Friday, September 10, 2010

पॉकेटमार को बनना पड़ेगा हाईकेट, क्योंकि आ गया है डिजीटल वॉलेट

भीमसिंह मीणा
भोपाल
भारत में नित नई तकनीक का प्रवेश हो रहा है और लोग भी इससे तेजी से जुड़ रहे हैं, क्योंकि आम भारतीय तकनीक से जुडऩे का फायदा जान चुका है। लेकिन अब पॉकेटमारों को भी आधुनिक होना पड़ेगा, क्योंकि अब पर्स (वॉलेट) जेब में नहीं रहेगा, क्योंकि वॉलेट डिजीटल हो गया है। कैसे आइए जानते हैं हाल ही में प्रकाशित डीबी स्टार के इस आर्टिकल से जो लिखा है शादाब शमी ने।
भारत में सूचना प्रौद्योगिकि के जनक सैम पित्रोदा अब एक नई तकनीक से भारत को रूबरू कराने जा रहे हैं। यह तकनीक है धन को सुरक्षित लेने-देन की जिसे डिजिटल वॉलेट कहते हैं। आइए जानें इसके बारे में कुछ अहम जानकारियां।
भारत में सूचना क्रांति के अगुवा सैम पित्रोदा ने कहा है कि मोबाइल फोन में डिजिटल वॉलेट की नई तकनीक से दुनियाभर के लोगों में पैसे के लेन-देन का तरीका बदल कर रख देगा। 1980 के दशक में कैसियो डिजिटल डायरी के खोजकर्ता पित्रोदा की कंपनी सी-सैम ने मोबाइल मनी ट्रांजिक्शन की तकनीक विकसित की है। यह आज के बैंकिंग, क्रेडिट कार्ड, भुगतान और धन की अवधारणा को बदल कर रख देगी। उनकी नई खोज की व्याख्या उनकी किताब 'द मार्च ऑफ मोबाइल मनी: द फ्यूचर ऑफ लाइफस्टाइल मैनेजमेंट में की गई है। इस किताब को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने रिलीज किया था। पित्रोदा ने कहा कि आज आपके के्रडिट कार्ड, डेबिट कार्ड (प्लास्टिक मनी भी कहते हैं) को आपके पते पर भेजा जाता है, भविष्य में आपकी प्लास्टिक मनी डिजिटल होगी और उसको आपके मोबाइल फोन पर भेजा जाएगा। इससे बैंक, व्यावसाइयों के साथ ही उपभोक्ता को काफी आराम होगा और यह तकनीक मौजूदा समय में ब्राजील, बोल्विया, कोस्टारिका, सिंगापुर में प्रयोग हो रही है। उन्होंने कहा कि इस नई खोज के बारे में प्रेरणा उन्हें उनकी पत्नी से मिली, जो घंटों तक चेक पर चेक लिखा करती थीं।
क्या है डिजिटल वॉलेट
डिजिटल वॉलेट यानी आपके पास एक ऐसा बटुआ, जिसमें रुपए भौतिक रूप से मौजूद नहीं हों, लेकिन आप कहीं भी कुछ भी खरीदारी कर सकें। डिजिटल वॉलेट को ई-वॉलेट के नाम से भी जानते हैं और इससे लेन-देन जल्द और सुरक्षित तरह से हो सकता है। यह उसी तरह से होगा जैसा कि आपका बटुआ होता है, लेकिन रुपए (1000, 500, 100, 50, 20 रुपए के नोट) भौतिक रूप से मौजूद नहीं होंगे। जहां मर्जी हो वहां पर ऑन लाइन शॉपिंग इंफॉर्मेशन के जरिए खरीदारी हो सकेगी। यह तकनीक वर्तमान की मोबाइल बैंकिग से काफी मिलती-जुलती होगी, लेकिन इसमें लेन-देन तुरंत व्यावसायी के खाते में दिखाई देगा।
तकनीक में है यह
डिजिटल वॉलेट में सॉफ्टवेयर और इंफॉर्मेशन दोनों ही होते हैं। सॉफ्टवेयर की मदद से निजी जानकारियों और वास्तविक लेन-देन की जानकारियों को सुरक्षित  रहती हैं। इसमें उपयोगकर्ता की निजी जानकारी जैसे घर का पता, भुगतान का तरीका, जिसमें क्रेडिट कार्ड नंबर, सिक्योरिटी नंबर, कार्ड की एक्सायरी डेट और अन्य जानकारियां रहती हैं।
सेटअप और उपयोग
ग्राहक के लिए डिजिटल बटुए का प्रयोग करना बेहद आसान होता है। इसमें सॉफ्टवेयर को इंस्टॉल करने के बाद उपयोगकर्ता अपनी सारी जरूरी जानकारी उसमें डाल देता है। इसके बाद खरीदारी करने के बाद डिजिटल वॉलेट से आपकी सारी जानकारी अपने आप ऑन-लाइन फॉर्म में भर जाती हैं। मगर, कोई दूसरा व्यक्ति इसका गलत इस्तेमाल नहीं कर सकता है, क्योंकि इसमें एक पासवर्ड दिया रहता है। इसके चलते कोई आपकी निजी जानकारियों को भी नहीं जान सकता है। वहीं, दुकानदार के पास भी एक डिजिटल वॉलेट होगा, जिसमें ग्राहक रुपए को ट्रांसफर करेगा। मोबाइल बैंकिग से यह इस मामले में अलग है कि इसमें धन तुरंत दुकानदार के डिजिटल वॉलेट में दिखने लगेगा, जबकि मोबाइल बैंकिंग में समय लगता है।
ई-कॉमर्स साइट के लाभ
ई-कॉमर्स का अर्थ है कंप्यूटर नेटवर्क और इंटरनेट के जरिए उत्पाद या सेवाओं को खरीदना या बेचना। इंटनेट के लगातार बढ़ते प्रयोग के कारण ई-कॉमर्स में लगातार वृद्धि हो रही है। इसके बावजूद करीब २५ प्रतिशत ऑनलाइन शॉपर्स के ऑर्डर इसलिए कैंसिल हो जाते हैं, क्योंकि ग्राहक लंबे-चौड़े फॉर्म को नहीं भरना चाहते हैं। डिजिटल वॉलेट में यह समस्या नहीं रहती। इसके जरिए आप सुरक्षित और सही जानकारी बहुत कम समय में ट्रांसफर कर देते हैं। इसके साथ ही अधिकतर बड़े रिटेलर इंटरनेट पर मौजूद हैं, तो ऐसे में घर से ही सामान खरीदने के लिए ऑर्डर दे सकते हैं। 
कौन है सैम पित्रोदा
सैम पित्रोदा को भारत में सूचना क्रांति का जनक माना जाता है। सैम एक सफल उद्यमी होने के साथ-साथा एक अविष्कारक और नीति निर्माता भी हैं। उनका जन्म 4 मई 1942 को उड़ीसा के टिटलागढ़ के हुआ था। उनका असली नाम सत्यानारायण गंगाराम पित्रोदा है। वर्तमान में वे प्रधानमंत्री के 'पब्लिक इनफॉरमेशन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इनोवेशन के सलाहकार हैं। एक सलाहकार के तौर पर सैम इस समय भारत के नागरिकों को विभिन्न क्षेत्रों में सूचना तकनीक से जुड़ी सुविधाएं देने के लिए प्रयासरत है। सैम इस समय भारत के लिए 'डिकेड ऑफ इनोवेशन की रूपरेखा भी तैयार कर रहे हैं। सैम नेशनल नॉलेज कमीशन के चेयरमैन भी रहे हैं। वे इस पद पर 2005 से 2008 तक रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने27 क्षेत्रों में लगभग 300 अनुशंसाएं की, जिनका उद्देश्य आम जन के ज्ञान को बढ़ाकर जीवन स्तर को बेहतर बनान था। उन्होंने 100 के करीब तकनीक का पेटेंट करा रखा है जिसपर कार्य चल रहा है। वे सी-सैम नामक कंपनी के संस्थापक और सीईओ भी हैं। कंपनी का मुख्यालय शिकागों में है। इसका ऑफिस लंदन, टोक्यो, मुंबई और वड़ोदरा में है। सैम यूनाइटेड नेशन्स में भी सलाहकार रह चुके हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में सैम उनके तकनीकी सलाहकार थे और भारत में सूचना क्रांति लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। 
गुजरात के थे पिता
सैम के माता-पिता गुजरात के रहने वाले थे और बाद में उड़ीसा चले गए थे। उड़ीसा में ही सैम का जन्म हुआ था। सैम के माता-पिता गांधी जी से बहुत प्रभावित थे इसी कारण उन्होंने सैम और उनके भाई को पढ़ाई करने के लिए गुजरात भेजा ताकि वे गांधीवादी बातों को भी सीख सकें। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा वल्लभ विद्यानगर से पूरी की और फिजिस्क और इलेक्ट्रानिक्स से स्नाकोत्त्तर की पढ़ाई वड़ोदरा के महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अमेरिका के शिकागों के 'इल्लिनोस इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजीÓ से मास्टर्स इन इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी। २०१० में सैम को इल्लिनोस विश्वविद्यालय ने मानद डिग्री प्रदान की। सैम शिकागो के इल्लिनोस में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ 1964 से रह रहे हैं।
इसलिए हैं संचार क्रांति के जनक
सैम को 1984
में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा विशेष तौर पर भारत बुलाया गया। भारत वापस आकर उन्होंने सी-डॉट की स्थापना की थी। यह सरकार द्वारा संचालित दूरसंचार प्रौद्योगिकी विकास केंद्र है। 1987 में वे राजीव गांधी के सलाहकार बने और उन्होंने विदेशी और घरेलू स्तर कई बड़ी दूरसंचार नीतियों का निर्माण किया। इस समय उन्होंने टेलीकंयूनिकेशन, पानी, साक्षरता, प्रतिरक्षण, डेरी और ऑयलसीड्स के क्षेत्र से संबंधित ६ मिशन तकनीकी मिशन चलाए। उन्होंने भारत में पीसीओ की शुरुआत कर टेलीफोन को आम आदमी की पहुंच में ला दिया। 1990 के दौर में सैम वापस शिकागो चले गए और वहां अपने व्यवसाय पर ध्यान देना शुरू कर दिया।2004 में यूपीए की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें दोबारा भारत बुलाया और नेशनल नॉलेज कमीशन का प्रमुख बना दिया। जुलाई २००९ में सैम को रेलवे के आईसीटी के विशेज्ञय समिति का हेड बनने का प्रस्ताव दिया गया। इसी वर्ष अकटूबर में सैम प्रधानमंत्री के 'पब्लिक इनफॉरमेशन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड इनोवेशनÓ के सलाहकार बन गए।
ऐसे बढ़ा ई-बाजार
1979 मिशेल एल्ड्रिच ने ऑनलाइन शॉपिंग की खोज की।
1981 यूके के थॉमसन हॉलीडेज ने सबसे पहले बिजनेस टू बिजनेस ऑन लाइन शॉपिंग की शुरुआत की।
1982 फ्रांस टेलीकॉम एंड यूजर की ओर से देशभर में ऑनलाइन ऑर्डर देने की शुरुआत की गई।
1985 में यूके की निसान कंपनी ने उपभोक्ताओं की क्रेडिट को ऑनलाइन चेक कर कार बेचना शुरू कर दिया।
1990 टिम बर्नर्स-ली ने पहले बेब ब्राउजर वल्र्डवाइडवेब के बारे में लिखा।
1994 में नेटस्केप ने नेविगेटर ब्राउजर को मोजिला नाम से अक्टूबर में लॉन्च किया। इसके वेब पेज पर पिज्जा हट ने ऑन लाइन खरीद के लिए विकल्प दिया। इसी वर्ष पहला ऑन लाइन बैंक खोला गया और फूलों को भेजने के साथ ही मैगजीन के ऑन लाइन सब्सक्रिप्शन का ऑप्शन दिया गया।

कारों और मोटरसाइकिलों की तरह ही एडल्ट मटीरियल व्यावसायिक रूप से यहां मिलने लगा।

1995 में जेफ बीजोस ने एमाजॉन डॉट कॉम नाम से पहला गैर व्यावसायिक इंटरनेट रेडियो स्टेशन शुरू किया। डेल और सीको ने इंटरनेट का प्रयोग व्यावसायिक ट्रांजिक्शन के लिए किया। पीयरे ओमिड्यर ने नीलामी वाली साइट के रुप में ई-बे की शुरुआत की।
1999 में बिजनेस डॉट कॉम ७.५ मिलियन अमेरिकी डॉलर में ई कंपनीज को बेच दी गई, इसे १९९७ में १.49 लाख अमेरिकी डॉलर में खरीदा गया था।
2003 में एमाजॉन डॉट कॉम ने अपना पहला वार्षिक मुनाफा पोस्ट किया।
2010 में यूएस ई कॉमर्स और ऑन लाइन रिटेलर्स की सेल १७३ बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई।