Saturday, August 21, 2010

मेरी रुचि देखकर काम दिया है मुख्यमंत्री ने..

लक्ष्मीकांत शर्मा
माता : श्रीमती रमा देवी शर्मा
पिता : दिवंगत चंद्रमोहन शर्मा
जन्म : 24 जनवरी 1961
जन्म स्थान: सिरोंज, जिला विदिशा
शिक्षा : एम.ए., एल.एल.बी.
स्कूल : सिरोंज शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल
कॉलेज : सिरोंज शासकीय कॉलेज, गंजबासोदा शासकीय कॉलेज
व्यवसाय : पांडित्य कर्म
विवाह : वर्ष 1992 में
श्रीमती तारामणि शर्मा के साथ
बच्चे : अपर्णा और अमिता-15 वर्ष, अक्षिता-14 वर्ष
अभिरुचि : सांस्कृतिक आयोजन एवं समाज सेवा
करियर ग्राफ :
विधायक: वर्ष 1993, वर्ष 1998, वर्ष 2003 और वर्ष 2008 में सिरोंज क्षेत्र से विधायक चुने गए।
...और मंत्री
28 जून 2004 में प्रथम बार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने और विभाग मिले जनसम्पर्क, खनिज साधन और जनशिकायत निवारण विभाग।
27 अगस्त 2004 में दूसरी बार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने और विभाग मिले खनिज साधन, जनशिकायत निवारण, संस्कृति, धार्मिक न्यास, धर्मस्व, पुनर्वास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग।
4 दिसंबर 2005 में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) पद की शपथ ली।
25 अगस्त 2007 में पहली बार केबीनेट मंत्री के रूप शपथ ली।
20 दिसंबर 2008 को दूसरी बार केबीनेट मंत्री के रूप में शपथ ली।
...और अब
केबीनेट मंत्री-तकनीकी शिक्षा, प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा, संस्कृति, जनसम्पर्क, धार्मिक न्यास और धर्मस्व।
...पुरस्कार
वर्ष 1996 में मप्र विधानसभा के उत्कृष्ट विधायक पुरस्कार से सम्मान
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डाटा बैंक बनाया जाएगा?
''अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर रंग साधना में सक्रिय रंगकर्मियों का डाटा बैंक बनाया जाएगा,,
जवाब- विभाग के अधिकारियों को निर्देश दे दिए गए हैं। पहले सभी के नामों की सूची तैयार की जाएगी और फिर एक फायनल डाटा बैंक तैयार किया जाएगा।

अनुमति का सरलीकरण होगा?''ऐसे शासकीय कर्मचारी जो किसी संस्था के सौजन्य से देश-दुनिया में रंगमंच आयोजन में प्रस्तुति देते हैं, उन्हें सरकारी विभागों से विभागीय अनुमति देने में टाल-मटोल कीजाती है। इसका सरलीकरण किया जाएगा। ÓÓ
जवाब- ये बात तो हमारे सामने पहली बार आई है। इस संबंध में मैं स्वयं सामान्य प्रशासन विभाग से चर्चा करूंगा। कोशिश की जाएगी कि कर्मचारियों की ये दिक्कत जल्द खत्म हो।


नाम रोशन करने वालों के लिए क्या योजना है?
सैयद शाह हुसैन/ प्रोफेशनल, कोहेफिजा
च्च् ऐसे शासकीय सेवक जिन्होंने रंगमंच साधना में देश-दुनिया में मप्र का नाम रोशन किया है, उन्हें पुरस्कृत करने की क्या योजना है?ज्ज्
जवाब- पुरस्कार देने के लिए कोई बाध्यता तय नहीं की है। कलाकार चाहे शासकीय सेवा में हो या फिर निजी सेवा में, हमारा विभाग केवल उसकी कला का सम्मान करता है।

निजी कॉलेजों पर अंकुश क्यों नहीं?
 च्च् निजी कॉलेजों में शिक्षा कम और व्यापार ज्यादा हो रहा है, क्यों आप इस पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं?ज्ज्
जवाब- अब तक जो कुछ भी होता रहा है वह अब नहीं होगा। हम कॉलेजों पर अंकुश लगाने के लिए लगातार कार्रवाई करते हैं और आगे भी जारी रहेगी। कॉलेजों की मनमानी को रोकने के लिए एक स्पेशल टीम को गठन किया जाएगा।

एक ही तरह के विभाग क्यों?
च्च् आप लगातार चार बार विधायक और पांच बार मंत्री बन चुके हैं, लेकिन विभाग हमेशा आपको एक ही तरह के मिले, कोई खास वजह या स्वयं की रुचि के कारण ऐसा हुआ?ज्ज्
जवाब- ऐसा कौन कहता है कि मुझे एक ही तरह के विभाग मिले हैं। विभाग देने का फैसला मुख्यमंत्री करते हैं। हो सकता है उन्हें मेरी सक्रियता देखकर लगा हो कि ये विभाग देना चाहिए। मेरी रुचि संस्कृति के क्षेत्र में ज्यादा है इसलिए मेरा आंकलन कर मुझे संस्कृति विभाग दिया जाता रहा हो।

क्या परिवार की वजह से तरक्की मिली?
च्च् आपने राजनीति में बहुत तरक्की की और इसके आप हकदार भी हैं लेकिन माना जाता है कि आपको अपने पारिवारिक बैकग्राउंड की वजह से इतनी सफलता मिली?ज्ज्
जवाब- मुझे ये बात मानने से कतई इंकार नहीं है। मेरा परिवार पांडित्य कर्म से जुड़ा रहा है और मेरे पिता एक शिक्षक थे। जिसके वजह से हमारे परिवार का समाज में एक अलग स्थान था। मैं स्वयं भी समाज के बीच में रहकर काम करता था, इसलिए राजनीति में आने के बाद लोगों ने खुले मन से मेरा सहयोग किया।


कैसे बदल गए सपने?

च्च् हर आदमी का लक्ष्य शुरू में कुछ और होता है, लेकिन बाद में बदलने लगता है। स्कूल में थे तो क्या बनना चाहते थे और जब कॉलेज गए तो सपनों में क्या बदलाव आया?ज्ज्
जवाब- कभी नहीं सोचा था कि विधायक बनूंगा। खासतौर से जब स्कूल में था तो राजनीति में आने का मन में कभी विचार नहीं आया। स्कूल के बाद कॉलेज में बहुत ज्यादा राजनीति के बारे में नहीं सोचा। हां राष्ट्रीय स्वयं संघ में जरूर में निरंतर कार्य करता रहा। विधायक बनने के पहले सरस्वती स्कूल में आचार्य था।

फिल्मों को संस्कृति का हिस्सा मानते हैं?

आप संस्कृति विभाग के मंत्री और फिल्में भी संस्कृति का हिस्सा होती हैं तो आप मानते हैं कि फिल्मों से किसी भी देश या प्रदेश की संस्कृति में बदलाव लाया जा सकता है?
जवाब- फिल्मों से समाज की संस्कृति पर आज से ६-७ साल पहले फर्क पड़ता था। उस कुछ भी अच्छा या बुरा होता था तो फिल्मों को जिम्मेदार माना जाता था। अब टीवी परिवार और समाज पर हावी हो गई है इसलिए जिम्मेदार फिल्में नहीं टीवी सीरियल माने जाएंगे।

क्या फिल्में राजनीति से प्रेरित होती हैं?च्च् देश में होने वाली राजनीति फिल्मों से प्रेरित होती है कि फिल्मों में दिखाई जाने वाल राजनीति फिल्मों से प्रेरित होती है?ज्ज्
जवाब- कोई फिल्म ऐसी नहीं है जिसे देखकर देश या किसी प्रदेश की राजनीति में बदलवा आया हो। हां फिल्मवाले जरूर राजनीतिक घटनाक्रमों को देखतर तत्काल फिल्म बना डालते हैं।


क्या आज भी पंडिताई करते हैं?

च्च् आपका परिवार पंडिताई का काम करता था और उसी से पूरे परिवार की जीविकोपार्जन होता था, लेकिन अब आप मंत्री हैं तो क्या आज भी पंडिताई करने का मन करता है?ज्ज्
जवाब- मौका मिलता है पंडिताई करने से न तो चूकता हूं और न ही चूकुंगा। अगर कोई पूरी श्रद्धा से बुलाएगा तो मैं आज भी विवाह और कथा करने को तैयार हूं। करुं भी क्यों न यही तो मेरा कर्म है।

लोगों से अमल करवाना चाहते हैं?च्च् हर आदमी के मन में कोई बात होती है जिसे वह सभी से फॉलो करवाना चाहता है तो ऐसी कोई बात आपके दिमाग में भी है?ज्ज्
जवाब- मैं इतना महान आदमी तो नहीं हंू कि कोई मुझे फॉला करे। फिर भी मन में कई विचार आते हैं जिनसे देश और समाज का भला हो सके को लेकर जरूर सोचता हूं कि लोग भी इन्हें फॉलो करें।

परिवार के लिए समय निकाल पाते हैं?

च्च् आपके पास प्रदेश के पांच महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व है तो क्या कभी खुद के लिए या परिवार के समय मिल पाता है और मिलता है तो आप उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं?ज्ज्
जवाब- मेरा गृह क्षेत्र यहां से ११० किमी दूर है। मैं जब भी अपने क्षेत्र में जाता हूं तो परिवार के साथ ही वक्त बिताता हूं। मेरी तीनों बच्चियों से मैं खूब सारी बातें करता हूं।

Wednesday, August 18, 2010

हाय राम आमदानी बडत जात है

भोपाल. दैनिक भास्कर कई बार बेहतरीन मुद्दों पर खबरें प्रकाशित कर चूका है और इस बार तो वाकई देश कि नब्ज पकड़ ली. मामला पुराना है मगर रोचक है. हो भी क्यों नहीं क्योंकि बात महंगाई कि जो हो रही है. मैं खुद कुछ कहूँ इससे बेहतर है कि आप दैनिक भास्कर डोट कॉम कि खबर पड़े.
नई दिल्ली. लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, विपक्षी पार्टी बीजेपी और उत्तर प्रदेश में शासन कर रही बीएसपी की एक साल की कमाई के आगे भारत पर वर्षों राज करने वाली ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियां कहीं भी नहीं टिकती हैं। भले ही ब्रिटेन का जीडीपी (सकल घरेलू उत्‍पाद) भारत से दोगुना  है, वहां का हर नागरिक औसतन एक भारतीय से 30 गुना ज़्यादा कमाता है, लेकिन भारत की तीन प्रमुख सियासी पार्टियों की आमदनी ब्रिटेन की तीन प्रमुख पार्टियों की तुलना में 150 गुना से भी ज़्यादा है।
वित्त वर्ष 2008-09 में कांग्रेस, बीजेपी और बीएसपी की साझा आमदनी करीब 786.62 करोड़ रुपये (करीब 8 अरब रुपये) रही, जबकि ब्रिटेन की तीन प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- लेबर, कंजर्वेटिव और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी - ने वित्त वर्ष 2009-10 में महज करीब साढ़े पांच करोड़ रुपये (पाउंड स्टर्लिंग की आज की दर के आधार पर) जुटाए। भारत के राजनीतिक दलों की माली हैसियत सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत डाली गई एक अर्जी के जरिए सामने आई है, जबकि ब्रिटिश राजनीतिक पार्टियों की कमाई का ठोस अनुमान वहां के चुनाव आयोग ने लगाया है।
भारत में 702 राजनीतिक पार्टियां रजिस्टर्ड हैं। इनमें छह पार्टियां राष्ट्रीय हैं। वहीं, ब्रिटेन में 341 राजनीतिक पार्टियां रजिस्टर्ड हैं। ब्रिटेन में चुनाव कराने वाली संस्था 'द इलेक्टोरल कमिशन' की साइट पर मौजूद सूचना के मुताबिक लेबर पार्टी, कंजर्वेटिव पार्टी और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने पिछले साल आयकर रिटर्न दाखिल नहीं किया है। लेकिन कमिशन के अंदाज के मुताबिक ये तीनों पार्टियां करीब पौने दो करोड़ रुपये सालाना की आमदनी से ज़्यादा का रिटर्न दाखिल करेंगी। अगर वास्‍तविक आंकड़ा थोड़ा ज़्यादा भी हो, तो भी उनकी आमदनी भारत की तीन सबसे अमीर पार्टियों की सालाना आमदनी के आगे कहीं भी नहीं टिकने वाली होगी है।
गौरतलब है कि ब्रिटेन दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत को दुनिया की 11 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था माना जाता है। दोनों देशों में प्रति व्यक्ति आय और जीडीपी के आंकड़े में बड़ा अंतर है। भारत में लोग बेहद गरीब हैं, लेकिन यहां की राजनीतिक पार्टियों के पास अगाध पैसा है।
तीन मानदंडों पर भारत और ब्रिटेन की तुलना
जनसंख्या
भारत: 1 अरब 16 करोड़, ब्रिटेन: 6.20 करोड़
जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद)
भारत: 55 हजार अरब रुपये, ब्रिटेन: 1 लाख अरब रुपये से ज़्यादा
प्रति व्यक्ति आय
भारत: 44 हजार रुपये, ब्रिटेन: 12 लाख रुपये

Monday, August 2, 2010

राम तो घर नहीं दिल में रहते हैं वहा से केसे निकालोगे

भोपाल. मीडिया क्लब पर एक बड़ी उम्दा टिप्पड़ी आई की राम को नकारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है पड़ी और इसको पड़ने के बाद साफ़ हो गाय की राम के अस्तित्व को नकारने वाले बहुत थोड़े हैं लिकिन उनका जवाब देना पड़ता है. वो टिप्पड़ी यहाँ हु-बहु प्रकाशित कर रहे हैं.

 'राम को नकारना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी'

Pawan Kumar Arvind 

दिल्ली के दरियागंज स्थित प्रकाशन संस्थान द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक पुस्तक में भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकारने की प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिवाद किया गया है और दलील दी गई है कि इसका सीधा अर्थ तो यह हुआ कि बाकायदा आज भी मौजूद अयोध्या तथा सरयू समेत श्रीराम से जुडे़ अनेक स्थान एवं प्रतीक भी काल्पनिक हैं।
प्रसिद्ध लेखक डॉ. भगवती शरण मिश्र ने अपनी पुस्तक "मैं राम बोल रहा हूँ" में लिखा है- "राम को नकारने वालों को सरयू, अयोध्या, चित्रकूट, कनक, लक्ष्मण किला, हनुमान गढ़ी, रामेश्वरम, जनकपुर आदि को भी नकारना होगा।
इस पुस्तक में लेखक वर्तमान परिस्थितियों पर भगवान श्रीराम के ही मुंह से बेबाक टिप्पणियां करता है और कहता है कि राम को नकारना तो बहुत आसान है पर उनके प्रतीकों को मिटाना दुष्कर ही नहीं असम्भव भी है।
डॉ. मिश्र ने भगवान राम के माध्यम से जो दलीलें दी हैं वे उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार हैं- 'राम को नकारोगे तो अयोध्या को भी नकारना पडे़गा। इस पूरे नगर और इसमें गली-गली में स्थित मंदिरों, मठों के अस्तित्व को भी झुठलाना होगा। इसकी विभिन्न छोटी- बडी इमारतों को भी, क्योंकि तब ये सभी एक कल्पना प्रसूत नगर के अंश हो जाएंगे। अयोध्या को नकारो तो कनक भवन के सदृश करोड़ो रुपयों से निर्मित विशाल मंदिर को भी नकारना होगा क्योंकि उसमें राम-सीता अवस्थित हैं और सरयूतीर स्थित वह भव्य लक्ष्मण किला इसे तो लक्ष्मण द्वारा ही निर्मित किया गया था। उसके अस्तित्व को भी नकारना होगा। एक मिथ्या को मिटाना होगा।'
उन्होंने लिखा है- "इस सरयू का क्या करोग, इसे सुखा दोगे, यह तुम्हारे वश की बात नहीं। फिर इसके उद्गम पर ही रोक लगा दो। कुछ कोसों तक भूमि ही जलमग्न होगी न कुछ लोग ही तो विस्थापित होंगे। तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं। नर्मदा-परियोजना में तुमने यह सब देखा-झेला है। तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ा है, अब भी नहीं बिगड़ेगा। एक अर्थहीन नदी से तो मुक्ति मिलेगी। पर ध्यान देना, तुम्हारे देश की नदियां ही तुम्हारी जीवन रेखा हैं। इसके किनारे ही नगर-गांव आबाद हुये हैं। सभ्यता-संस्कृति पनपी है। तुम्हारा देश कृषि प्रधान है। कृषि के लिये जल चाहिए। सरयू को मिटाओगे तो इसके तीर बसे नगर-गांव उजड़ जायेंगे। सहस्त्रों की संख्या में इन उजड़े लोगों का क्या करोगे, भारी समस्या है। कुछ बोलने. कुछ करने से पहले सोचना आवश्यक है।