Monday, November 23, 2009

चाहे साल कितने भी क्यों न जाए जखम नही भर सकते हैं

भोपाल। हम लगातार २५ सालों से भोपाल में हुई गैस ट्रेजडी की बरसी मानते आ रहे हैं और अब काला दिवस मनाकर शांत हो जाते हैं, लेकिन जखम हरे हैं। कुछ भी भुलाना आसन नही है। मीडिया ने गेस ट्रेजडी को मीडिया ने हमेशा विषय को तवज्जो दी है। कुछ लेख जिन्हें विभिन्न वेबसाइट पर प्रकाशित किया जा चुका है को इस ब्लॉग पर साभार लिया जा रहा है।
भोपाल गैस त्रासदी के घाव अभी भरे नहीं
कोई क्या करे जब उसकी सुनने वाला कोई नहीं हो. जब सरकारों ने अपने कान बंद कर लिए हों और मीडिया के लिए रोचक कार्यक्रमों के मायने बदल गए हों.
भोपाल गैस पीड़ितों का कहना है कि ऐसा ही कुछ उनके साथ हुआ है, हालांकि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी है. चौबीस साल पहले घटी घटना को शायद लोगों ने भुला दिया हो, लेकिन उसके घाव अब भी जन्म ले रहे बच्चों के शरीरों पर देखे जा सकते हैं.
अपने दुख दर्द केंद्र सरकार के सामने रखने के लिए बीस फ़रवरी 2008 को भोपाल गैस पीड़ितों ने दिल्ली तक सड़क यात्रा की शुरुआत की.
कई मीलों लंबी ये यात्रा 28 मार्च को दिल्ली में ख़त्म हुई. लेकिन पीड़ितों का कहना है कि सरकार को इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी.
तपती धूप में धरना
गैस पीड़ितों ने अपनी बात को रखने के लिए तपती धूप में 38 दिन तक जंतर मंतर पर धरना दिया.
वे बच्चे जो ठीक से देख नहीं सकते, या चल नहीं सकते, उन्होंने इस भयानक गर्मी में भी सब्र नहीं खोया.
मिलिए रशीदा बी से जिन्होंने परिवार के छह सदस्य भोपाल गैस त्रासदी में गँवा दिए.
रशीदा कहती हैं कि पीड़ितों ने संतरी से लेकर मंत्री से गुहार लगाई, लेकिन मात्र आश्वासन के अलावा उनके हाथ कुछ नहीं लगा.
हम कई सांसदों से मिल चुके हैं. हम अर्जुन सिंह, रामविलास पासवान, ऑस्कर फर्नांडिस, यहाँ तक कि प्रधानमत्री के मुख्य सचिव से मिल चुके हैं, लेकिन सबने यही कहा कि हमने आपकी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा दी है लेकिन वो कब आपसे मिलेंगे ये उन्होंने नहीं बताया

रशीदा बी
वो कहती हैं, ''हम कई सांसदों से मिल चुके हैं. हम अर्जुन सिंह, रामविलास पासवान, ऑस्कर फर्नांडिस, यहाँ तक कि प्रधानमत्री के मुख्य सचिव से मिल चुके हैं, लेकिन सबने यही कहा कि हमने आपकी बात प्रधानमंत्री तक पहुँचा दी है लेकिन वो कब आपसे मिलेंगे ये उन्होंने नहीं बताया.''
कोई रास्ता नहीं निकलते देख भोपाल गैस पीड़ितों ने सीधे प्रधानमंत्री आवास तक अपनी आवाज़ पहुँचाने की ठानी.
करीब 50 गैस पीड़ित सोमवार की सुबह दिल्ली के प्रेस क्लब पर एक बस में इकठ्ठा हुए.
भोपाल गैस पीड़ितों के हितों के लिए संघर्षरत एक कार्यकर्ता ने बताया कि उन्हें इसके अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा वो सीधे प्रधानमंत्री के घर अचानक पहुँचें और उनसे मामले में दखल देने की गुज़ारिश करें.
उनका कहना था, ''अगर हम मार्च करते हुए आवास तक जाते तो सुरक्षाकर्मी हमें ऐसा नहीं करने देते, इसलिए उन्होंने ऐसा रास्ता चुना है.''
मैं भी बस में सवार हो लिया. इतने सारे बच्चों के लिए बस शायद छोटी थी.
कुछ बच्चे अपनी माँ के गोद में दुबके हुए थे. हमे बताया गया कि बस में बैठे कुछ बच्चे या तो चल नहीं सकते या फिर उन्हें दिखाई देना बंद हो गया है क्योंकि यूनियन कार्बाइड की फ़ैक्ट्री से निकले धुएं ने वर्षों बाद भी उन्हे नहीं बख्शा है.
प्रधानमंत्री से नाराज़गी
बस में बैठे लोग बेहद नाराज़ हैं. सब के ज़हन में बस एक ही सवाल था- दुनिया का इतनी बड़ी त्रासदी के शिकार लोग, जो इतनी दूर से पैदल चलकर आए और बदहवास कर देने वाली गर्मी में जंतर मंतर में शांतिपूर्वक अपनी बात रखी, क्या देश के प्रधानमंत्री के पास उनके लिए दो मिनट भी नहीं है?
आख़िर मनमोहन सिंह उनके भी तो प्रधानमंत्री हैं.
गैस पीड़ितों का कहना है कि सरकार को उनमें कोई दिलचस्पी नहीं है
बच्चों ने अपने कपड़ों के ऊपर काले रंग का कपड़ा ओढ़ रखा था, जिस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए लिखा था एक सवाल-अग़र हम आपके परिवार के सदस्य होते तो क्या हमारे साथ ऐसा व्यवहार होता?
बस पर मौजूद आसिफ़ा अख़्तर ने हमें बताया कि जब तक बच्चों के लिए अधिकार उन्हें नहीं मिलते, वो वापस नहीं जाएँगे.
प्रधानमंत्री आवास के नज़दीक आते ही बस में हलचल शुरू हो गई. आवास के पास बस की रफ़्तार धीरे होते देख तैनात सुरक्षाकर्मी भी सकते में आ गए और बस की ओर दौड़ना शुरू कर दिया.
इधर कार्यकर्ताओं ने बच्चों को बस के बाहर निकालना शुरू कर दिया. एक तरफ़ सुरक्षाकर्मी बच्चों को बाहर निकलने से रोकने की की कोशिश कर रहे थे, तो दूसरी तरफ बच्चों और साथ आई महिलाओं का इरादा कुछ और ही था.
कुछ बच्चें ज़मीन पर लेट गए, लेकिन सुरक्षाकर्मियों के आगे उनकी एक भी नहीं चल पाई.
उन्हें जल्द ही बस में वापस डाल दिया गया. कुछ लोग भोपाल की तस्वीरें लहराते नज़र आए, लेकिन पुलिसवालों ने कोई कोताही नहीं बरती और उन्हें भी बस में डालकर रवाना कर दिया.
करीब 20 मिनट में ही छोटी सी भीड़ पर काबू पा लिया गया। पुलिसिया डंडा फिर जीत गया.
लेखक विनीत खरे बीबीसी में संवाददाता हैं।
भोपाल गैस पीडितों ने पिछले लगातार तेईस वर्षों से अपने साथ हो रही 'अनदेखी' और 'नाइंसाफी' को उजागर करने और 'प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके वायदे की याद दिलाने' के लिए 'दिल्ली चलो' का रास्ता ढूँढा है.
क़रीब तीन हज़ार गैस पीडितों के दो जत्थे जल्दी ही दिल्ली जाकर धरने, प्रदर्शन और भूख हरताल करेंगे.
सौ से अधिक लोगों का ऐसा ही एक ग्रुप बुधवार को लगभग आठ सौ किलोमीटर पदयात्रा करते हुए दिल्ली के लिए रवाना हुआ जबकि पीडितों का दूसरा समूह रेलगाड़ी से शुक्रवार को चलकर राजधानी पहुँचेगा.
2006 में गैस पीडितों की एक पदयात्रा और फिर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे धरने के बाद मनमोहन सिंह ने इस दल की मांग पर एक केंद्रीय समिति का गठन किया था और पीडितों के राहत और पुनर्वास के लिए एक विस्तृत योजना तैयार करने का वायदा किया था.
इस योजना को दिसम्बर 2007 तक तैयार हो जाना था.
स्वयंसेवी कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने कहा की यह जत्था गुना, शिवपुरी, ग्वालियर, आगरा और मथुरा होते हुए मार्च के अन्तिम हफ्ते में दिल्ली पहुँचकर जंतर-मंतर पर धरना देगा और अगर ज़रूरत पड़ी तो अनिशचित कालीन भूख हड़ताल भी शुरू करेगा.
तेईस साल पहले यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से हुए गैस रिसाव से सीधे प्रभावित पीडितों के अलावा इस पदयात्रा में अब बंद पड़ी फैक्ट्री के आसपास की बस्तियों में रहने वाले भी शामिल होंगे.
कई अध्ययनों के अनुसार प्लांट में मौजूद रसायनिक कचरा भूतल में सालों से रिस रहा है जिससे आसपास के इलाके का भू जल ज़हरीला हो गया है लेकिन समीप की बस्तियों में रहने वाले लोग उसे ही पीने को मजबूर हैं.
नए आँकड़े
पीडितों और उनके परिवार के पुनर्वास की विस्तृत नीतियों के अलावा संगठनों की मांग है कि भारत सरकार यूनियन कार्बाइड और अब वर्तमान मालिक दाऊ कैमिकल्स के ख़िलाफ़ कानूनी कारवाई करे, दाऊ की भारत में व्यवसायिक गतिविधियों पर रोक लगाए, उससे प्लांट में मौजूद कचरे की सफ़ाई का ख़र्च मांगे और कचरे की मौजूदगी के कारण लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को हुए नुक़सान की भरपाई करने को कहे.
पीडितों के साथ दुर्घटना के दिन से काम कर रहे अब्दुल जब्बार कहते हैं कि उनके साथ जा रहा यह समूह लोगों को यह बताना चाहता है मुआवज़े के नाम पर पीडितों को जो रक़म मिली है वो नाम मात्र की है क्योंकि दुर्घटना में मारे जाने और उससे प्रभावित लोगों की संख्या में पाँच गुना इज़ाफ़ा हो गया है.
1989 में यूनियन कार्बाइड से सात अरब 15 करोड़ रुपए का जो समझौता हुआ था वह इस आधार पर था कि गैस रिसाव से तीन हज़ार लोगों की मौत हुई थी और एक लाख बीस हज़ार लोग घायल हुए थे.
चार साल पहले जो आधिकारिक आंकडों आए उनके अनुसार अब तक इस दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या पन्द्रह हज़ार होने और पाँच लाख से अधिक के पीड़ित होने का मामला सामने आया है.
गैस पीडितों के साथ काम कर रही संस्थाओं का दावा है कि उनसे सहानभूति रखने वाली संस्थाएं उनके समर्थन में देश भर में रैलियों, बैठकों और हस्ताक्षर अभियानों का आयोजन कर रही हैं.
साथ ही अमरीका और ब्रिटेन में स्थित भारतीय दूतावासों पर भी उनके समर्थक विरोध प्रदर्शन करेंगे।
फ़ैसल मोहम्मद अलीबीबीसी संवाददाता, भोपाळ
जबलपुर की एक स्थानीय अदालत ने एक अंतरिम आदेश के जरिए भोपाल गैस त्रासदी को लेकर लिखी गई एक किताब पर रोक लगा दी है।
इट वाज द फाईव पास्ट मिडनाइट इन भोपाल पर स्थायी रूप से रोक लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका की सुनवाई करते हुए अदालत ने अपने अगले आदेश तक के लिए इसके मुद्रण, प्रकाशन, बिक्री और वितरण पर रोक लगा दी।
फ्रींसीसी लेखक डोमिनिक लापियर और जेवियर मोरो की इस किताब का प्रकाशन फुल सर्किल पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली ने वर्ष 2001 में किया था और यह साल 1984 में हुई भेपाल गैस त्रासदी पर आधारित है।
मध्य प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक स्वराज पुरी ने किताब के कुछ हिस्सों पर एतराज जताते हुए इस पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त जिला जज राजीव सिंह ने कल यह आदेश पारित किया।
गैस त्रासदी के समय पुरी भोपाल के पुलिस अधीक्षक थे। उनका कहना है कि किताब के कुछ हिस्सों के अनुसार दुर्घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई नकारात्मक थी। इससे उनकी मानहानि होती है।
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