Monday, April 27, 2009

शिवराज, लोधी फंसे

इलाक़े में कम ही दिखने वाले बीजेपी के उम्मीदवार शिवराज सिंह लोधी वैसे जनता के बीच अपनी हरकतों को लेकर बदनाम है उस पर सरकारी इमारतों का चुनाव में इस्तेमाल कर फिर एक नई मुसीबत में फंस गए हैं... लोगों को लगता है कि शिवराज सिंह लोधी वैसे ही एक तो उनके हाल पूछने नहीं आते उस पर लगातार चुनाव आचार संहिता का मखौल उड़ा कर बदनाम हो रहे हैं...आम मतदाताओं को लग रहा है कि मैदान में पिछड़ता देख शिवराज सिंह लोधी ये भूल गए हैं कि क्या उचित है क्या नहीं...
अजीब हरकतों, कार्यकर्ताओं से बदतमीज़ी और लोगों के बीच कमज़ोर जनसम्पर्क को लेकर शिवराज सिंह लोधी की हालत वैसे ही काफ़ी पतली है उस पर वे लगातार आचार संहिता की ग़लतियां करते जा रहे हैं... अगर यही हाल रहा तो शिवराज सिंह लोधी को कोई करिश्मा ही बचा सकता है

भूपेन्द्र की बुरी स्थिती

मध्य प्रदेश बीजेपी के नेता भूपेंद्र सिंह पिछला विधानसभा चुनाव हार चुके हैं... लेकिन कुर्सी की चाहत है कि पूरी नहीं होती... अबकी बार नज़रें सांसद की कुर्सी पर टिकी हैं... इसलिये विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त भुलाकर एक बार फिर लोगों से वोट माँग रहे हैं... बीजेपी के प्रत्याशी बनकर मैदान में उतरे भूपेंद्र सिंह शायद ये भूल रहे हैं कि सागर की जिस जनता ने उन्हें पाँच महीने पहले हार का स्वाद चखाया था... वही जनता उनके पिछले कारनामों के लिए उन्हें आसानी से माफ नहीं करेगी... क्योंकि ये वही भूपेंद्र सिंह हैं... जिन पर अपनों को फायदा पहुँचाने के आरोप हैं... ये वही भूपेंद्र सिंह हैं... जिनके परिवार पर एक पुलिस अधिकारी की हत्या का आरोप है... जी हाँ भूपेंद्र सिंह के भतीजे पर ये आरोप है कि उसने एसआई मदन दुबे की हत्या की है... इस वारदात के बाद जहाँ ब्राह्मण मतदाताओं ने भूपेंद्र सिंह से दूरी बना ली है... तो शहरी लोगों का भरोसा भी भूपेंद्र सिंह जीत नहीं पाये हैं...

दो बार विधायक का चुनाव हार चुके भूपेंद्र सिंह के पास शायद इस बात का जवाब भी नहीं होगा... कि इस बार आखिर किस बूते वे इलाके की जनता के सामने हाथ पसार रहे हैं... क्योंकि भूपेंद्र सिंह से पहले सागर के सांसद रहे बीजेपी लीडर वीरेंद्र सिंह की छवि भी बेहद खराब रही है... ऊपर से पार्टी के भीतर भी भूपेंद्र सिंह को लेकर विरोध के स्वर सुनाई देने के बाद... पार्टी से टिकट लेने के बावजूद भूपेंद्र सिंह की मुश्किलें बेहद बढ़ी हुई हैं... आखिर लोगों को भी तो हक है... अपना नुमाइंदा चुनने से पहले उसे परखने का... अब भूपेंद्र सिंह उस पर खरे नहीं उतरते... तो इसका खामियाजा तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा...

Sunday, April 19, 2009

और कितना गिरोगे भाई?

"ये वाकया तब का है जब जॉर्ज बुश भारत आया था। उसके स्वागत में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 40-50 लोगों को रात्रिभोज में बुलाया था। मुझे भी बुलावा आया था। मैं गया लेकिन छाती पर एक बैज लगाकर, उसपर लिखा था खून के बदले तेल नहीं मिलेगा। मेरे वहां ऐसे जाते ही प्रधानमंत्री ने जॉर्ज को कहीं और ले जाना चाहा लेकिन मैंने वहीं से जॉर्ज बुश की तरफ बोलते हुए डांटना शुरु कर दिया। ये देख कर जॉर्ज बुश थर्र-थर्र कांपने लगा। बुश को अभी किसी पत्रकार ने जूता मारा है, मैं तो ......." ये कहना है शाहिद सिद्दीकी का। सालों तक एसपी का दामन थामे बैठे शाहिद सिद्दीकी इस बार बिजनौर लोकसभा सीट से बीएसपी के उम्मीदवार हैं। वोटर्स को रिझाने के लिए नेता कितनी मूर्खतापूर्ण बातें कर सकते हैं इस घटना से साफ ज़ाहिर होता है। सिद्दीकी साहब ने ये बात बिजनौर में अपने संबोधन के दौरान कही। अब आप सोच रहे होंगे कि भला बिजनौर लोकसभा सीट में चुनाव प्रचार हो रहा है तो जॉर्ज बुश का इससे क्या सम्बन्ध? तो जनाब इसमें गहरा सम्बन्ध है। दरअसल सिद्दीका साहब को पता है कि जनता है चुनावी दावों और वादों पर यकीन करना छोड़ दिया है। ऐसे में उन्होंने एक ऐसा तीर छोड़ा जिससे मतदाता का दिल भी घायल हो जाए और विपक्ष के दिल में भी चुभन पैदा हो। इस चुनावी तीर को चुनाव प्रचार मैनुअल में ब्ह्रास्त्र कहते हैं। जी हां, किसी की धार्मिक भावना पर चोट करना। सिद्दीकी साहब बिजनौर में मुस्लिम बहुल इलाके में जनसभा को संबोधित कर रहे थे। अमेरिका के इराक और अफगानिस्तान पर हमला करने को सिद्दीकी भुनान चाहते थे। वो उपरोक्त घटना का जिक्र करके बिजनौर के मुसलमानों को बताना चाह रहे थे कि इराक और अफगानिस्तान के मुस्लिमों के साथ अन्याय करने वाले जॉर्ज को उन्होंने दिल्ली में अपमानित कर दिया। वाह री राजनीति, तू भी क्या-क्या करवाती है। खैर इतना ही होता तो बाद अलग थी। इसे एक चुटकी समझकर नज़रअंदाज़ किया जा सकता था। लेकिन इसके बाद सिद्दीकी ने वही राग छेड़ दिया जिसे आज हर कोई गा रहा है। सिद्दीकी ने मेरठ के दंगों और अक्टूबर 1990 में हुए बिजनौर के दंगों का जिक्र छेड़कर एक बार फिर जनता के ज़ख्मों को कुरेदा। साथ ही उन्होंने बिजनौर दंगों के लिए मुलायम सिंह यादव को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन जाने क्यों सिद्दीकी साहब ये क्यों भूल गए कि वह खुद सालों तक मुलायम के साथ बने रहे हैं। फिर आज क्यो उनको एकाएक ये ध्यान हो आया? उन्होंने मुलायम-कल्याण पर लाशों के ढेर पर राजनीति करने का भी आरोप लगाया। यही नहीं उन्होंने वरुण गांधी के भड़काऊ भाषण के अंशों का इस्तेमाल किया। यानि पूरा भाषण मुद्दों पर कम भावनाओं पर चोट करने पर ज्यादा केंद्रित रहा। भले ही सिद्दीकी ने अपने तीर से जॉर्ज बुश को साध रखा हो लेकिन उनका असली निशाना वोटर ही है। यही वजह है कि अपने मुंह मियां मिट्ठु बनने से साथ ही उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति से साथ भारत के प्रधानमंत्री को भी अपने सामने बौना साबित कर दिया। क्यों नहीं ऐसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की जाती। कहां है देश की लाखों माओं का दर्द समझने वाली मायावती जिसे राहुल गांधी के भाषण के बाद तो तो रासुका लगाने की ज़रूरत पड़ती है लेकिन अपनी पार्टी के नेताओं के मुंह से निकलता ज़हर दिखाई नहीं देता। जिन-जिन बाहुबलियों को माया ने टिकट दिया है जाने आज तक वो कितनी मांओं की गोद सूनी कर चुके हैं।

Friday, April 3, 2009

अंधविश्वास की पराकाष्ठा...

हालांकि ये एक राजनैतिक ब्लॉग है लेकिन फिर भी मैं खुद को यहां पर इस वाकये को पोस्ट करने से नहीं रोक पा रहा। एक ऐसी घटना ने विचलित कर दिया है जिसे आपके साथ बांटना चाहता हूं। ये घटना है मध्यप्रदेश के पन्ना ज़िले से....जहां एक युवक ने नवरात्रि के आख़िरी दिन ख़ुद की बलि दे दी.....युवक ने माता के मंदिर परिसर में हंसिए से अपनी गर्दन काट ली और अपनी बलि दे दी....यहां के लोग अंधविश्वास से किस कदर जकड़े हुए हैं....इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक ओर युवक ये सब कर रहा था....और दूसरी ओर मंदिर परिसर में मौजूद लोग माता की जय-जयकार करके उस युवक को अपनी गर्दन काटने को प्रोत्साहित कर रहे थे. युवक का नाम कृष्णा कुशवाहा है....और ये ख़ुद को  दुर्गा मां का परम भक्त बताता था....बुंदेलखंड के इस इलाके में ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान जो कुछ भी भक्त माता को जो अर्पित करते हैं......माता उसे वो वापस लौटा देती है.....वैसे तो इस इलाके में पहले भी जीभ अर्पित करने की परंपरा देखी गई है.....कृष्णा ने नवरात्रि में सभी दिन की उपवास किया था....और कल नवमी के दिन उसने माता को अपनी जीभ की जगह अपना सिर अर्पित करने का फैसला किया.....चश्मदीदों की मानें तो कृष्णा ने ख़ुद के द्वारा पुरुषोत्तमपुर की पहाड़ी पर बनाए गए मंदिर में पहुंचा....और मंदिर परिसर के पेड़ पर चढ़ गया....और फिर वहां उसने हंसिये को तार से बांधा...और उस पर अपनी गर्दन को दे मारा.....और फिर क्या था....गर्दन को हंसिये पर मारते ही वो तड़पता हुआ पेड़ से गिर गया.....खास बात ये है कि मंदिर में पहले से ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे....और वो भजन कीर्तन कर रहे थे.....इन लोगों ने भी कृष्णा को रोकने की कोशिश नहीं बल्कि उन लोगों ने कृष्णा को और प्रोत्साहित किया....ये पूरी घटना कितनी दर्दनाक है...अंधविश्वास का ऐसा नमूना शायद ही आपने कभी देखा हो...किस तरह अंधविश्वास में पड़ कर कृष्णा ने ख़ुद की बलि दे दी। घटना की सूचना के बाद पुलिस मौके पर पहुंची ज़रूर....लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी.। मेरे पास इस घटना की तस्वीरें भी हैं लेकिन वो इतनी विभीत्स हैं कि आपको विचलित कर सकती हैं। इसलिए मैं उन्हे यहां प्रदर्शित करना उचित नहीं समझता। वैसे तो मध्यप्रदेश सरकार लोगों के अंधविश्वास को खत्म करने के उपाय करने के दावे करती रहती है....लेकिन इस घटना ने एक बार फिर इन दावों को खोखला साबित कर दिया है....

अब बताईए, दुनिया कहां की कहां पहुंच गई और ये लोग किन बेड़ियों में जकड़े हुए हैं। इसे अंधविश्वास की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या कहेंगे। ये श्रद्धा है या मूर्खता...? इन जड़बुद्धि लोगों को न तो समझाया जा सकता है और न ही इनमें जागृति लाई जा सकती है। ऐसे लोगों का एक ही इलाज है, वो ये कि ये सभी इसी तरह से अंधविश्वास में सामूहिक रूप से अपनी बलि दे दें। कम से कम इन जैसे कलंक तो मिटेंगे देश से। इन्ही लोगों की वजह से आज दुनिया भर में भारत को हेय दृष्टि से देखा जाता है।
-आदर्श राठौर

आचार संहिता नहीं रोकती विकास कार्य