Wednesday, May 18, 2016

भाजपा का सपना जीतना नहीं, भारत को कांग्रेस मुक्त करना है

अब जबकि देश के प्रमुख पांच राज्य पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडू, केरल और पुडचेरी में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के गुरूवार की सुबह से परिणाम आना शुरू हो जाएगा।सभी पार्टियों की धड़कन बढ़ गई होगी। खासतौर से कांग्रेस की, क्योंकि इनका काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है। परिणाम को लेकर चिंतित तो भाजपा भी है, लेकिन उतनी नहीं। कारण साफ है कि भाजपा के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और जितनी भी सीटें, जिस भी राज्य में मिलेंगी इनको फायदा ही होना है। सबसे बड़ी बात की इस बहाने भाजपा अपने संगठन को प्रत्येक राज्य में मजबूत कर रही है। कार्यकर्ता खड़े हो रहे हैं और अब काम दिखाई देने लगा है। दरअसल इन पांच राज्यों में जिस प्रकार से भाजपा ने कैम्पेन किया, वह मिशन 2019 की तैयारी के लिए था। बिहार के बाद भाजपा अपने कैम्पेन को लेकर बेहद सतर्क है और डीएनए टेस्ट जैसा एक भी जुमला इन पांच राज्यों के प्रचार में सुनने को नहीं मिला। माना जा रहा है कि यह चुनाव भेल ही क्षेत्रीय हुए हो, लेकिन इस बार इनको राष्ट्रीय स्तर पर काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनमें ममता बनर्जी, जयललिता, तरुण गोगोई, एम करुणानिधि, ओमन चांडी, वीएस अच्युतानंदन, बुद्धदेव भट्टाचार्य, सर्बानंद सोनोवाल और एन रंगासामी जैसे बड़े नेताओं की किस्मत का फैसला जो होने वाला है। सर्वे में ममता बनर्जी को सुरक्षित बताया जा रहा है, लेकिन जब तक मतपेटी के भीतर से वोटर्स का फैसला बाहर नहीं आ जाता, कुछ भी कह पाना मुश्किल है। भले चैनल  सर्वे केरल, असम और तमिलनाडू में सत्ता परिवर्तन के संकेत दे रहे हो, लेकिन चर्चा हो रही है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व को कितना बचा पाएगी। दरअसल भाजपा का बड़ा ही स्पष्ट एजेंडा है कि वो भारत को कांग्रेस मुक्त करना चाहती है। यही कारण है कि बिहार में हारने के बाद भाजपा नेताओं को इतना अफसोस नहीं हुआ, जितना उत्तराखंड में कांग्रेस की वापसी से हुआ। बहरहाल इस बार इन गैर हिन्दी राज्यों के चुनाव परिणाम में हिन्दी राज्यों के लोगों की खासी दिलचस्पी है।

Friday, December 25, 2015

मोदी का मास्टर स्ट्रोक

बस कयास लग रहे हैं, असली मकसद समझ से बाहर है
आज मोदी ने जबरदस्त मास्टर स्ट्रोक खेला। उन्होंने अचानक पाकिस्तान जाकर और किसी खास मित्र की तरह नवाज शरीफ से मुलाकात लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मोदी पाकिस्तान घूमकर भी आ गए और कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। परंपरा अनुसार कांग्रेस ने इस यात्रा का विरोध यह कहकर कर दिया कि पहले से मीटिंग फिक्स थी। लेकिन उनकी तरफ से यह बात बिना किसी प्रमाणिकता के कहीं जाने का एक ही मतलब है कि जैसे कोई खिसयानी बिल्ली खंबा नोंच रही है। कांग्रेस के एक और प्रवक्ता ने तो यह तक कह दिया कि किसी उद्योगपति ने यह मीटिंग फिक्स कराई, लेकिन उस उद्योगपति का नाम वे नहीं बता पाए। खैर हम बात करें यात्रा कि इसके मायने किसी को भी समझ में नहीं आए हैं। जानकार, बुद्धिजीवी, मीडिया, विरोधी और अन्य केवल कयास लगा रहे हैं कि आखिर सब अचानक कैसे हो गया? पाकिस्तान में मोदी के कदम पड़ते ही चर्चा, चिलपों शुरू हो गया। इस दौरान देखा कि कष्मीर के नेता, आर्मी के विषेषज्ञ इसे अच्छी पहल बता रहे हैं, लेकिन कुछ और भी संदेष हैं जिस पर शायद किसी का ध्यान नहीं गया।
पहला तो यह कि मोदी पाकिस्तान यात्रा को बहुत ज्यादा तूल नहीं देना चाहते थे और उनके दिमाग में 25 दिसम्बर की तारीख पहले से तय थी। क्योंकि यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता है कि आज अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जिन्ना और नवाज शरीफ का भी जन्मदिन है। वहीं नवाज शरीफ की नवाजी मेहरूनिसां की शादी है। निष्चित रूप से योजना पहले ही मोदी के दिमाग में जन्म ले चुकी थी। बस वे इस यात्रा पर कोई बवाल नहीं चाहते थे। यदि घोषित करके पाकिस्तान यात्रा की जाती तो विरोधियों के साथ षिवसेना व पार्टी के अंदर ही इस बात का विरोध शुरू हो जाता। अब चूंकि यात्रा हो ही गई है तो सिर्फ विलाप करने या खुषियां मनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। एक और बात जो मोदी ने सबको समझाई है कि वे पाकिस्तान को बहुत बड़ा नहीं समझते हैं और जैसे देष में भ्रमण करते हैं वैसे ही उनके लिए पाकिस्तान है। यानि वे जो कहते थे कि भारत के लिए पाकिस्तान छोटी समस्या यह है तो यह बात मोदी के काम में नजर भी आ रही है। वे चहल कदमी करते हुए गए और फिर भारत आ गए। इस यात्रा के बाद परिणाम क्या आएंगे, ये तो आना वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल मोदी का कद बढ़ा है और नवाज अपने बचे-खुचे बाल नोंचते हुए सोच रहे होंगे कि वे इसका क्या जवाब दें। क्योंकि मोदी तो शादी के बहाने आ गए, लेकिन नवाज तो ऐसा भी नहीं कर पाएंगे।
कहीं जेटली को बचाने के लिए तो नहीं उठाया कदम!
इस यात्रा के कई सारे मायने हैं और एक मायना यह भी लगता है कि इस पूरी यात्रा से मीडिया व देष का पूरा ध्यान बंट गया है। जबकि कल तक डीडीसीए घोटाले के बहाने लगातार जेटली पर निषाना साधा जा रहा था। विरोधी भी मजबूरन सब काम छोड़कर मोदी की पाकिस्तान यात्रा पर राग अलापने लगे हैं। मोदी ने अपने एक कदम से हवा का रूख बदल दिया है और संभवतः अगले एक-दो दिन में वे समस्या को ही खत्म कर दें। इस बीच केजरीवाल ने डीडीसीए के लिए आयोग बनाने की नाकाम कोषिष भी कर डाली।

क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके?

  क्या सच में मप्र पुलिस इतनी साहसी हो गई कि एक सत्ताधारी दल के मंत्री पुत्र को बेल्ट से पीट सके? अब तक तो यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन खबर दै...