Sunday, July 25, 2010

बिन सावन भारत सून

भोपाल. भारत में त्योहारों और व्रत का बड़ा महत्व है. अगर व्रत, त्यौहार को ख़त्म कर दिया जाए तो भारत की पहचान पर खतरा हो जाएगा. इस कड़ी में सावन का महिना अति विशिष्ट महिना है और इसका अपना महत्व है. सावन माह में शिवभक्तों द्वारा की जाने वाली भगवान शिव की आराधना, पूजा, जयकारे और धार्मिक आयोजन ऐसा शिवमय वातावरण बना देते हैं कि उसके प्रभाव से ईश भक्ति से दूर रहने वाले लोगों के मन भी शिवभक्ति और श्रद्धा की लहर पैदा हो जाती है। इससे यही प्रश्र हर धर्मजन के मन में पैदा होता है कि आखिर श्रावण मास और शिव भक्ति का क्या संबंध है और इस मास में शिव उपासना का इतना अधिक महत्व क्यों है। इस बात का उत्तर हिन्दू धर्म ग्रंथ ऋग्वेद में बताया गया है। वेदों में प्रकृति और मानव का गहरा संबंध बताया गया है। वेदों में लिखें कुछ मंत्रों का संदेश कुछ इस प्रकार है -
बारिश में ब्राह्मण वेद पाठ और धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते हैं और इस दौरान वह ऐसे मंत्रों को पढ़ते हैं, जो सुख और शांति देने वाले होते हैं। बारिश के मौसम में अनेक तरह के जीव-जंतु बाहर निकल आते है और तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती है। ऐसा लगता है कि जैसे लंबे समय तक व्रत रखकर सभी ने अपनी चुप्पी तोड़ी हो। इस बात के द्वारा संदेश दिया गया है कि जिस तरह जीव-जंतु बारिश के मौसम में बोलने लगते हैं, उसी तरह से हर व्यक्ति को श्रावण से शुरु होने वाले चार मासों में धर्म और ईश्वर की भक्ति के लिए धर्म ग्रंथों का पाठ करना या सुनना चाहिए। इसी प्रकार बारिश या सावन मास में अनेक प्रकार के पौधे पैदा होते हैं, जो औषधीय गुणों के होते हैं। यह हमारी आयु और शरीर सुखों को बढ़ाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से पूरी प्रकृति ही शिव का रुप है। इसलिए प्रकृति की पूजा के रुप में सावन मास में शिव की पूजा की जाती है। खास तौर पर वर्षा के मौसम जल तत्व की अधिकता होती है। इसलिए शिव का जल से अभिषेक सुख, समृद्धि, संतान, धन, ज्ञान और लंबी उम्र देने वाला होता है।

 
अनिल सिरवैया द्वारा भेजा गया भजन
इक  जरा छींक ही दो तुम
चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
ओरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल कर
पाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते हो
इक पथराई सी मुस्कान लिए
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो
-अनिल सिरवैया
 रिपोर्टर, पीपुल्स समाचार

पाकिस्तान के बारे में सही कहा था मनीष कोइराला ने


भोपाल. जो एक बार गलती करे वो इन्सान, जो दो बार गलती करे वो हिंदुस्तान और जो गलती पर गलती करे वो पाकिस्तान. ये लाइन किसी फिल्म में मनीषा कोईराल ने बोली थी. फिल्म तो पिट गई लेकिन डाईलाग हिट हो गया, और होता भी क्यों नहीं आखिर मनीषा ने सच जो कहा था. ये बात आज पाकिस्तान ने एक बार फिर साबित कर दी है. कश्मीर मुद्दे को लेकर हमेशा से ही अड़ियल रवैया इख्तियार करने वाले पाकिस्तान ने अब एक बार फिर भारत से साफ़- साफ़ कहा है कि जब तक भारत-पाक वार्ता के एजेंडे में कश्मीर मुद्दा शामिल नहीं होता वह भारत से कोई बात नहीं करेगा। 
पाक विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने कहा है कि भारत कश्मीर मुद्दे को ज्यादा तवज्जो नहीं देगा,तो हम बातचीत जारी नहीं रख पाएंगे। अमेरिका के सामने भी अलापा था राग कश्मीर भारत- पाक वार्ता के तत्काल बाद पाकिस्तान ने अमेरिका के सामने कश्मीर मुद्दा उठाया था। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन से बातचीत के दौरान कहा की पाकिस्तान,भारत के साथ वार्ता जारी रखना चाहता है लेकिन इसके लिए भारत संग कश्मीर मसले पर बात होना बेहद ज़रूरी है।
ये सब हो रहा है और हमारे कर्णधार जिन्हें हमने अपना जीवन चलने का अधिकार सौंपा है कह रहा है की नहीं अभी हालत बिगड़े नहीं है. खैर बात भारत की थी तो दिल का दर्द सामने ले आया. वर्ना तो हम भी खुश है इस हिंदुस्तान में. 
ऐसा भी है पाकिस्तान, मुलायजा फरमाइए-

Friday, July 16, 2010

फर्जी वाडा करो,फिर कमाओ और पकडे जाओ तो घर बैठकर खाओ

भोपाल से...
हमारे देश में दलालों और बेईमानो के लिए बहुत जगह है. अब पुरे देश का हिसाब तो अभी नहीं बताया जा सकता है, लेकिन भोपाल में हुए आज एक फैसले से कुच्छ तो दावा किया ही जा सकता है.  गुरूवार को मध्य प्रदेश शासन मैं कम करने वाले 17 अफसरों के जाती प्रमाण पात्र फर्जी पाए गए. अब सवाल ये उठता है की इनमे से कई के खिलाफ तो पहले भी जांच हो चुकी हैं और इन्ही अफसरों को बा-इज्ज़त बरी भी कर दिया गया था तो क्या वे जांच रिपोर्ट फर्जी थी और नहीं तो क्या गलत जांच करने के लिए उन अफसरों को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री उन्हें दण्डित करेंगे.

धोखेबाज हैं ये 17 अफसर
भोपाल. संदिग्ध जाति प्रमाण पत्रों की जांच करने सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनी छानबीन समिति ने 15 अधिकारी-कर्मचारियों के अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए हैं। इनमें भारतीय वन सेवा के अफसर से लेकर राज्य पुलिस सेवा और मुख्य अभियंता स्तर के अधिकारी तक शामिल हैं।
समिति ने पाया है कि न केवल नौकरी और पदोन्नति में बल्कि मेडिकल कॉलेज में दाखिले तक में गलत जाति प्रमाण पत्र से लाभ उठाया गया। अन्य पिछड़ा वर्ग और ब्राम्हण जाति के लोग भी इस फर्जीवाड़े में शरीक हैं। सरकार ने संबंधित जिलों के कलेक्टर और एसपी को इन अफसरों के जाति सर्टिफिकेट निरस्त करने का आदेश दिया है।
इनके खिलाफ अगली कार्यवाही करने को कहा गया है, इसमें सेवा से बर्खास्तगी शामिल है। राज्य स्तरीय छानबीन समिति के सामने 19 मामले थे। इनमें से महज एक प्रमाण पत्र सही पाया गया जबकि एक मामला हाईकोर्ट में लंबित होने की वजह से उस पर निर्णय नहीं लिया गया। आदिम जाति कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव समिति के अध्यक्ष, केंद्रीय अजजा आयोग के निदेशक एवं राज्य अजजा आयोग के सचिव, आदिम जाति अनुसंधान संस्थान के संयुक्त संचालक समिति के सदस्य हैं।
एके भूगांवकर भारतीय वन सेवा (राज्य वन सेवा से पदोन्नत) भोपाल
वीके भूगांवकर चीफ इंजीनियर पीडब्ल्युडी भोपाल
पीरन सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बहादुर सिंह गिल कंपनी कमांडर होमगार्ड्स
बादाम सिंह मीना जिला रोजगार अधिकारी
नागेश्वर सोनकेसरी सहायक आबकारी आयुक्त मंदसौर
खुशेंद्र सोनकेसरी एमपीपीएससी से डीएसपी चयनित
पूनम खंतवाल पुलिस सब इंस्पेक्टर भोपाल
राकेश कश्यप सेक्शन ऑफिसर मंत्रालय
जयेंद्र सिंह तंवर व्याख्याता आदिम जाति कल्याण विभाग अलीराजपुर
शशिकला धकाते लिपिक वन विभाग छिंदवाड़ा
रेखा सहकाटे स्टेनोग्राफर मंत्रालय
अरुणा चौधरी स्टॉफ नर्स जबलपुर
कपिल कुमार जोशी स्टेट बैंक इंदौर में मैनेजर थे
भागीरथ रायक जिला प्रौढ़ शिक्षा अधिकारी
प्रेमशंकर धानका अध्यापक पद के लिए आवेदन किया था

फर्जी प्रमाण पत्र की जगह नया सर्टिफिकेट कर लिया मंजूर : अनुसूचित जाति के संदिग्ध प्रमाण पत्रों की जांच की राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने एक प्रमाण पत्र को फर्जी पाया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की। विकास आयुक्त कार्यालय के लिपिक गौतम कठाने ने 1980 में जो जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर नौकरी हासिल की, जांच में कलेक्टर छिंदवाड़ा ने फर्जी पाया।
कलेक्टर ने समिति को भेजी रिपोर्ट में कहा कि यह प्रमाण पत्र जारी ही नहीं हुआ। कठाने ने 2005 में तैयार कठाने ने महार जाति का प्रमाण पत्र पेश किया, समिति ने उसे मान लिया क्योंकि जांच में पाया गया कि वे महार जाति के ही हैं। लेकिन फर्जी प्रमाण पत्र से 25 वर्ष सेवा करने और लाभ लेने के मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इनका मामला कोर्ट में
समिति ने कर्मचारी महेंद्र सिंह के संदिग्ध जाति प्रमाण पत्र मामले में कोई निर्णय नहीं लिया, क्योंकि प्रकरण हाईकोर्ट में लंबित है। समिति ने सुनवाई का पूरा मौका देकर जांच के बाद 16 अधिकारी, कर्मचारियों के सर्टिफिकेट निरस्त करने की सिफारिश की है। संबंधित जिलों के कलेक्टरों को कार्यवाही करने के आदेश दिया गया है। 

अरुण कोचर,आदिवासी विकास आयुक्त मप्र

भोपाल में पदस्थ लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता वीके भूगांवकर उनके भाई एके भूगांवकर के प्रमाण पत्र में उन्हें आदिवासी जाति हल्बा का बताया गया है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं जो ओबीसी में आती है। उनके पिता मंत्रालय की सेवा में रहे थे और वे ओबीसी में ही थे। वीके भूगांवकर ने अजा वर्ग के आरक्षण का सेवा में लाभ लिया लेकिन स्कूल शिक्षा प्रमाण पत्रों में उन्हें ब्राम्हण दर्शाया गया है। इनका जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बना।
राज्य वन सेवा से भारतीय वन सेवा में पदोन्नत हो चुके प्रेमशंकर धनका गड़रिया जाति के पाए गए जो अनुसूचित नहीं बल्कि ओबीसी में है। धनका ने नरसिंहपुर से प्रमाण पत्र बनवाया। जिला रोजगार अधिकारी पदस्थ बादाम सिंह मीना लटेरी में निवास के आधार पर अजजा का लाभ रहे थे, वे जांच में गुना जिले के निवासी पाए गए जहां मीना जाति आदिवासी वर्ग में नहीं आती। इन्होंने विदिशा से जाति प्रमाण पत्र बनवाया।
मंदसौर में पदस्थ आबकारी विभाग में सहायक आयुक्तनागेश्वर सोनकेशरी और उनके भाई डीएसपी खसेंद्र सोनकेसरी का जाति प्रमाण पत्र भी हल्बा जाति का है जबकि वे कोष्टा जाति के हैं। नागेश्वर का प्रमाणपत्र भोपाल के कमलानगर क्षेत्र में निवास का बना है।
कमलानगर के जिस मकान में रहना दर्शाया गया उसके मालिक ने इंकार कर दिया कि नागेश्वर नाम का किरायेदार उनके यहां रहा। इनका जाति प्रमाण पत्र मंडला से जारी हुआ।
सर्टिफिकेट कैसे-कैसे
राकेश कश्यप ने कीर जाति के प्रमाण पत्र से नौकरी हासिल की वे ढीमर जाति के पाए गए जो अजजा में नहीं है। जयेंद्र सिंह तंवर ने झाबुआ से कंवर जनजाति का सर्टिफिकेट पर नौकरी प्राप्त की। प्रमाण पत्र गलत पाया गया।
शशिकला धकाते आदिम जाति अनुसंधान संस्थान में पदस्थ हैं, उनका हल्बा अजा जाति प्रमाण पत्र गलत मिला। वे भी कोष्टा जाति की हैं। भिलाला जाति के प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी कर रहे भागीरथ रायक काछी जाति के पाए गए। इन्हें छिंदवाड़ा से जाति प्रमाण पत्र जारी किया गया।
ये भी दूध के धुले नहीं
रेखा सहकाटे की जाति महाराष्ट्र में अजजा में है मप्र में नहीं। इनका प्रमाण पत्र भोपाल से जारी किया गया। पूनम खंतवाल पौढ़ी गढ़वाल की मूल निवासी हैं लेकिन मप्र में अजजा नागवंशी का जाति प्रमाण पत्र लेकर नौकरी पाई।
जाति प्रमाण पत्र भोपाल से बनवाया। कपिल कुमार जोशी ने भी फर्जी अजजा प्रमाण पत्र से नौकरी पाई और जांच में वे ब्राम्हण पाए गए। इन्होंने भोपाल से प्रमाण पत्र बनवाया। पीरन सिंह और बहादुर सिंह गिल का गोंड जाति प्रमाण पत्र फर्जी मिला, वे अनुसूचित जाति के हैं।
पीरन सिंह होमगार्ड में कंपनी कमांडर हैं। इन्होंने सागर से प्रमाण पत्र बनवाए। कंवर जाति प्रमाण के आधार पर एमबीबीएस कर रही ज्योति छत्तरी जांच में ताम्रकार पाई गईं जो ओबीसी में है। ज्योति ने इंदौर से प्रमाण पत्र बनवाया।

पूरा हुआ लक्ष्मण का बनवास

भोपाल से... एक लम्बे समय तक लक्ष्मण सिंह कांग्रेस से दूर रहे और आज बदजुबानी को बहाना बनाकर भाजपा ने उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. ये सभी के लिए एक सबक है, जिसमे साडी बातें सामने आ जाती हैं. दरअसल लक्ष्मण सिंह का मन तभी से पार्टी में नहीं लएजी रहा था जबसे भाजपा केंद्र के चुनाव हरी और उसके बाद में खुद लक्ष्मण सिंह अपने ही भाई की तरफ से खड़े किये गए गए प्यादे से हार गए. बदजुबानी तो पहले भी हुई है लेकिन निर्णय आज ही क्यों कर दिया गया. शायद लक्ष्मण सिंह भी यही चाहते थे क्योंकि वे व्ही अपनी अयोध्या से बहुत दिनों तक दूर नहीं रह सकते हैं. आख़िरकार बहाना कोई भी हो लेकिन आज लक्ष्मण का वन्बास तो पूरा हुआ. 

(दैनिक भास्कर की खबर पड़ने के लिए किल्क करैं)
 खबर आज की जिसमे है पूरा घटनाक्रम...
भोपाल. कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के अनुज और पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह को प्रदेश भाजपा ने पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। नितिन गडकरी के खिलाफ बयानबाजी के चलते यह कार्रवाई हुई है। हाल ही में गडकरी ने दिग्विजय सिंह के बारे में कहा था कि आतंवादियों की तरफदारी करने वाले औरंगजेब की औलाद हैं।
इस टिप्पणी के बाद लक्ष्मण सिंह ने खुलकर गडकरी की आलोचना की थी। तभी से उन पर कार्रवाई की तलवार लटक रही थी। उधर लक्ष्मण सिंह ने दैनिक भास्कर से चर्चा में कहा कि उन्हें इस कार्रवाई से कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि गडकरी और उनके नेतृत्व में भाजपा इन दिनों जिस तरह की भाषा बोल रही है वह निरंकुश और हिटलरशाही प्रवृत्ति को दर्शाती है। हाल ही मप्र में मंत्रियों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई हुई है वह इसकी पुष्टि करती है।उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह के समय भाजपा सही रास्ते पर थी। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। लक्ष्मण सिंह ने कहा कि गडकरी ने उनके परिवार के खिलाफ जिस अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया उसके बाद उनका चुप रहना असंभव था।
भविष्य के बारे में विचार नहीं-लक्ष्मण सिंह ने कहा कि उन्होंने अभी यह तय नहीं किया है कि वह कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी से जुडें़गे। मैं सामाजिक कार्यकर्ता की तरह काम करुंगा।
इसलिए आए थे भाजपा में
लक्ष्मण सिंह ने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं था। इसलिए वे भाजपा से जुड़े थे। सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते क्या वे फिर कांग्रेस में लौटेंगे? इसका उन्होंने कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया। सात साल तक नाता रहा भाजपा से
2003 के विधानसभा चुनाव के दौरान ब्यावरा में उमा भारती की मौजूदगी में आयोजित एक कार्यक्रम में लक्ष्मण सिंह कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। पार्टी ने उन्हें 2004 के लोकसभा चुनाव में राजगढ़ लोकसभा सीट से टिकट दिया और वे विजयी हुए। 2009 में भी वह भाजपा के टिकट पर इसी सीट से चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार नारायण सिंह अमलाबे के हाथों पराजित हो गए। वे राजगढ़ से कुल पांच बार सांसद रहे। इनमें से चार बार वह कांग्रेस के टिकट पर जीते थे. 

जगह तो अच्छी है लेकिन क्या गारंटी है की सरकार फिल्मवालों को परेशान नहीं करेगी?

भोपाल. जब भी कही कोई बड़ा बदलाव आता है तो सबसे पहले कुछ छोटी और फिर बड़ी घटनाएं हो जाती हैं. भोपाल के मामले में थोडा उल्टा रहा. इस शहर को पहचान दी एक हादसे ने जिसे न चाहते हुए भी याद करना पड़ता है. यानी गैस कांड. एक लम्बे अन्तराल के बाद एक फिर भोपाल में सुखद बयार बह रही है और वह है भोपाल और उसके आसपास हो रही फिल्मों की शूटिंग जिसने भोपाल को फिर एक नई पहचान देना शुरू कर दी है. अब सवाल एक ही है की क्या जिस तरीके से फिल्म की शूटिंग करने वालों को भोपाल लाने का मन बनाया है क्या उसी तरह इसको जारी भी रखा जाएगा. बहरहाल इस  सवाल का जवाब भले ही बाद में मिले लेकिन भोपाल में फिल्मों के लिए कितनी संभावनाए हैं ये जिक्र भास्कर न्यूज़ की वेबसाइट ने बहुत बेहतर ढंग से दिखाई हैं. 
मिनी बॉलीवुड बनने को बेताब लेक सिटी
भोपाल. झीलों की नगरी भोपाल जल्दी ही फिल्मों के लिए हब बनने जा रहा है। फिल्म इंस्डस्ट्री से लेकर मध्य प्रदेश की सरकार तक इस प्रयास में लगी है कि जल्द से जल्द भोपाल में एक ऐसी फिल्म सिटी का निर्माण हो जाए, जहां बॉलीवुड के लोग बिना किसी हिचक के फिल्मों का निर्माण कर सकें। इसके लिए भोपाल के पास बगरोदा में 430 एकड़ जमीन भी चिंहित कर ली गई है।
पूरा भोपाल और मप्र है शूटिंग के लिए आइडियल
राजधानी में फिल्मों की शूटिंग के लिए एक से बढ़कर एक लोकेशंस है। जिसे कुछ दिनों पहले आई फिल्म राजनीति में भी देखा जा सकता है। भोपाल का गौहर महल, सदर मंजिल, इस्लाम नगर, बोट क्लब, लेकव्यू, तवा, देलावाड़ी, केरवा, भीमबैठका, चिड़ियाटोल, रातापानी अभ्यारण्य, कोलार डेम, कठोतिया, बेनजीर पैलेस, अहमदाबाद पैलेस, कमलापति महल, मनुआभान टेकरी, वीआईपी रोड, रेल कोच, ताजमहल शूटिंग के लिए बेहतर स्थान है।
तैयार है कंस्पेट नोट
मप्र सरकार प्रदेश में फिल्म सिटी बनाने के लिए पूरी तरह तत्पर है। इसके लिए बकायदा एक कंस्पेट नोट भी बना लिया गया है। हालांकि, अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि सरकार फिल्म निर्माताओं को क्या सुविधा देगी। मप्र सरकार के संस्कृति मंत्री लक्ष्मी नारायण शर्मा कहते हैं कि हमारा पूरा प्रयास है कि जल्द से जल्द फिल्म सिटी बन कर तैयार हो जाए। इसके लिए हमने जमीन का भी चुनाव कर लिया है। जो भी फिल्म निर्माता यहां फिल्म बनाएगा, उसे पर्याप्त सुविधाओं के साथ कर में भी छूट दी जाएगी। वहीं, संस्कृति विभाग के निदेशक श्रीराम तिवारी कहते हैं कि मैंने फिल्म सिटी के लिए कंस्पेट नोट तैयार कर लिया है। जिसे सरकार को दिया जाएगा। फिल्म सिटी पर कोई भी फैसला राज्य सरकार ही करेगी।
जब कई फिल्मों में दिखा भोपाल
भोपाल में साठ सालों से लगातार फिल्मों की शूटिंग हो रही है। दिलीप कुमार अभिनीत नया दौर से लेकर वर्ष २क्क्९ में प्रकाश झा की विवादित फिल्म राजनीति की अधिकांश शूटिंग इसी शहर में हुई है। इसके अलावा भोपाल को लेकर कई किताबें और फिल्में भी बन चुकी हैं। जिसमें सबसे अधिक ख्यात फिल्में सूरमा भोपाली, भोपाली एक्सप्रेस, वो तेरा नाम था हैं, शामिल हैं।
भोपाल में बनेगा राष्ट्रीय नाटच्य विद्यालय
दिल्ली की तर्ज पर भोपाल में भी राष्ट्रीय नाटच्य विद्यालय बनाने की योजना है। इसके लिए सरकार पूरी तरह तैयार है। इस विद्यालय के भोपाल में बन जाने के बाद फिल्मों की शूटिंग के लिए बड़े पैमाने पर अच्छे कलाकार मिल सकेंगे।
भोपाल क्यों बेहतर है फिल्म सिटी के लिए
भोपाल की सबसे बड़ी खासियत उसका देश के बीचोंबीच में होना है। जिसके कारण न सिर्फ रेल बल्कि सड़क और हवाई यातायात से भी यह शहर जुड़ा हुआ है। इसके अलावा यहां कई झीलें हैं। जो कि फिल्मों के लिए अच्छी लोकेशन साबित हो सकती है। वहीं, भोपाल की हरी-भरी वादियां और यहां का खूबसूरत मौसम भी फिल्म निर्माताओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसके अतिरिक्त अन्य शहरों की तुलना में भोपाल आज भी काफी सस्ता है। इंडस्ट्री से जुड़ी सामग्री और सुविधाएं यहां सस्ती मिलती हैं। इसके अलावा यहां ऐसे कलाकारों की भी भरमार है जिन्हें फिल्मों में काम करने का अनुभव है।
फिल्म अभिनेता रजा मुराद कहते हैं कि भोपाल की अधिकांश जगह अभी भी पूरी तरह वर्जिन है। यहां कई ऐसे स्थान हैं, जिसका उपयोग फिल्मों में बड़े पैमाने पर किया जा सकता है। मसलन जैसे राजा भोज का मंदिर हो या फिर भीम बैठका। ये सभी लोकेशन फिल्मों के लिए बहुत खूबसूरत हैं। मुराद आगे कहते हैं कि फिल्म सिटी का पूरा प्रस्ताव अभी कागजों पर ही है लेकिन जिस दिन वह पूरा हो जाएगा, उस दिन बॉलीवुड को एक खूबसूरत लोकेशन मिल जाएगी।
मिले अधिक से अधिक सुविधाएं
बॉलीवुड से जुड़े फिल्म निर्माताओं भोपाल में फिल्म बनाने को तैयार हैं बशर्ते यदि उन्हें और अधिक सुविधाएं मिलें। रजा मुराद कहते हैं कि यदि सरकार फिल्मों के लिए सभी जरुरी सुविधाएं मुहैया कराती हैं तो बड़ी संख्या में फिल्म निर्माता भोपाल का रुख कर सकेंगे। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर संस्कृति व पर्यटन मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा तक कह चुके हैं कि यदि राज्य में किसी फिल्म की पचास फीसदी या इससे अधिक शूटिंग होती है तो मनोरंजन कर में पचास फीसदी की छूट मिलेगी। प्रस्तावित फिल्म सिटी भोपाल के पास बगरोदा में बनना है।
पैनोरमा फिल्म समारोह से बॉलीवुड को रिझाया
फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए भोपाल में सोलह साल बाद फिर से भारतीय पैनोरमा फिल्म समारोह शुरु हुआ है। इसमें भाग लेने के लिए बॉलीवुड के कई कलाकारों ने यहां शिरकत की। जिसमें अनुपम खेर पमुख थे। राज्य सरकार ने इस कार्यक्रम के माध्यम से फिल्म निर्माताओं को रिझाने की कोशिश की।
फिल्म निर्देशकों का कहना है कि भोपाल में लोकेशंस से लेकर यहां तहजीब तक शानदार है। इसका यदि उपयोग फिल्मों में किया जाए तो न सिर्फ भोपाल के साथ न्याय होगा बल्कि बॉलीवुड को भी एक आर्कषक लोकेशंस मिल जाएगी। कुछ दिनों पहले ही भोपाल में अपनी नई फिल्म के लिए लोकेशन देखने आए फिल्म निर्देशक मुज्जफर अली को यहां की तहजीब और संस्कृति ने काफी लुभाया। वे कहते हैं कि भोपाल एक बहुत खूबसूरत शहर है। भोपाल गैस त्रासदी पर उन्होंने शीशों का मसीहा नामक एक फिल्म बनाई थी। फिलहाल अली भोपाल में अपनी अगली फिल्म की शूटिंग की तैयारी कर रहे हैं।
बॉलीवुड से लेकर टेलीविजन तक में है भोपाल का दबदबा
बॉलीवुड की बात करें या फिर टेलीविजन की दुनिया की। हर जगह भोपाल का काफी दबदबा देखने को मिलता है। वरिष्ठ कलाकार से लेकर कई लेखक तक भोपाल से जाकर अपनी किस्मत अजमाएं हैं। चाहे वह जया बच्चन के जीजा राजीव वर्मा हों या फिर मॉडल से अभिनेता बने शावर अली खान।
भोपाल पर फिदा हैं सितारे
झीलों की नगरी को जो भी पहली बार देखता है, वह फिदा हो जाता है। चाहे वह आमिर खान हो या फिर रणवीर कपूर। रणवीर कपूर कहते हैं कि भोपाल आने से पहले मैं काफी चिंता में था। लेकिन शूटिंग के दौरान पता चला कि यहां के लोग काफी अच्छे हैं। रणवीर बार-बार भोपाल आना चाहते हैं। वे कहते हैं कि हिंदुस्तान के अन्य शहरों में कई बार शूटिंग के लिए जाना होता है लेकिन भोपाल की बात ही कुछ और है। राजनीति फिल्म की शूटिंग के दौरान जब कैटरीना कैफ भोपाल आई थीं तो उन्हें पहली ही नजर में भोपाल से प्यार हो गया था। वे कहती हैं कि यह शहर पहली नजर में ही पसंद आ गया। यह शांति, हरियाली और खुशमिजाज लोगों का शहर है। किसी शहर की इससे अच्छी पहचान क्या हो सकती है।
रजा मुराद ने दैनिक भास्कर डॉट कॉम को बताया कि भोपाल बहुत खूबसूरत शहर है। यह अभी भी पूरी तरह ऐसा शहर है जिसे छूआ नहीं गया है। यदि यहां फिल्मों की शूटिंग की जाए तो काफी अच्छा होगा। रजा मुराद की बात को आगे बढ़ाते हुए फिल्मकार केतन देसाई कहते हैं कि कुछ दिनों पहले ही नए प्रोजेक्ट के लिए लोकेशन देखने भोपाल आए थे। देसाई कहते हैं कि उन्हें भोपाल और आसपास की कई जगह काफी पसंद आई। वे अपने कई प्रोजेक्ट यहां शुरु करने वाले हैं।
भोपाल के सितारे
फिल्मों में : अनू कपूर, जावेद अली, जावेद अख्तर, शावर अली, रजा मुराद, सैफ अली खान, राजीव वर्मा, जया बच्चन
टीवी में : सारा खान।
भोपाल और आसपास के इलाके में शूटिंग : नया दौर, राजनीति, एक विवाह ऐसा भी, पीपली लाइव, शूल, युवा, तहीकात।

Thursday, July 8, 2010

जिम्मेदारी निभा लेते तो अनुराधा आज माँ बन जाती

भोपाल. सुना है की मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में एक महिला कैदी को पुलिस प्रसाशन की गलती के कारण अपना बछा खोना पड़ा और अब राज्य महिला आयोग उस महिला को इंसाफ दिलाने की तय्यारी शुरू कर चुकी है. यानी एक महिल फिर तैयार है महिला आयोग के डमरू पर नाचने के लिए. दरअसल जी हादसे के लिए जेल और पुलिस प्रसाशन को जिम्मेदार मन जा रहा है उसके लिए तो राज्य महिला आयोग और मानव अधिकार आयोग भी जिम्मेदार हैं क्योंकि इन दोनों ने कभी जाकर नहीं देखा की क्या इन जेलों में महिला कैदियों के लिए कोई उम्दा व्यवस्था है. जब यैसा नहीं किया तो फिर जबरिया इंसाफ दिलाने के धिन्दोरे पीटने से क्या मतलब?
क्या है घटनाक्रम
राज्य महिला आयोग ने महिला कैदी के बच्चों की मौत के मामले में केंद्रीय जेल जाकर मामले की जानकारी ली। जांच के दौरान मिले हुए बयान और प्रस्तुत किए साक्ष्य को देखने के बाद महिला आयोग ने भी माना कि अनुराधा के साथ न केवल पुलिस गार्ड ने बल्कि जेल प्रशासन ने क्रूरता की है। आयोग का मानना है कि यदि उसे समय पर चिकित्सा सुविधा मुहैया की जाती तो उसके दोनों बच्चों को बचाया जा सकता था। आयोग की सदस्य उपमा राय और कमला वाडिया ने पूरे मामले की जांच की।
होशगांबाद पिपरिया की रहने वाली अनुराधा पति राजेश कहार ने राज्य महिला आयोग जो बयान दिए उससे सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो गए। उसने आयोग को बताया कि दहेज हत्या के मामले में २८ जून को कोर्ट ने शाम साढ़े छह बजे उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। उसके बाद पिपरिया पुलिस उसे और उसकी मां को पुलिस की गाड़ी में बैठाकर वहां से निकली। वहां उसकी मां ने महिला पुलिस गार्ड को बताया कि उसकी बेटी गर्भवती है और उसे छह माह का गर्भ है। उसकी तबियत खराब हो रही है गाड़ी धीरे चलाए, लेकिन पुलिस ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और न ही गाड़ी रोकी यहां तक की रास्ते में उसे पानी तक नहीं पीने दिया। उसके बाद उसे होशंगाबाद जेल पंहुचा दिया गया। होशंगाबाद जेल में उसे दो दिन रखा गया और वहां पर भी उसका मेडिकल नहीं कराया गया। ३० जून को होशंगाबाद से फिर उसे गाड़ी में बैठा केंद्रीय जेल पहुंचाया गया। यहां पर 1 मई को रुटीन चेकअप के लिए आई नर्स को तबियत खराब होने की जानकारी दी। नर्स ने उसे फौरन जेल अस्पताल पहुंचाया जहां जेल के डॉक्टर ने उसे सुलतानिया रेफर कर दिया। जेल प्रशासन ने आयोग को बताया कि पुलिस गार्ड न मिलने के कारण उसे तुरंत सुलतानिया नहीं भेजा जा सका। तीन जुलाई को जब पुलिस गार्ड मिली तब उसे सुलतानिया भेजा गया। जहां डॉक्टरों ने जांच केबाद उसकी गंभीर हालत को देखते हुए उसे तुरंत भर्ती करने की सलाह दी लेकिन पुलिस गार्ड ने उसे भर्ती कराने से मना कर दिया और उसे जेल भेज दिया जहां जेल डॉक्टर की सलाह पर उसे फिरसे अस्पताल में भर्ती कराया गया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चार जुलाई को अनुराधा के दोनों बच्चों की मौतगर्भ में ही हो चुकी थी और उसकी भी हालत गंभीर हो गई थी। उसे भी बड़ी मुश्किल से बचाया जा सका।
इनका कहना है:
पूरे साक्ष्य और बयानों के सुनने के बाद जो तथ्य सामने आए है उससे एक बात साबित होती है कि जेल प्रशासन और पुलिस गार्ड ने पूरे समय संवेदनहीनता दिखाई है। यदि उसे समय पर चिकित्सा सुविधा मिल जाती तो निश्चत ही दोनों बच्चों की जान बच जाती।
उपमा राय, सदस्य , राज्य महिला आयोग

पार्टी नहीं खुद का दम भी चलता है

भोपाल.बार-बार ये बात सामने आती है की पार्टी बड़ी है या फिर व्यक्ति. लेकिन एक बार ये बात साबित हो गई की व्यक्ति का अपना कद होता है. आंध्र प्रदेश से कांग्रेस सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगनमोहन रे़ड्डी ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के खिलाफ बगावत का झंडा उठा कर ye बात साबित कर दी. जिस प्रकार उनको जनता का समर्थन मिला है वह काबिले गौर है. हालाँकि इसमें एक दर ये भी है की कही जगमोहन का हश्र उमा भारती के जैसा न हो जाए. खैर कल के बारे में किसने सोचा है. जगमोहन ने सोनिया गांधी के मना करने के बावजूद अपने पूर्व तय कार्यक्रम के मुताबिक ही आठ जुलाई से श्रीकाकुलम से अपनी उदार्पू (दिलासा यात्रा) शुरू करने का फैसला किया है। जगनमोहन ने जनता के नाम सोमवार को लिखे अपने खुले पत्र में कहा है कि वह हर सूरत में . अपनी यात्रा शुरू करेंगे। उनका कहना है कि उसी दिन के पिता वाईएसआर का जन्मदिन है इसलिए यात्रा शुरू करने के लिए इससे अच्छा कोई और दिन नहीं हो सकता। जगन की इस यात्रा का जाहिर तौर पर उद्देश्य यह है कि वह उन परिवारों को दिलासा देना चाहते हैं जिनके सदस्यों की वाईएसआर की मौत की खबर सुनकर सदमे के कारण मौत हो गई थी अथवा उन्होंने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी।
इस यात्रा ने मार्च के महीने में उस समय एक विवादास्पद मो़ड़ ले लिया था जब जगन ने तेलंगाना में अपनी यात्रा ले जाने की कोशिश की और तेलंगाना राज्य के समर्थकों ने उसे रोका। इससे हिंसा भ़डक उठी और पुलिस ने जगन को गिरफ्तार कर लिया। उसकोलेकर जगन और कांग्रेस आलाकमान के बीच काफी क़डवाहट बढ़ गई। आखिर जगन को अपनी यात्रा स्थगित करनी प़डी, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने जगन को यात्रा की अनुमति नहीं दी।
खुद जगन ने अब जनता के नाम अपने खुले पत्र में कहा है कि गत महीने उन्होंने उनकी मां और छोटी बहन के साथ सोनिया गांधी से भेंटकर स्पष्ट किया था कि उनकी यह यात्रा क्यों जरूरी है, लेकिन इसके बाद भी सोनिया यात्रा के पक्ष में दिखाई नहीं दी। जगन ने कहा कि वह एक महान नेता के बेटे होने के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहते हैं और अपने पिता की मौत के स्थान पर उन्होंने जनता से जो वादा किया था, उसे निभाना चाहते हैं, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें केवल अपनी रक्ता ही नहीं बल्कि स्वभाव भी दिया है। चुनौती देने वाले अंदाज में जगन ने आगे कहा है कि उनके लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण बात नहीं है कि वह कितना लंबा जीते हैं बल्कि यह बात अहम है कि वह किस अंदाज में जीते हैं। उन्होंने जनता को आश्वासन देते हुए कहा है कि वह ओदर्यू यात्रा निकालने और हर दुखी परिवार को दिलासा देने का जो वादा किया है, उसे जरूर पूरा करेंगे। अपने सोनिया गांधी से मतभेदों के बारे में जगन कहते हैं कि पिछली भेंट में सोनिया गांधी ने उनसे कहा था कि वह यात्रा निकालने के बजाए सारे दुखी परिवारों को एक जगह बुलाएं और उन्हें कुछ आर्थिक सहायता दें। इस पर उनकी मां विजयलक्ष्मी ने सोनिया गांधी से कहा कि यह बात अच्छी परंपराओं के विरूद्ध होगी। उन्होंने सोनिया गांधी को यह भी याद दिलाया कि जब उनके पति (वाईएसआर) का निधन हो गया था तो सोनिया ने दिल्ली से हैदराबाद आकर उनके परिवार को दिलासा दी थी, न कि परिवार को दिल्ली बुलाया था। दूसरी ओर इस यात्रा से पहले ही आंध्र प्रदेश में कांग्रेस दो गुटों में बंट गई है। मुख्यमंत्री रौसय्या के समर्थक जगनमोहन रेड्डी का विरोध कर रहे हैं और जगन के समर्थक मुख्यमंत्री को निशाना बना रहे हैं। वाईएसआर का जन्मदिन भी टकराव का कारण बन गया है।
जगन चाहते हैं कि सभी विधायक और मंत्री श्रीकाकुलम में उनके कार्यक्रम में आकर उनके पिता को श्रद्धांजलि दें जबकि ऎसी किसी कोशिश को विफल करने के लिए सरकार ने उस रोज विधानसभा का सत्र बुला लिया है और कहा है कि वाईएसआर का जन्मदिन समारोह हैदराबाद में ही मनाया जाएगा। गौरतलब है कि गत सितंबर में उनके पिता की मौत के बाद करीब सभी विधायकों ने जगन को नया मुख्यमंत्री बनाने की मांग की थी और कई मंत्रियों ने भी इसका समर्थन किया था, मगर आलाकमान ने इसे खारिज करते हुए रौसय्या को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया था। अब देखना यह है कि सोनिया गांधी से सीधी टक्कर में कितने मंत्री और विधायक जगनमोहन रेड्डी का साथ देते हैं

Wednesday, July 7, 2010

सेवा करते हैं या फिर केवल आबादी बड़ा रहे हैं

भोपाल. एनजीओ नाम सुनते ही जेहन में सेवा शब्द कौंध जाता है, लेकिन जिस प्रकार से एनजीओ की संख्या बढ रही है उसकी अपेक्षा काम दिखाई नहीं दे रहा है. दैनिक भास्कर की एक खबर से ये कारण एकदम स्पष्ट हो जाता है. भारत में गैर सरकार, गैर लाभकारी संस्‍थाओं या एनजीओ की बाढ़ आई हुई है। यहां सक्रिय एनजीओ की संख्‍या दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा है। एक सरकारी अध्‍ययन के मुताबिक 2009 तक इनकी संख्‍या 33 लाख थी। यानी प्रत्‍येक 400 से भी कम भारतीयों पर एक एनजीओ।
यह संख्‍या वास्‍तविक संख्‍या से कहीं कम होगी, क्‍योंकि सरकारी अध्‍ययन में की गई गणना 2008 की ही है। साथ ही, इस गणना में केवल उन्‍हीं संगठनों को शामिल किया गया, जो सोसायटीज रजिस्‍ट्रेशन एक्‍ट, 1860 या फिर मुंबई पब्लिक ट्रस्‍ट एक्‍ट और इस तर्ज पर दूसरे राज्‍य में लागू काननू के तहत निबंधित हैं। जबकि एनजीओ का निबंधन कई कानूनों के तहत कराया जाता है। इमनें इंडियन ट्रस्‍ट एक्‍ट, 1882, पब्लिक ट्रस्‍ट एक्‍ट 1950, इंडियन कंपनीज एक्‍ट, 1956 (धारा 25), रिलीजियस एंडोमेंट एक्‍ट, 1863, चैरिटेबल एंड रिलीजीयस ट्रस्‍ट एक्‍ट, 1920, मुसलमान वक्‍फ एक्‍ट, 1923, वक्‍फ एक्‍ट, 1954 और पब्लिक वक्‍फ्स (एक्‍सटेंशन ऑफ लिमिटेशन एक्‍ट), एक्‍ट, 1959 आदि शामिल हैं।
महाराष्‍ट्र में सबसे ज्‍यादा एनजीओ
सरकारी आंकड़े के मुताबिक सबसे ज्‍यादा (4.8 लाख) एनजीओ महाराष्‍ट्र में निंबंधित हैं। इसके बाद आंध्र प्रदेश (4.6 लाख), उत्‍तर प्रदेश (4.3 लाख), केरल (3.3 लाख), कर्नाटक (1.9 लाख), गुजरात (1.7 लाख), पश्चिम बंगाल (1.7 लाख), तमिलनाडु (1.4 लाख), ओडि़शा (1.3 लाख) और राजस्‍थान (1 लाख) का नंबर है। इन दस राज्‍यों में ही 80 फीसदी से ज्‍यादा एनजीओ हैं।
80 हजार करोड़ रुपये का सवाल
अनुमान है कि ये संस्‍थाएं हर साल 40 हजार से 80 हजार करोड़ रुपये के बीच जुटा लेते हैं। सबसे ज्‍यादा पैसा तो सरकार से ही आता है। ग्‍यारहवीं योजना के दौरान सामाजिक क्षेत्र के लिए 18 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। एनजीओ को पैसा देने वालों में विदेशी दाता दूसरे नंबर पर हैं। 2007-08 में विदेश से 9,700 करोड़ रुपये आए।
निजी क्षेत्र की कंपनियों से भी एनजीओ को काफी पैसा आता है। भारत में तो कम चलन है, पर विदेश में निजी कंपनियां सामाजिक क्षेत्र पर अच्‍छा खर्च करती हैं। भारत की कंपनियां इस मद में अपने सालाना लाभ का एक फीसदी से भी कम खर्च करती हैं, जबकि ब्रिटिश कंपनियां 1.5 और अमेरिकी कंपनियां 2.0 फीसदी तक मुनाफा सामाजिक कार्यों पर खर्च करती हैं।
एनजीओ की संख्‍या पिछले कुछ सालों में बड़ी तेजी से बढ़ी है। सरकारी आंकड़े पर गौर करें तो 1970 तक केवल 1.44 लाख सोसायटीज रजिस्‍टर्ड थीं, पर अगले तीन दशकों में यह संख्‍या क्रमश: 1.79 लाख, 5.52 लाख और 11.22 लाख होती गई। साल 2000 के बाद सबसे ज्‍यादा एनजीओ रजिस्‍टर्ड हुए।
‘सरकारी अध्‍ययन में शामिल तमाम आंकड़े मोटे अनुमान पर आधारित हैं। वास्‍तविक स्थिति का किसी को पता नहीं है, क्‍योंकि पिछले सालों में यह क्षेत्र बड़ी तेजी से बढ़ा है। यही नहीं, इसका कोई आधिकारिक डेटाबेस बनाने की भी कोशिश नहीं हुई है।’