करते हैं उसके बारें में किवदंती है कि वह तब बंजारों ने स्थापित की थी। बंजारों को देवी के दर्शन के बाद अपने पशु भी मिल गए। तभी से आज तक बंजारे वैशाख, ज्यैष्ठ, चैत्र, कुंआर माह मे नवरात्री पर्व पर लाखों की संख्या मे यहां मत्था टेकने जरूर आते हैं।

-सूनी गोद को भर देती है हरसिद्धी माता
राजधानी से 35 किमी दूर स्थित हरसिद्धी माता मंदिर में इन दिनों हजारों भक्तों का तांता लगा हुआ है। भोपाल से बैरसिया जाने वाली रोड से चार किमी अंदर स्थित माता के इस मंदिर को तरावली वाली माता के मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। नवरात्रि शुरू होते ही दूर-दूर से भक्तों के आने का सिलसिला यहां शुरू हो जाता है और आखिरी तक एक लाख से भी ज्यादा लोग यहां जुट जाते हैं। प्रतिदिन भंडारे आयोजित किए जाते हैं और युवक नौ दिन तक यहां सेवा करते हैं। मान्यता है कि जिन माताओं की कोख सूनी रहती है वे जब यहां आकर मान्यता करती हैं तो संतान की प्राप्ति जरूर होती है। पूरा मंदिर परिसर 51 एकड़ में फैला हुआ है और ढाई लाख स्क्वायर फीट में केवल माता का मंदिर बना हुआ है।
जहां तारे अस्त हुए वहीं बना गया तरावली वाली माता का मंदिर
किवदंती है कि 2030 साल पहले काशी नरेश गुजरात की पावागढ़ माता के दर्शन करने गए और वहीं से माता मां दुर्गा की एक मूर्ति लेकर आए। काशी नरेश ने काशी में मां की स्थापना की और सेवा करने लगे। कहा जाता है कि माता प्रसन्न होकर प्रतिदिन काशी नरेश को सवा मन सोना देती थी। काशी नरेश इस सोने को जनता में बांट दिया करते। यह चर्चा उज्जैन तक फैल गई और यहां की जनता भी काशी के लिए पलायन करने लगी। तब उज्जैन में विक्रमादित्य का राज्य था। इस प्रकार जनता के पलायन करने से चिंतित विक्रमादित्य बेताल के साथ काशी पहुंचे। वहां बेताल की मदद से काशी नरेश काे गहरी निंद्रा में भेजकर स्वयं मां दुर्गा की पूजा करने लगे। माता ने प्रसन्न होकर उन्हें भी सवा मन सोना दिया, जिसे विक्रमादित्य ने काशी नरेश को लौटाने की पेशकश की। काशी नरेश ने विक्रमादित्य को पहचान लिया और कहा कि क्या चाहते हो? तब विक्रमादित्य ने मां को अपने साथ ले जाने की मांग की। काशी नरेश नहीं माने तो विक्रमादित्य ने 12 वर्ष तक काशी में रहकर तपस्या की और मां दुर्गा के प्रसन्न होने पर दो वरदान मांगे। पहला उनका वह अस्त्र जिससे वह मृत व्यक्ति को फिर से जीवित कर देती थी और दूसरा उज्जैन चलने का। तब माता ने कहा कि वे साथ चलेंगी, लेकिन जहां तारे छिप जाएंगे वहीं रुक जाएंगी। विक्रमादित्य ने यह बात मान ली, क्योंकि उनके साथ चमत्कारी बेताल जो था। लेकिन माता की इच्छा कुछ और थी और उज्जैन पहुंचने के पहले तार अस्त हो गए। तार अस्त होने के कारण उक्त स्थान का नाम तरावली पड़ा। माता इसी स्थान पर रुक गई तो विक्रमादित्य ने फिर उज्जैन चलने जिद की। लेकिन माता नहीं मानी। तब विक्रमादित्य ने दोबारा 12 वर्ष तक तपस्या की और अपनी बलि मां को चढ़ा दी, लेकिन मां ने विक्रमादित्य को फिर जीवित कर दिया। ऐसा तीन बार हुआ, लेकिन विक्रमादित्य नहीं माने तब चौथी बार मां ने अपनी बलि चढ़ाकर सिर विक्रमादित्य को दे दिया और कहा कि मेरे सिर को उज्जैन में स्थापित करो। अब एक ही मां के तीन रूप यानी चरण काशी में अन्नपूर्णा के रूप में, धड़ तरावली में और सिर उज्जैन में हरसिद्धी माता के रूप में पूजे जाते हैं।


भारत सरकार का वस्त्र मंत्रालय कर रहा है कारीगरों के साथ धोखा

कारीगरों को उनका सामान बेचने का अवसर देने वाले हैंडीक्राफ्ट मेले फर्जी लोगों के अड्‌डे बनकर रह गए हैं। ताजा मामला है गौहर महल में चल रहे गांधी शिल्प बाजार का, जहां फर्जी आईडी कार्ड पर दुकानें आवंटित की गई और अफसर मौजूद होकर भी मौन साधे हैं।
भीम सिंह मीणा
गौहर महल में गांधी शिल्प बाजार मेला 16 अक्टूबर से प्रारंभ हुआ है, जो कि २५ अक्टूबर तक चलेगा। यह मेला मप्र हस्तशिल्प विकास निगम और भारत सरकार के डवलपमेंट कमिश्नर (प्लानिंंग)ऑफ हैंडीक्रॉफट यानी डीसीएच द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है। लेकिन दुकानें आवंटित करने का अधिकार डीसीएच के अफसरों को ही है। डीबी स्टार को मंगलवार की शाम सूचना मिली कि यहां की दुकान नंबर 94 जिस व्यक्ति के नाम से अावंटित हुई है उसका आई कार्ड नकली है। तत्काल मौके पर पहुंचकर देखा और लोगों से बात की तो सही में एक ही नाम के दो आदमी सामने आए। जिस नाम के कार्ड को लेकर हो-हल्ला हुआ वह शुजा अब्बास आब्दी के नाम से डीसीएच ने ही वर्ष 2009 में जारी किया था। दरअसल जब डीबी स्टार मौके पर पहुुंचा तो तब तक काफी हंगामा हो चुका था, क्योंकि असली शुजा अब्बास आब्दी सामने आ गया और उसने नकली शुजा अब्बास आब्दी के कार्ड को अपने पास ले लिया। डीबी स्टार ने वे दोनों कार्ड देखे और पाया कि एक ही डिटेल वाले कार्ड पर फोटो अलग-अलग लगे हुए हैं। इसमें जो व्यक्ति असली शुजा अब्बास आब्दी होने का दावा कर रहा था उनसे बात करने पर एक अलग कहानी सामने निकलकर आई। बातचीत से पता चला कि उक्त कार्ड भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा प्रत्येक कारीगर को जारी किया जाता था। इसी कार्ड से शिल्प या हैंडीक्रॉफ्ट मेलों में दुकानें आवंटित की जाती हैं। उक्त कार्ड छह साल पहले जारी किया, लेकिन इसके असली मालिक यानी को कुछ समय पहले मिला। आज जब असली शुजा ने स्वयं के नाम से दुकान नंबर 94 में एक व्यक्ति को बैठे पाया तो आपत्ति ली और मौके पर मौजूद अफसरों को भी बताया। लेकिन डीसीएच के असिस्टेंट डायरेक्टर संतोष कुमार ने इस मामले में कोई एक्शन नहीं लिया और न ही अन्य दुकानदारों से उनके आई कार्ड मांगकर जांच की। जब डीबी स्टार ने बात की तो गोलमोल जवाब देते रहे। इस पूरे मामले की जानकारी डवलपमेंट कमिश्नर प्लानिंग ऑफिस में दी तो तत्काल कार्यवाही करने का जवाब मिला।
देखते ही देखते बदल गया आदमी
हैंडीक्रॉफ्ट मेलों में किस कदर धांधली और मनमानी की जा रही है यह मामला उसकी एक बानगी है। मंगलवार रात में जब नकली शुजा अब्बासी पकड़ा गया तो तत्काल 94 नंबर की दुकान में अनिल कुमार लोधी नामक आदमी आकर बैठ गया। जबकि थोड़ी देर पहले तक वहां नकली शुजा अब्बासी बैठा हुआ था। इस बात को साबित करती है वह रिकॉर्डिंग जिसमें नकली शुजा अब्बासी स्वीकार कर रहा है कि वह नकली है। डीबी स्टार ने उस नकली शुजा अब्बासी को मेले में ही ढूंढ निकाला और बात की तो उसने किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। हैरत की बात तो यह है कि मौके पर मौजूद डवलपमेंट कमिश्नर के असिस्टेंट डायरेक्टर संतोष कुमार जानते-बूझते भी कार्यवाही करने को तैयार नहीं थे।
असली खेल यह है
इस बार गौहर महल में आयोजित शिल्प बाजार मेले में गौहर महल के अलावा पीछे पड़े मैदान में भी 100 दुकानें आवंटित की गई हैं। इन दुकानों को आवंटित करने के पहले सादा कागज पर एक आवेदन लिया जाता है। 16 अक्टूबर 2015 को भी जब दुकानें आवंटित हो रही थी तो डीबी स्टार टीम मौके पर थी। वहां देखा कि एक-एक करके लोगों को भीतर बुलाया जाता और दुकान दे दी जाती। आरोप है कि एक दुकान के लिए मोटा कमीशन अफसरों के दलालों द्वारा वसूला जाता है। शायद यही कारण है कि पूरे मेले में कौन सी दुकान किस व्यक्ति को आवंटित हुई है इसकी सूची तक नहीं लगाई जाती। चूंकि आधे से ज्यादा दुकानदार जुगाड़ से दुकानें लगाते हैं तो वे सब देखकर भी खामोश रहते हैं और जो असली कारीगर शिकायत भी करते हैं तो उस पर कार्यवाही नहीं की जाती है।

Sunday, October 11, 2015

भोपाल बन रहा है युवाओं का शहर

राजधानी भोपाल के बारें में हमेशा कहा जाता रहा है कि यह बाबुओं का शहर है और चाल बेहद सुस्त है। लेकिन बीते एक साल में यहां आकर पढ़ाई और नौकरी करने वाले युवाओं ने इस जुमले को झुठलाना शुरू कर दिया है। अब भोपाल के नौजवान सूरज उगने के साथ सड़कों पर नजर आते हैं तो देर रात तक फूड जाने पर इनका जमावड़ा रहता है। 
 
भोपाल का रहने वाला उत्कर्ष एमपी नगर जोन दो की एक कोचिंग से आईआईटी की तैयारी कर रहा है। पहले उसके दोस्त केवल भोपाल के निवासी हुआ करते थे, लेकिन अब प्रदेश के अन्य राज्यों से आने वाले युवा उसकी मित्रमंडली में शामिल हैं। उत्कर्ष ही नहीं, बल्कि शहर में अब प्रत्येक विद्यार्थी का मित्रमंडल अंतर्राज्यीय हो गया है। दरअसल यह बदलाव बीते एक-दो साल से हाे रहा था और इस समय अपने चरम पर है। यह सामने तब आया जब नगर निगम भोपाल द्वारा शहर के हॉस्टल की संख्या जांची गई तो पता चला कि अचानक शहर के कुछ इलाके पूरी तरह से स्टूडेंट स्ट्रीट के रूप में पहचाने जाने लगे हैं। निगम अफसरों को लगातार शिकायत मिल रही थी कि रहवासी क्षेत्रों में लोगों ने अपने घर स्टूडेंटस को दे दिए हैं। निगम ने एक टीम बनाकर पूरे भोपाल की इंटरनल रिपोर्ट जुटाई तो एक बड़ा आंकड़ा सामने आया। हॉस्टलों की संख्या बढ़ने के अलावा खानपान, फैशन और गैजेट्स आदि में भी बदलाव आया है। आलम यह है कि देश-विदेश के बड़े ब्रांड, जिन्हें खरीदने के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था वे भोपाल में आसानी से उपलब्ध हो रहे हैं। डीबी स्टार ने इस दावे की जांच करने के लिए शहर के उन लोगों से बात की जो भोपाल में खानपान, गैजेट्स, हॉस्टल और कपड़ों के व्यवसाय से जुड़े हैं। इसकी भी पड़ताल की कि आखिर इतनी संख्या संख्या में युवा भोपाल क्यों आ रहे हैं। इस पड़ताल में यह भी खुलासा हुआ कि युवा बाहर से तो आ ही रहे हैं, लेकिन शहर के युवाओं ने दूसरे शहरों की तरफ जाने का मोह छोड़ दिया।
राष्ट्रीय संस्थान और कोचिंग ने बढ़ाई संख्या
युवाओं की संख्या में बढ़ोतरी होन की दो मुख्य वजह हैं। एक तो यहां देश की नामी-गिरामी कोचिंग ने अपने सेंटर शुरू दिए अौर कुछ बड़ी कोचिंग ने वीडियो या ऑनलाइन सेवाएं देना प्रारंभ कर दी है। इससे कोटा व दूसरे शहरों में जाकर कोचिंग करने वाले स्टूडेंट अब भोपाल में ही रहकर कॉम्पटिशन एक्जाम की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी बड़ी वजह है शहर के भीतर राष्ट्रीय संस्थानों की शुरूआत। इनमें नीलबड़ के पास नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी, एमपी नगर में माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, माता मंदिर के पास मैनिट (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी), कोलार रोड पर निफ्ट (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फेशन टेक्नोलॉजी), भदभदा के पास इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट, गोविंदपुरा में डिजास्टर मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, श्यामला हिल्स पर एनआईटीटीआर, नवीबाग स्थित सिऐक (सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग) और जेके रोड स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक इंजीनियरिंग आदि प्रमुख हैं। इन सभी में करीब दो हजार से ज्यादा सीटें हैं, जिन पर बाहर के छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनके अलावा तीन बड़े मेडिकल कॉलेज और करीब पांच डेंटल कॉलेज भी यहां हैं। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कॉलेज की तो भरमार है।
फूड जोन हुए विकसित
युवाओं की आमद का एक बड़ा प्रमाण है भोपाल के लगभग सभी हिस्सों में बड़े स्तर पर फूड जोन का विकसित होना। बड़ी होटल्स और रेस्तरां ने तो परिवार के साथ स्टूडेंट के लिए एक अलग जगह बनाई है। लेकिन सड़क किनारे बड़ी संख्या जंक फुड की खुली दुकानें इस तथ्य को और मजबूत करती है। नगर निगम की ही एक और रिपोर्ट में लिखा है कि एमपी नगर के दोनों जोन, दो नंबर से बारह नंबर तक के सभी बाजार, न्यू मार्केट, जेके रोड आदि इलाकों में करीब 600 गुमटियां केवल खानपान की चल रही हैं।
यूथ के प्रेशर में पहले दिन मिलते हैं गैजेट्स
दो साल पहले तक शहर में एक ब्रांडेड कार्डलैस के लिए भी आठ से दस दिन तक इंतजार करना पड़ता था। लेकिन यूथ का आगमन से अब चाहे आई फोन हो या फिर कोई अन्य गैजेट्स लांचिंग के तत्काल बाद पूरे देश के साथ भोपाल में आसानी से मिल जाते हैं। दस नंबर स्थित आशा कलेक्शन और शहर के सभी मॉल्स में युवाओं को आसानी से गैजेट्स की दुकानों पर खरीदारी करते देखा जा सकता है। आलम यह है कि पूरे शहर में 400 से 500 मोबाइल प्रतिदिन बेचे जाते हैं और इन्हें खरीदने वाले 60 प्रतिशत युवा ही हैं।

Sunday, April 26, 2015

भूकम्प के वो 30 सेकिंड मेरा पूरा वजूद हिला गए

नेपाल से भोपाल तक भूकंप और मैं भी हुआ प्रभावित
प्रतिदिन की तरह मैं सुबह 10.30 बजे तक ऑफिस (दैनिक भास्कर) पहुंचा और अपने काम में जुट गया। तब तक हमारे ऑफिस का टीवी बंद था और मैं दुनिया में हो रही हलचल से बेखबर अपनी न्यूज स्टोरी को पूरी करने में जुटा हुआ था। उस समय तक एक-दो लोग ही ऑफिस में बैठे थे, लेकिन 11.30 बजे तक सभी आ गए। मैं अपने काम में जुटा था और मेरी बगल में Sr फोटो जर्नलिस्ट सतीश टेवरे, उनके बगल में साथी पत्रकार राधेश्याम दांगी और आखिर में सब एडिटर शमी कुरैशी बैठे हुए थे। अचानक ऐसा लगा कि मेरी टेबिल हिल रही है और बहुत जोर-जोर से। पहले तो मैंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब ज्यादा हिलने लगी तो साथी टेवरे जी को घूरकर देखा तो पता चला कि वे मुझे घूर रहे हैं। मैं सवाल करता इसके पहले ही कुरैशी जी ने राधेश्याम से पूछ लिया कि टेबिल क्यों हिला रहे हो। राधे बोले कि मैं नहीं हिला रहा हूं तो सब एक-दूसरे का मूंह देखने लगे कि आखिर टेबिल हिला कौन रहा है। इतने में एक शोर उठा और Sr Artist श्री गौतम चक्रवर्ती व उनके साथी भागते हुए आए और बोले की भागो भूकंप आया है। कुछ पल तक समझ में ही नहीं आया कि हो क्या रहा है और मैं अपनी जगह ही बैठा रहा। तब तक कंपनी जारी था और पूरा कम्प्युटर व टेबिल हिल रही थी। जब समझ में आया तो मैं भी बाकी लोगों के साथ उठकर भागा और हम सब दैनिक भास्कर के परिसर में एकत्रित हो गए। नीचे खड़े लोग हमें हैरानी से देख रहे थे कि ये भागकर क्यों आ रहे हैं। दरअसल हम दैनिक भास्कर के चौथे माले पर बैठते हैं और वहां कंपनी हो रहा था। लेकिन नीचे और पहले माले पर बैठे लोगों को इस बात का अहसास नहीं था कि क्या हो रहा है? इतनी देर में सामने वाली बिल्डिंग से भी लोग निकलकर आने लगे। हम संभल भी नहीं पाए थे कि एक और शोर सुनाई दिया और ये वे लोग थे जो अपनी जान बचाकर बिल्डिंग से उतर रहे थे। सभी बदहवास और बेखकर एक-दूसरे को अपने अनुभव सुना रहे थे। पूरा दैनिक भास्कर स्टॉफ परिसर में आकर खड़ा हो गया था। इतने याद आया कि भूकंप तो पूरे शहर में और मेरा घर भी इसी शहर में है। तत्काल घर कॉल करके श्रीमती जी से बात की तो उन्होंने बताया कि वहां भी हलचल हुई थी। मां और बहन का हालचाल जाना। इतने में पूरे शहर से कॉल आना शुरू हो गए कि यहां भी भूकंप आया है। करीब 10 से 15 मिनट तक हम नीचे ही तेज धूप में खड़े रहे और फिर ऊपर अपने ऑफिस में आए। तब तक हमारे एक साथी ने टीवी चालू कर दी थी और हम टीवी पर देख रहे थे कि किस तरह नेपाल भूकंप का शिकार हो गया है। टीवी पर लाशों और ध्वस्त हो चुके मकानों के ही दृश्य थे। एक पत्रकार होने के बाद भी यह सब देख नहीं पाया और टीवी छोड़ वापिस अपने काम में लग गया। लेकिन एक बात फिर स्पष्ट हो गई कि हम सबसे ताकतवर प्राणी होने का दम भरने वाले इंसान प्रकृति के सामने किसी तिनके से ज्यादा औकात नहीं रखते हैं। इसलिए दोस्तों जो जीवन मिला है उसे जिंदादिली से जिएं और दूसरों के लिए जिएं। समाज और देश के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करें, क्योंकि यही यादें आपकी रह जाएंगी।
-भीमसिंह मीणा 

क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके?

  क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके? अब तक तो यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन खबर दै...